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श्रमिक बोले, हमसे नहीं होगा मनरेगा से मिट्टी खोदने का कार्य.. हम तो चले परदेस

Sun, 12 Jul 2020 06:09 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 12 Jul 2020 06:09 PM IST
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Workers said, we can't do the work of digging soil, returning to workplace
आजमगढ़। मनरेगा में मिट्टी खोदने का कार्य मिल रहा है जो हमसे नहीं होगा। जो काम हमें करना आता है वह हमें मिल नहीं रहा। तीन महीने बचत के पैसे से काम चल हर था लेकिन अब परिवार चलाना भारी पड़ रहा है। ऐसे में हमने वापस अपनी पुरानी जगह पर काम पर जाने का फैसला लिया। कुछ इस तरह की बातें आजमगढ़ रेलवे स्टेशन पहुंचे प्रवासी श्रमिकों ने कही।
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लाक डाउन में फैक्ट्रियों के बंद होने पर जनपद में 1,70,000 लोग वापस घर आए लेकिन तीन महीने बाद अब लोगों के समक्ष परिवार चलाने की समस्या खड़ी हो गई है। अब धीरे-धीरे लोग वापसी की राह पकड़ने लगे हैं। प्रदेश में बढ़ते कोरोना संक्रमण को देखते हुए प्रदेश सरकार ने पूरे उत्तर प्रदेश में सोमवार की सुबह पांच बजे तक बंदी घोषित कर रखी है लेकिन इसके बाद लोग किसी न किसी साधन से रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। पूछने पर इन लोगों ने बताया कि तीन महीने से घर में बैठे हैं ऐसे में परिवार के भरण पोषण की समस्या खड़ी हो गई है। जो काम हम करना जानते हैं वैसा काम यहां मिल नहीं रहा है। हमारी कंपनी दोबारा शुरू हो गई है। वहां से हमारे पास फोन आया था। कोरोना का खतरा कम नहीं हुुआ है लेकिन परिवार की जरूरत को ध्यान में रखते हुए फिर वहां जाने का निर्णय लिया। अगर हमें हमारे स्तर का काम यहीं मिले तो वहां क्यूं जाएं लेकिन यहां पर सिर्फ मनरेगा के तहत मिट्टी खोदने का कार्य मिल रहा है जो हमसे नहीं होगा।
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वहां से आने के बाद हम 14 दिन क्वारंटीन रहे। जब उसमें से बाहर निकले तो हमारे पास घर चलाने की समस्या खड़ी हो गई। क्योंकि पास में जो भी पैसा बचाए थे वह लाक डाउन के दौरान ही खत्म हो गए थे। इसलिए मजबूरी में दोबारा वापस जाने का निर्णय लिया। - विनोद कुमार, जहानागंज।
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हम गुजरात में इलेक्ट्रिक कंपनी में काम करते हैं। लाक डाउन के बाद हमारे पास कंपन से फोन आया था। लेकिन हमारा वहां जाने का मन नहीं था इसलिए कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन जब परिवार को चलाना मुश्किल हो गया तो फिर वहां जाने को तैैयार हो गया। - पिंटू यादव, महराजगंज।
हम गुजरात में एक फैक्ट्री में काम करते थे। जिसमें हास्पिटल के बेड आदि तैयार किए जाते थे। यहां हम जब क्वारंटीन से निकले तो हमें मनरेगा के तहत मिट्टी खोदने का कार्य मिल रहा था। यह कार्य हम कभी किए नहीं तो कैसे करते इसलिए फिर जा रहे हैं। - सूरज, बिलरियागंज।

हम सूरत में धागा बनाने का कार्य करते थे। तीन महीनों से बिना किसी काम के बैठे थे। पास में जो पैसे थे वह खर्च हो गए। अब काम कैसे चले अपने साथ परिवार को भी चलाना है। इसे देखते हुए फिर से वहां जाने का निर्णय लिया। अगर वही काम यहां मिलता तो वहां नहीं जाते। - अच्छेलाल, लालपुर।
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