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सड़क पर भाजपा और महागठबंधन का सियासी मुकाबला-Meerut
Updated Tue, 11 Sep 2018 01:00 AM IST
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बागपत। मंगलवार को जिस बागपत-शामली-सहारनपुर फोरलेन हाईवे का केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी शिलान्यास करेंगे, उसके पहले चरण (बागपत से शामली) का कार्य 18 माह में मार्च 2020 तक पूरा होगा। इसके बाद दूसरे चरण (शामली से सहारनपुर) का काम 24 माह में पूरा करने का लक्ष्य है। तीसरे चरण (लोनी से बागपत) का लक्ष्य अभी निर्धारित नहीं। सड़क के पहले चरण का काम भले ही 2020 में पूरा होगा, लेकिन भाजपा इसके सहारे पश्चिमी यूपी में 2019 के आम चुनाव की राह आसान करना चाहती है। राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौ. अजित सिंह को उनके जिले बागपत में ही घेरना चाहती है। सीएम योगी की नौ महीने में यहां चौथी विजिट है और इसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह छोटे चौधरी की उनके घर छपरौली में सियासी घेराबंदी करने आएंगे। शिलान्यास के इस पत्थर को भाजपा चौ. अजित और उनके संभावित महागठबंधन सहयोगियों की भावी राह में लगाकर विकास का संदेश देना चाहती है।
भाजपा जानती है कि अगर दिल्ली की सियासत का रास्ता यूपी से निकलता है तो इसके लिए विरोधी क्षत्रपों को कमजोर करना होगा। एक दशक से सियासत का शिकार दिल्ली-सहारनपुर हाईवे भाजपा के लिए ऐसे में बेहतर अवसर है। शिलान्यास के लिए रालोद के गढ़ बागपत को चुना गया है। पहले चरण में सहारनपुर नहीं, लेकिन शिलान्यास वहां भी होगा। गडकरी और योगी के अलावा इस अवसर को भुनाने के लिए भाजपा के दिग्गजों का मंगलवार को जमावड़ा लग रहा है। कैराना उपचुनाव की तर्ज पर 2019 में विपक्षी महागठबंधन की भले ही अभी संभावनाएं हैं लेकिन भाजपा इसे पक्का मानकर तैयारी में जुटी है। इसलिए सारा फोकस यूपी में महागठबंधन के क्षत्रपों पर है। पिछले वर्ष 23 दिसंबर को रमाला में सीएम योगी आदित्य नाथ ने चीनी मिल का विस्तारीकरण किया। कैराना उपचुनाव से ठीक दो दिन पहले 27 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बागपत में ही ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया। नौ माह में यह चौथा अवसर है जब सीएम योगी बागपत में होंगे और गडकरी तीसरी बार आएंगे।
भाजपा के लिए बागपत महत्वपूर्ण है और वह इस सीट को खोना नहीं चाहती। महागठबंधन अगर परवान चढ़ा तो बागपत सीट रालोद के हिस्से में आना तय है। कैराना उपचुनाव में महागठबंधन अपनी ताकत दिखा चुका है। ऐसे में भाजपा अजित के गढ़ में अपने कील कांटे दुरुस्त करना चाहती है। भाजपा के दिग्गज हाईवे निर्माण में देरी की वजह सपा, रालोद और कांग्रेस को ही बता रहे हैं। सपा और बसपा शासन में इस मार्ग के निर्माण में रुकावटों का हवाला देकर भाजपा फोरलेन का श्रेय लेने से नहीं चूकना चाहेगी। हालांकि आम जनता के दिमाग में यह बात भी है कि केंद्र सरकार को साढ़े चार साल बाद इसकी याद आई है और भाजपा के श्रेय पर जनता कितना मुहर लगाती है, यह लोकसभा चुनाव के नतीजे बता देंगे लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा 2020 की इस सड़क से भाजपा 2019 की राह निकालना चाहती है। रालोद के अभेद दुर्ग छपरौली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी सियासी दांव चलेंगे। इसी माह के अंत तक छपरौली पुल के शिलान्यास के मौके पर उन्हें बुलाने का प्रस्ताव है।
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शून्य पर पड़ा है रालोद
बागपत। रालोद की राजनीति फिलहाल शून्य पर है। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद छपरौली तक सिमटकर रह गया। 2017 में छपरौली से जीते सहेंद्र सिंह रमाला अब भाजपा का हिस्सा हैं। 2014 में खुद चौधरी अजित सिंह लोकसभा चुनाव हार गए। निकाय चुनाव में बागपत की राजनीति के केंद्र बिंदु बड़ौत में भाजपा को जीत मिली। चौधरी चरण सिंह की कर्मस्थली में भाजपा बढ़ी और रालोद कमजोर हुई है। सियासत की इसी बढ़त को बनाए रखने के लिए भाजपा के दिग्गजों ने ताल ठोक दी है।
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भाजपा जानती है कि अगर दिल्ली की सियासत का रास्ता यूपी से निकलता है तो इसके लिए विरोधी क्षत्रपों को कमजोर करना होगा। एक दशक से सियासत का शिकार दिल्ली-सहारनपुर हाईवे भाजपा के लिए ऐसे में बेहतर अवसर है। शिलान्यास के लिए रालोद के गढ़ बागपत को चुना गया है। पहले चरण में सहारनपुर नहीं, लेकिन शिलान्यास वहां भी होगा। गडकरी और योगी के अलावा इस अवसर को भुनाने के लिए भाजपा के दिग्गजों का मंगलवार को जमावड़ा लग रहा है। कैराना उपचुनाव की तर्ज पर 2019 में विपक्षी महागठबंधन की भले ही अभी संभावनाएं हैं लेकिन भाजपा इसे पक्का मानकर तैयारी में जुटी है। इसलिए सारा फोकस यूपी में महागठबंधन के क्षत्रपों पर है। पिछले वर्ष 23 दिसंबर को रमाला में सीएम योगी आदित्य नाथ ने चीनी मिल का विस्तारीकरण किया। कैराना उपचुनाव से ठीक दो दिन पहले 27 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बागपत में ही ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया। नौ माह में यह चौथा अवसर है जब सीएम योगी बागपत में होंगे और गडकरी तीसरी बार आएंगे।
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भाजपा के लिए बागपत महत्वपूर्ण है और वह इस सीट को खोना नहीं चाहती। महागठबंधन अगर परवान चढ़ा तो बागपत सीट रालोद के हिस्से में आना तय है। कैराना उपचुनाव में महागठबंधन अपनी ताकत दिखा चुका है। ऐसे में भाजपा अजित के गढ़ में अपने कील कांटे दुरुस्त करना चाहती है। भाजपा के दिग्गज हाईवे निर्माण में देरी की वजह सपा, रालोद और कांग्रेस को ही बता रहे हैं। सपा और बसपा शासन में इस मार्ग के निर्माण में रुकावटों का हवाला देकर भाजपा फोरलेन का श्रेय लेने से नहीं चूकना चाहेगी। हालांकि आम जनता के दिमाग में यह बात भी है कि केंद्र सरकार को साढ़े चार साल बाद इसकी याद आई है और भाजपा के श्रेय पर जनता कितना मुहर लगाती है, यह लोकसभा चुनाव के नतीजे बता देंगे लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा 2020 की इस सड़क से भाजपा 2019 की राह निकालना चाहती है। रालोद के अभेद दुर्ग छपरौली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी सियासी दांव चलेंगे। इसी माह के अंत तक छपरौली पुल के शिलान्यास के मौके पर उन्हें बुलाने का प्रस्ताव है।
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शून्य पर पड़ा है रालोद
बागपत। रालोद की राजनीति फिलहाल शून्य पर है। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद छपरौली तक सिमटकर रह गया। 2017 में छपरौली से जीते सहेंद्र सिंह रमाला अब भाजपा का हिस्सा हैं। 2014 में खुद चौधरी अजित सिंह लोकसभा चुनाव हार गए। निकाय चुनाव में बागपत की राजनीति के केंद्र बिंदु बड़ौत में भाजपा को जीत मिली। चौधरी चरण सिंह की कर्मस्थली में भाजपा बढ़ी और रालोद कमजोर हुई है। सियासत की इसी बढ़त को बनाए रखने के लिए भाजपा के दिग्गजों ने ताल ठोक दी है।