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न मानक का ध्यान, न कोई जांच
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Sun, 17 Apr 2016 12:30 AM IST
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आरओ का पानी
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जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीणांचल तक जहां हैंडपंप और सबमर्सिबल पानी छोड़ रहे हैं। वहीं नगर से लेकर पूरे जिले में कई दर्जन आरओ वाटर प्लांट धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। बेलगाम इस धंधे में सबसे ज्यादा भूगर्भ जल का दोहन हो रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस तरफ ध्यान नहीं दिए जाने से जनपद में धीरे-धीेरे कई दर्जन आरओ प्लांट स्थापित हो चुुके हैं। इन आरओ प्लांट संचालकों द्वारा वितरित किए जाने वाले पानी की कभी जांच भी नहीं होती कि वो उपभोक्ताओं को किस प्रकार का मिनरल वाटर उपलब्ध करा रहे हैं।
विगत तीन वर्षों से जनपद में हुई सामान्य से कम बारिश के कारण भूगर्भ जलस्तर काफी नीचे चला गया है। जनपद के दो ब्लाक सठियांव और मिर्जापुर तो डेंजर जोन भी पहुंच चुके हैं। सरकार द्वारा लोगों से जल संचयन की अपील की जा रही है। बारिश न होने से लोगों के हैंडपंप और सबमर्सिबल पानी छोड़ रहे हैं। जिसके कारण अपने हैंडपंपों को रिबोर कराने में लगे हुए हैं। वहीं जनपद में पानी के दूषित होने की बात पर लोगों आरओ वाटर की ओर आकर्षित हुए हैं। जिसका परिणाम है कि नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी आरओ वाटर का कारोबार तेजी से फैल रहा है।
जिसका परिणाम है कि भूगर्भ जल का श्रोत काफी तेजी से नीचे की ओर भाग रहा है। क्योंकि 15 लीटर आरओ वाटर तैयार करने में कम से कम 45 लीटर पानी नाली में बह जाता है। एक-एक आरओ वाटर सेंटर प्रतिदिन कम से दो सौ से ढ़ाई सौ डिब्बे पानी की सप्लाई करता है। एक डिब्बे में 15 लीटर पानी होता है। सबसे बड़ी बात इन आरओ प्लांट के लिए लाइसेंस कहां से जारी होता है यह किसी को नहीं मालूम। जलनिगम, नगरपालिका के साथ ही खाद्य और रसद विभाग को जनपद में स्थापित आरओ प्लांटों की संख्या का भी पता नहीं है।
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यह व्यक्तिगत धंधा है। हम इसके बारे में कुछ नहीं सकते हैं। हमारे विभाग द्वारा इनके लाइसेंस से कोई लेनादेना नहीं है। - एसके सिंह यादव, जल निगम के अधिशासी अभियंता
नगरपालिका को इन आरओ प्लांटों से कोई लेनादेना नहीं है। इसके लिए लखनऊ में स्थित केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से अनुमति लेनी होती है। इसके बाद ही आरओ प्लांट लगाया जाता है। - ओमप्रकाश, नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी
इसे ड्रिकिंग वाटर कहा जा सकता है। अगर इन लोगों द्वारा पानी को बोतल में पैंकिंग कर बेचा जाता तो हम कार्रवाई कर सकते हैं लेकिन उन लोगों द्वारा ऐसा नहीं किया जाता है। इसलिए हमारे हाथ नियमों से बंधे हैं। वैसे इन लोगों द्वारा आपूर्ति किया जा रहा पानी हैंडपंप से निकलने वाले पानी से शुद्ध ही होगा।
- अभय सिंह, प्रभारी खाद्य अभिहित अधिकारी
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विगत तीन वर्षों से जनपद में हुई सामान्य से कम बारिश के कारण भूगर्भ जलस्तर काफी नीचे चला गया है। जनपद के दो ब्लाक सठियांव और मिर्जापुर तो डेंजर जोन भी पहुंच चुके हैं। सरकार द्वारा लोगों से जल संचयन की अपील की जा रही है। बारिश न होने से लोगों के हैंडपंप और सबमर्सिबल पानी छोड़ रहे हैं। जिसके कारण अपने हैंडपंपों को रिबोर कराने में लगे हुए हैं। वहीं जनपद में पानी के दूषित होने की बात पर लोगों आरओ वाटर की ओर आकर्षित हुए हैं। जिसका परिणाम है कि नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी आरओ वाटर का कारोबार तेजी से फैल रहा है।
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जिसका परिणाम है कि भूगर्भ जल का श्रोत काफी तेजी से नीचे की ओर भाग रहा है। क्योंकि 15 लीटर आरओ वाटर तैयार करने में कम से कम 45 लीटर पानी नाली में बह जाता है। एक-एक आरओ वाटर सेंटर प्रतिदिन कम से दो सौ से ढ़ाई सौ डिब्बे पानी की सप्लाई करता है। एक डिब्बे में 15 लीटर पानी होता है। सबसे बड़ी बात इन आरओ प्लांट के लिए लाइसेंस कहां से जारी होता है यह किसी को नहीं मालूम। जलनिगम, नगरपालिका के साथ ही खाद्य और रसद विभाग को जनपद में स्थापित आरओ प्लांटों की संख्या का भी पता नहीं है।
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यह व्यक्तिगत धंधा है। हम इसके बारे में कुछ नहीं सकते हैं। हमारे विभाग द्वारा इनके लाइसेंस से कोई लेनादेना नहीं है। - एसके सिंह यादव, जल निगम के अधिशासी अभियंता
नगरपालिका को इन आरओ प्लांटों से कोई लेनादेना नहीं है। इसके लिए लखनऊ में स्थित केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से अनुमति लेनी होती है। इसके बाद ही आरओ प्लांट लगाया जाता है। - ओमप्रकाश, नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी
इसे ड्रिकिंग वाटर कहा जा सकता है। अगर इन लोगों द्वारा पानी को बोतल में पैंकिंग कर बेचा जाता तो हम कार्रवाई कर सकते हैं लेकिन उन लोगों द्वारा ऐसा नहीं किया जाता है। इसलिए हमारे हाथ नियमों से बंधे हैं। वैसे इन लोगों द्वारा आपूर्ति किया जा रहा पानी हैंडपंप से निकलने वाले पानी से शुद्ध ही होगा।
- अभय सिंह, प्रभारी खाद्य अभिहित अधिकारी