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शिब्ली नोमानी के सपनों को साकार करना ही सच्ची खिराजे अकीदत
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शिब्ली नेशनल महाविद्यालय के परिसर में बृहस्पतिवार को शिब्ली डे का आयोजन किया गया। जिसमें वक्ताओं ने शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्य और आजादी की लड़ाई में दिए गए योगदान पर विस्तार से चर्चा किया। कहा कि उनके अधूरे मिशन को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची खिराजे अकीदत होगी।
कुरआन की तिलावत कर हाफिज अब्दुर्रहमान ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। शिब्ली एकेडमी के स्कालर उमैर सिद्दीक नदवी ने कहा कि अल्लामा शिब्ली नोमानी की जिंदगी सीरत से शुरु हुई और सीरत पर खत्म हो गई। 35 साल की उम्र में उन्हें शमसुल उलेमा का खिताब मिला था। आज हमें इस बात को समझने की जरुरत है कि शिब्ली कैसे शिब्ली बने? शिब्ली ने हिंदू मुस्लिम एकता की बात की और कहा कि हिंदुस्तान की एकता इसी में निहित है। डा.अबू राफे ने बताया कि वह औरतों, गरीबों को शिक्षित किए जाने को लेकर कितनी चिंता किया करते थे। कालेज के प्राचार्य डा. मोहम्मद हारुन ने कहा कि अल्लामा शिब्ली नोमानी के द्वारा किए गए कार्यो को आगे बढ़ाने की जरुरत है। विशिष्ट अतिथि सामाजिक संस्था उम्मीद के संयोजक अनवर मसूद ने कहा कि मेरा शहर से गहरा रिश्ता है। मेरी इंटर तक की शिक्षा शिब्ली से ही हुई, इसके बाद की शिक्षा अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पूरी की। प्रोफेसर सैय्यद जमालुद्दीन ने कहा कि अल्लामा शिब्ली ने शोध का हक अदा कर दिया। वह जहां भी कदम रखते थे अपने निशा छोड़ जाते थे। शिब्ली एक महान विद्वान थे। उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने पर जोर दिया। ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि हम शब्ली के मिशन को आगे बढ़ाए। यही उनके प्रति सच्ची खिराजे अकीदत होगी।
कहा कि आज हम किताबों से दूर होते जा रहे है। हम सभी को किताबों से रिश्ता रखना होगा तभी हमारी राहे रोशन होंगी। मुख्य अतिथि बाबा गुलाम बादशाह विश्वविद्यालय राजौरी के कुलपति प्रोफेसर अकबर मसूद ने कहा कि मेरा जन्म इसी सरजमी पर हुआ है। जब भी इस इदारे को मेरी जरुरत महसूस होगी, मै हमेशा हाजिर रहूंगा। कहा कि हम सभी को मिलकर अल्लामा शिब्ली के मिशन को आगे बढ़ाने की जरुरत है। ताकि दीनी और दुनियाबी शिक्षा से हमारे बच्चे दूर न रह सके। अध्यक्षता कर रहे शिब्ली एकेडमी के निदेशक डा. जफरुल इस्लाम ने कहा कि यूरोप की नई सोच से लाभ उठाया जाना चाहिए। शिब्ली ने अरबी, फारसी भाषा की शक्ल में किताबों बड़ा खजाना छोड़ा है। जिसका कई भाषा में अनुवाद हो चुका है। हमे चिंतन करने की जरुरत है। कार्यक्रम का संचालन डा.अलाउद्दीन ने किया। दी आजमगढ़ मुस्लिम एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष डा. शौकत खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान विगत दिनों हुए भाषण और निबंध प्रतियोगिता के विजयी हुए प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। सहायक अध्यापक मिर्जा मुराद बेग ने कहा कि अल्लाम शिब्ली इतने बड़े शिक्षाविद थे कि उनके जैसी शख्सियत का पाया जाना मुश्किल है। मजहब के लिहाज से उनकी जैसी सोच किसी की नहीं थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा और शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया था। आज उनके अधूरे ख्वाब को पूरा करने का दिन है। जिस तरह से अल्लामा शिब्ली नोमानी के दिल में कौम की मिल्लत, शिक्षा के प्रति तड़प थी वह तड़प हम सभी को पैदा करनी होगी तभी हम उनके ख्वाबों को पूरा कर सकते है। इस मौके पर प्रबंध समिति के अध्यक्ष अबुसाद शम्सी, संयुक्त सचिव मोहम्मद हसीब खान, मिर्जा महफूजुर्रहमान बेग, इंटर कालेज, अख्तर रशीद खान, जफर इकबाल, डा. सरफराज नवाज, वसीउद्दीन एडवोकेट आदि उपस्थित रहे।
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कुरआन की तिलावत कर हाफिज अब्दुर्रहमान ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। शिब्ली एकेडमी के स्कालर उमैर सिद्दीक नदवी ने कहा कि अल्लामा शिब्ली नोमानी की जिंदगी सीरत से शुरु हुई और सीरत पर खत्म हो गई। 35 साल की उम्र में उन्हें शमसुल उलेमा का खिताब मिला था। आज हमें इस बात को समझने की जरुरत है कि शिब्ली कैसे शिब्ली बने? शिब्ली ने हिंदू मुस्लिम एकता की बात की और कहा कि हिंदुस्तान की एकता इसी में निहित है। डा.अबू राफे ने बताया कि वह औरतों, गरीबों को शिक्षित किए जाने को लेकर कितनी चिंता किया करते थे। कालेज के प्राचार्य डा. मोहम्मद हारुन ने कहा कि अल्लामा शिब्ली नोमानी के द्वारा किए गए कार्यो को आगे बढ़ाने की जरुरत है। विशिष्ट अतिथि सामाजिक संस्था उम्मीद के संयोजक अनवर मसूद ने कहा कि मेरा शहर से गहरा रिश्ता है। मेरी इंटर तक की शिक्षा शिब्ली से ही हुई, इसके बाद की शिक्षा अलीगढ़ विश्वविद्यालय से पूरी की। प्रोफेसर सैय्यद जमालुद्दीन ने कहा कि अल्लामा शिब्ली ने शोध का हक अदा कर दिया। वह जहां भी कदम रखते थे अपने निशा छोड़ जाते थे। शिब्ली एक महान विद्वान थे। उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने पर जोर दिया। ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि हम शब्ली के मिशन को आगे बढ़ाए। यही उनके प्रति सच्ची खिराजे अकीदत होगी।
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कहा कि आज हम किताबों से दूर होते जा रहे है। हम सभी को किताबों से रिश्ता रखना होगा तभी हमारी राहे रोशन होंगी। मुख्य अतिथि बाबा गुलाम बादशाह विश्वविद्यालय राजौरी के कुलपति प्रोफेसर अकबर मसूद ने कहा कि मेरा जन्म इसी सरजमी पर हुआ है। जब भी इस इदारे को मेरी जरुरत महसूस होगी, मै हमेशा हाजिर रहूंगा। कहा कि हम सभी को मिलकर अल्लामा शिब्ली के मिशन को आगे बढ़ाने की जरुरत है। ताकि दीनी और दुनियाबी शिक्षा से हमारे बच्चे दूर न रह सके। अध्यक्षता कर रहे शिब्ली एकेडमी के निदेशक डा. जफरुल इस्लाम ने कहा कि यूरोप की नई सोच से लाभ उठाया जाना चाहिए। शिब्ली ने अरबी, फारसी भाषा की शक्ल में किताबों बड़ा खजाना छोड़ा है। जिसका कई भाषा में अनुवाद हो चुका है। हमे चिंतन करने की जरुरत है। कार्यक्रम का संचालन डा.अलाउद्दीन ने किया। दी आजमगढ़ मुस्लिम एजुकेशन सोसाइटी के अध्यक्ष डा. शौकत खान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान विगत दिनों हुए भाषण और निबंध प्रतियोगिता के विजयी हुए प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। सहायक अध्यापक मिर्जा मुराद बेग ने कहा कि अल्लाम शिब्ली इतने बड़े शिक्षाविद थे कि उनके जैसी शख्सियत का पाया जाना मुश्किल है। मजहब के लिहाज से उनकी जैसी सोच किसी की नहीं थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की सेवा और शिक्षा के प्रति समर्पित कर दिया था। आज उनके अधूरे ख्वाब को पूरा करने का दिन है। जिस तरह से अल्लामा शिब्ली नोमानी के दिल में कौम की मिल्लत, शिक्षा के प्रति तड़प थी वह तड़प हम सभी को पैदा करनी होगी तभी हम उनके ख्वाबों को पूरा कर सकते है। इस मौके पर प्रबंध समिति के अध्यक्ष अबुसाद शम्सी, संयुक्त सचिव मोहम्मद हसीब खान, मिर्जा महफूजुर्रहमान बेग, इंटर कालेज, अख्तर रशीद खान, जफर इकबाल, डा. सरफराज नवाज, वसीउद्दीन एडवोकेट आदि उपस्थित रहे।
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