{"_id":"66981297e4b7eec5410366a4","slug":"singapores-gold-chandeliers-are-used-in-the-crown-of-dorwa-azamgarh-news-c-258-1-svns1005-118070-2024-07-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"Azamgarh News: डोरवा के ताजिए में लगते हैं सिंगापुर के सोने के झूमर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Azamgarh News: डोरवा के ताजिए में लगते हैं सिंगापुर के सोने के झूमर
विज्ञापन
सगड़ी। क्षेत्र के डोरवा गांव में हिंदू परिवार के लोग ताजिया बनाते हैं और जुलूस भी निकालते हैं। ताजिया बनाने में सोने के चार झूमर और चांदी की 22 कलशी का इस्तेमाल होता है। यहां का ताजिया पूरे पूर्वांचल में मशहूर है। यह क्रम 355 साल से चलता आ रहा है।
डोरवा गांव की चौहान बस्ती के लोग 355 वर्षों से ताजिया बनाते आ रहे हैं। यहां का
ताजिया बनाने के लिए सोने के चार झूमर और 22 चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी, जो आज भी मौजूद हैं। ताजिया रखने के लिए गांव के बीच में इमामबाड़ा है। यहां 251 साल पुराना तंबू मौजूद है। चौहान बस्ती और सुंदर सराय बल्लो गांव के पठान लोगों के ताजिया का मिलन होता है। इसके बाद सुंदर सराय बल्लो में स्थित कर्बला के मैदान में ताजिये को दफनाया जाता है। गांव के बुजुर्ग बजरंगी चौहान, संतविजय चौहान, गुलाब चौहान ने बताया कि यह परंपरा काफी पुरानी है, जिसका हम लोग आज भी निर्वहन करते हैं।
बताया कि 355 वर्ष पूर्व डोरवा चौहान बस्ती में टोकरी नामक व्यक्ति का परिवार था। टोकरी के तीन पुत्र गुज्जन, बाल गोविंद और धर्मू थे। इसमें गुंजन और बाल गोविंद की मृत्यु हो गई। धर्मू को कोई संतान नहीं थी। इससे पिता टोकरी चिंतित रहने लगे। एक दिन एक फकीर उनके पास आए और उनकी चिंता का कारण पूछा। इसके बाद फकीर ने उन्हें अंजान शहीद में ताजिया में जाकर प्रार्थना करने को कहा। टोकरी ने अपने पुत्र धर्मू और बहू सत्यवती के साथ अंजान शहीद में जाकर मुहर्रम में प्रार्थना की। इसके बाद धर्मू को चार पुत्रों की प्राप्ति हुई। धीरे धीरे इनका वंश बढ़ता गया। आज 125 से अधिक घरों की चौहान बस्ती है। इस बस्ती के लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
डोरवा गांव की चौहान बस्ती के लोग 355 वर्षों से ताजिया बनाते आ रहे हैं। यहां का
ताजिया बनाने के लिए सोने के चार झूमर और 22 चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी, जो आज भी मौजूद हैं। ताजिया रखने के लिए गांव के बीच में इमामबाड़ा है। यहां 251 साल पुराना तंबू मौजूद है। चौहान बस्ती और सुंदर सराय बल्लो गांव के पठान लोगों के ताजिया का मिलन होता है। इसके बाद सुंदर सराय बल्लो में स्थित कर्बला के मैदान में ताजिये को दफनाया जाता है। गांव के बुजुर्ग बजरंगी चौहान, संतविजय चौहान, गुलाब चौहान ने बताया कि यह परंपरा काफी पुरानी है, जिसका हम लोग आज भी निर्वहन करते हैं।
विज्ञापन
बताया कि 355 वर्ष पूर्व डोरवा चौहान बस्ती में टोकरी नामक व्यक्ति का परिवार था। टोकरी के तीन पुत्र गुज्जन, बाल गोविंद और धर्मू थे। इसमें गुंजन और बाल गोविंद की मृत्यु हो गई। धर्मू को कोई संतान नहीं थी। इससे पिता टोकरी चिंतित रहने लगे। एक दिन एक फकीर उनके पास आए और उनकी चिंता का कारण पूछा। इसके बाद फकीर ने उन्हें अंजान शहीद में ताजिया में जाकर प्रार्थना करने को कहा। टोकरी ने अपने पुत्र धर्मू और बहू सत्यवती के साथ अंजान शहीद में जाकर मुहर्रम में प्रार्थना की। इसके बाद धर्मू को चार पुत्रों की प्राप्ति हुई। धीरे धीरे इनका वंश बढ़ता गया। आज 125 से अधिक घरों की चौहान बस्ती है। इस बस्ती के लोग इस परंपरा को निभा रहे हैं।
विज्ञापन