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Azamgarh News: मंदी की काली छाया से जूझ रहा रेशमी साड़ी का कारोबार
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हथकरघा पर बुनाई करता बुनकर
- फोटो : samvad
मुबारकपुर की रेशमी बनारसी साड़ी का कारोबार कभी बुनकरों को रोजगार का सशक्त संसाधन हुआ करता था। कारोबार में मंदी आने से बुनकरों को रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों व देशों में पलायन करना पड़ रहा है। वर्ष 2017 में बना बुनकर विपणन केंद्र से भी कुछ लाभ नही हुआ।
बनारसी साड़ी की बदौलत ही कभी बुनकर खुशहाल हुआ करता था। करीब 1.50 लाख बुनकर इस कारोबार से जुडुे थे, लेकिन एक दंगे के बाद रेशमी साड़ी का कारोबार 27 सालों से मंदी की काली छाया से जूझ रहा है। बाहर से व्यापारियों का आना बंद होने से आढ़तिये यहां का तैयार माल बाहर ले जाकर व्यापारियों को बेचने लगे। वह बुनकरों से उनकी बुनी हुई साड़ी को सस्ते दामों पर खरीद करने लगे। बुनकरों को भी उनको अपना माल देना मजबूरी हो गई है क्योंकि धंधा मंदा होने के बाद उनके पास इतनी पूंजी नहीं कि वह साड़ी तैयार करने के लिए कच्चा माल ला सकें। इसका फायदा उठाकर व्यापारी रेशमी साड़ी में प्रयोग होने वाला कच्चा माल जैसे कतान, रेशम, जरी, धागा उन्हें महंगे दामों पर उपलब्ध करा रहे हैं। इससे वह मालामाल होते गए और बुनकर बदहाल होता चला गया। इससे बुनकरों का धीरे-धीरे बुनकरी का मोह भंग होता गया क्योंकि उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया। पहले करीब 45 हजार हथकरघा थे जो अब 15-16 हजार तक कर रह गए। वहीं, जीएसटी लगने और फ्लैट रेट पर बिजली न मिलने से हजारों बुनकर बुनकर हथकरघा बंद कर विदेश को पलायन करने को मजबूर हो गए। अब एक लाख के करीब बुनकर रह गए हैं। कुछ बुनकरों ने हथकरघा की बजाय पॉवरलूम लगवाए फिर भी हालात नहीं सुधरे। यहां तक कि बुनकरों को बाजार, व्यापारी सुविधा उपलब्ध करने के नाम पर वर्ष 2017 में 13 करोड़ों की लागत से बना बुनकर विपणन केंद्र से भी कारोबार रफ्तार नहीं पकड़ा।
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20 हजार साड़ी हो गई डंप
भाजपा सरकार में बुनकरों के लिए बीसी सखी योजना शुरू हुई। इस योजना में सरकार द्वारा हथकरघा पर एक लाख 16 हजार साड़ी का कोटा निर्धारित किया गया। इससे बुनकरों को कुछ लाभ हुआ। हथकरघा पर बुनाई करने वाले बुनकर को एक साड़ी की मजदूरी साढ़े सात सौ रुपए उनके खाते में जाने लगी। दो साल बाद 20 हजार साड़ी डंप हो गई और भुगतान भी रुक गया। बाद यह योजना बंद हो गई। संवाद
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फोटो संख्या- 13
1971 से 1998 तक मुबारकपुर में व्यापारी आते थे और सीधे बुनकर मजदूरों से साड़ी खरीद करते थे। इसके बाद व्यापारी आना बंद कर दिए। इससे हथकरघा बंद होने लगे तो बुनकरों ने पावरलूम लगवाया। इसके लिए पहले बिजली बिल फ्लैट रेंट प्रति लूम 72 रुपया देना होता था। भाजपा सरकार बनने के बाद प्रति पावरलूम फ्लैट रेट बढ़कर 400 रुपये हो गया। - बुनकर हाजी जमाल अहमद
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फोटो संख्या- 14
जीएसटी ने बुनकरों की कमर तोड़ दिया। पहले बुनकरों को कारोबार करने की खुली छूट थी। साड़ी पर टैक्स लगने, व्यापारियों के न आने और कच्चा माल धागा, रेशम, कतान, जरी आदि के दामों में बेतहाशा वृद्धि होने से हथकरघा बड़े पैमाने पर बंद हो गए।-- बुनकर कारोबारी मो. फारूक
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बुनकरों को बाजार
- व्यापारियों से जोड़ने के लिए 2017 में अली नगर में 13 करोड़ से बुनकर विपणन केंद्र बना। इसमें 158 दुकानें हैं। तत्कालीन डीएम ने विपणन केंद्र में साप्ताहिक बाजार लगाने का आदेश दिया था। आदेश को आमली जामा पहनाने के लिए प्रचार प्रसार नहीं किया गया। बाजार लगाने के लिए किसी तरह बजट की व्यवस्था नहीं किया गया। इसलिए बाजार अब तक नहीं लग सका। अब बुनकरों की संख्या भी 1.50 लाख से घटकर करीब एक लाख तक रह गई है।
-- इफ्तेखार अहमद, सचिव बुनकर विपणन केंद्र।
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बनारसी साड़ी की बदौलत ही कभी बुनकर खुशहाल हुआ करता था। करीब 1.50 लाख बुनकर इस कारोबार से जुडुे थे, लेकिन एक दंगे के बाद रेशमी साड़ी का कारोबार 27 सालों से मंदी की काली छाया से जूझ रहा है। बाहर से व्यापारियों का आना बंद होने से आढ़तिये यहां का तैयार माल बाहर ले जाकर व्यापारियों को बेचने लगे। वह बुनकरों से उनकी बुनी हुई साड़ी को सस्ते दामों पर खरीद करने लगे। बुनकरों को भी उनको अपना माल देना मजबूरी हो गई है क्योंकि धंधा मंदा होने के बाद उनके पास इतनी पूंजी नहीं कि वह साड़ी तैयार करने के लिए कच्चा माल ला सकें। इसका फायदा उठाकर व्यापारी रेशमी साड़ी में प्रयोग होने वाला कच्चा माल जैसे कतान, रेशम, जरी, धागा उन्हें महंगे दामों पर उपलब्ध करा रहे हैं। इससे वह मालामाल होते गए और बुनकर बदहाल होता चला गया। इससे बुनकरों का धीरे-धीरे बुनकरी का मोह भंग होता गया क्योंकि उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया। पहले करीब 45 हजार हथकरघा थे जो अब 15-16 हजार तक कर रह गए। वहीं, जीएसटी लगने और फ्लैट रेट पर बिजली न मिलने से हजारों बुनकर बुनकर हथकरघा बंद कर विदेश को पलायन करने को मजबूर हो गए। अब एक लाख के करीब बुनकर रह गए हैं। कुछ बुनकरों ने हथकरघा की बजाय पॉवरलूम लगवाए फिर भी हालात नहीं सुधरे। यहां तक कि बुनकरों को बाजार, व्यापारी सुविधा उपलब्ध करने के नाम पर वर्ष 2017 में 13 करोड़ों की लागत से बना बुनकर विपणन केंद्र से भी कारोबार रफ्तार नहीं पकड़ा।
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20 हजार साड़ी हो गई डंप
भाजपा सरकार में बुनकरों के लिए बीसी सखी योजना शुरू हुई। इस योजना में सरकार द्वारा हथकरघा पर एक लाख 16 हजार साड़ी का कोटा निर्धारित किया गया। इससे बुनकरों को कुछ लाभ हुआ। हथकरघा पर बुनाई करने वाले बुनकर को एक साड़ी की मजदूरी साढ़े सात सौ रुपए उनके खाते में जाने लगी। दो साल बाद 20 हजार साड़ी डंप हो गई और भुगतान भी रुक गया। बाद यह योजना बंद हो गई। संवाद
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फोटो संख्या- 13
1971 से 1998 तक मुबारकपुर में व्यापारी आते थे और सीधे बुनकर मजदूरों से साड़ी खरीद करते थे। इसके बाद व्यापारी आना बंद कर दिए। इससे हथकरघा बंद होने लगे तो बुनकरों ने पावरलूम लगवाया। इसके लिए पहले बिजली बिल फ्लैट रेंट प्रति लूम 72 रुपया देना होता था। भाजपा सरकार बनने के बाद प्रति पावरलूम फ्लैट रेट बढ़कर 400 रुपये हो गया। - बुनकर हाजी जमाल अहमद
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फोटो संख्या- 14
जीएसटी ने बुनकरों की कमर तोड़ दिया। पहले बुनकरों को कारोबार करने की खुली छूट थी। साड़ी पर टैक्स लगने, व्यापारियों के न आने और कच्चा माल धागा, रेशम, कतान, जरी आदि के दामों में बेतहाशा वृद्धि होने से हथकरघा बड़े पैमाने पर बंद हो गए।
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बुनकरों को बाजार
- व्यापारियों से जोड़ने के लिए 2017 में अली नगर में 13 करोड़ से बुनकर विपणन केंद्र बना। इसमें 158 दुकानें हैं। तत्कालीन डीएम ने विपणन केंद्र में साप्ताहिक बाजार लगाने का आदेश दिया था। आदेश को आमली जामा पहनाने के लिए प्रचार प्रसार नहीं किया गया। बाजार लगाने के लिए किसी तरह बजट की व्यवस्था नहीं किया गया। इसलिए बाजार अब तक नहीं लग सका। अब बुनकरों की संख्या भी 1.50 लाख से घटकर करीब एक लाख तक रह गई है।