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देशज से लुप्त कलाओं को सहेजने की जुगत
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Thu, 17 Mar 2016 12:05 AM IST
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देशज
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लुप्त होती लोक संस्कृति की विभिन्न शैलियों को ‘देशज’ के जरिए सहेजने की कोशिश आजमगढ़ के जजी मैदान स्थित रंगग्राम में अगले पांच दिनों तक दिखेगी। संगीत नाटक अकादमी के इस कार्यक्रम में नाट्य, नौंटकी और गायन से जुड़ी लोकविधाओं से लोगों को परिचित कराने का प्रयास तो किया ही जाएगा साथ ही इसके जरिए एक संवाद की कोशिश भी की जाएगी। ‘देशज’ में विभिन्न विधाओं के दिग्गज कलाकार भाग ले रहे हैं।
संगीत नाटक अकादमी के सेक्रेटरी सुमन कुमार ने बताया कि पूर्व की स्वांग कला और वर्तमान समय की नौटंकी, पूर्वांचल के लोगों के बीच अब तक अश्लील स्वरूप में प्रचलित रही है। ‘देशज’ के माध्यम से लोगों को इस विधा की साफ-सुथरी तस्वीर दिखाई जाएगी। मसलन मुंशी प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी ‘पंच परमेश्वर’, जिसे लोग अभी तक कहानी के रूप में ही जानते थे, उसे यहां नौटंकी के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि देशज का अर्थ जमीन से जुड़ी संस्कृति, सभ्यता की वो अभिव्यक्ति है, जो हमारे लोक जीवन को विविधता और सुंदरता से ओत-प्रोत करती है। जो समाज और देश का आदर्श भी है। आजमगढ़ में आयोजित ‘देशज’ का मकसद विभिन्न प्रांतों (हिंदी पट्टी) की विभिन्न कलाओं का एक मंच पर समागम कराकर पूर्वांचल की जनता को उससे परिचित कराना है। इसमें विलुप्त होती नौटंकी विधा पर फोकस किया गया है।
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गंवई जीवन का एहसास करा रहे रंगग्राम में मंचन के लिए देश के नामचीन कलाकारों और उनकी मंडलियों को आमंत्रित किया गया है। इसमें आगरा की भगत, जो विलुप्त होकर जीवंत हुई है, इसके अलावा बिहार का मशहूर बिदेसिया, इलाहाबाद का स्वर्ग रंगमंडल, जिसने शोध करके कहानी को नौटंकी विधा में रूपांतरित किया है, के अलावा इसमें विभिन्न प्रांतों की परंपरागत मशहूर लोक संगीत को भी स्थान दिया गया है। इसमें मालिनी अवस्थी और प्रह्लाद सिंह टापड़िया के लोक गायन के साथ पंजाब का भांड मेरासी, हरियाणा का स्वांग, छत्तीसगढ़ का नाचा, राजस्थान का लोक संगीत और ब्रज की होली आकर्षण का केंद्र होगा।
कोई भी लोक नाट्य विधा अपनी क्षेत्रीय कलाओं के साथ-साथ ही चलती है। नाटक में तो सब कुछ समाहित होता है। नौटंकी के साथ भी ऐसा ही है। ऐसे में ‘देशज’ में लोकप्रिय और लुप्त दोनों ही तरह की लोक कलाओं को समाहित किया गया है।
- अभिषेक पंडित, कार्यक्रम संयोजक ‘देशज’
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संगीत नाटक अकादमी के सेक्रेटरी सुमन कुमार ने बताया कि पूर्व की स्वांग कला और वर्तमान समय की नौटंकी, पूर्वांचल के लोगों के बीच अब तक अश्लील स्वरूप में प्रचलित रही है। ‘देशज’ के माध्यम से लोगों को इस विधा की साफ-सुथरी तस्वीर दिखाई जाएगी। मसलन मुंशी प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी ‘पंच परमेश्वर’, जिसे लोग अभी तक कहानी के रूप में ही जानते थे, उसे यहां नौटंकी के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा।
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उन्होंने कहा कि देशज का अर्थ जमीन से जुड़ी संस्कृति, सभ्यता की वो अभिव्यक्ति है, जो हमारे लोक जीवन को विविधता और सुंदरता से ओत-प्रोत करती है। जो समाज और देश का आदर्श भी है। आजमगढ़ में आयोजित ‘देशज’ का मकसद विभिन्न प्रांतों (हिंदी पट्टी) की विभिन्न कलाओं का एक मंच पर समागम कराकर पूर्वांचल की जनता को उससे परिचित कराना है। इसमें विलुप्त होती नौटंकी विधा पर फोकस किया गया है।
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गंवई जीवन का एहसास करा रहे रंगग्राम में मंचन के लिए देश के नामचीन कलाकारों और उनकी मंडलियों को आमंत्रित किया गया है। इसमें आगरा की भगत, जो विलुप्त होकर जीवंत हुई है, इसके अलावा बिहार का मशहूर बिदेसिया, इलाहाबाद का स्वर्ग रंगमंडल, जिसने शोध करके कहानी को नौटंकी विधा में रूपांतरित किया है, के अलावा इसमें विभिन्न प्रांतों की परंपरागत मशहूर लोक संगीत को भी स्थान दिया गया है। इसमें मालिनी अवस्थी और प्रह्लाद सिंह टापड़िया के लोक गायन के साथ पंजाब का भांड मेरासी, हरियाणा का स्वांग, छत्तीसगढ़ का नाचा, राजस्थान का लोक संगीत और ब्रज की होली आकर्षण का केंद्र होगा।
कोई भी लोक नाट्य विधा अपनी क्षेत्रीय कलाओं के साथ-साथ ही चलती है। नाटक में तो सब कुछ समाहित होता है। नौटंकी के साथ भी ऐसा ही है। ऐसे में ‘देशज’ में लोकप्रिय और लुप्त दोनों ही तरह की लोक कलाओं को समाहित किया गया है।
- अभिषेक पंडित, कार्यक्रम संयोजक ‘देशज’