ज्वार, बाजरा, सांवा कोदो, कांगनी, कुटकी एवं मडुवा जैसे मोटे अनाज का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। इसके सेवन से जहां लोगों को अच्छा पोषण मिलता है वही कम लागत तथा कम संसाधनों में इन फसलों की खेती की जाती है। इसे देखते हुए बुधवार से कृषि विज्ञान केंद्र लेदौरा में मोटे अनाज पर शोध का कार्य शुरू हो गया। कृषि विज्ञान केंद्र, लेदौरा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डा. एलसी वर्मा के अनुसार मोटे अनाजों की खेती कर कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। क्योंकि मौजूदा समय में मोटे अनाज की मांग अधिक है लेकिन उत्पादन बहुत कम है। बढ़ती मांग को देखते हुए जिले में मोटे अनाज की फसलों की खेती करना अत्यंत आवश्यक है। सावा, कोदो, कांगनी, कुटकी एवं मड़ुआ की बुवाई का सही समय चल रहा है। इसकी बुवाई के लिए उचित जल निकास युक्त बलुई तथा बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है। केन्द्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. महेंद्र प्रताप एवं उमेश कुमार ने बताया कि केंद्र पर मोटे अनाज पर ट्रायल लगाया जा रहा है। जिसमे सांवा, कोदो, मड़ुआ, रागी, काकुन, कुटकी, कंगनी, ज्वार एवं बाजरा की बुवाई लाइन विधि द्वारा की गयी। केन्द्र के पादप प्रजनन वैज्ञानिक डा. अखिलेश यादव ने बताया कि खेती की अच्छी तरह जुताई करने के बाद बीज की बुवाई की जा सकती है। मोटे अनाज की खेती के लिए 3 से 8 किग्रा प्रति हेक्टेयर तक बीज की आवश्यकता होती है। यह फसलें 90 से 95 दिन में कटाई योग्य हो जाती हैं। मड़ुआ की खेती सीधी बुवाई के अतिरिक्त रोपाई विधि से भी की जा सकती है। प्रक्षेत्र प्रबंधक डा. वेद प्रकाश सिंह ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय मोटे अनाज वर्ष 2023 के दृष्टिगत इन फसलों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र द्वारा वर्तमान खरीफ सीजन में जिले के विभिन्न क्षेत्रों में सांवा, कोदो, कांगनी, एवं मड़ुआ का प्रदर्शन भी कराया जा रहा है।