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प्रवासी मजदूरों ने बयां किया दर्द, रोटी के पड़े लाले तो याद आया घर
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सूरत से आई ट्रेन से आजमगढ़ रेलवे स्टेशन पर पहुंचे मजदूर।
- फोटो : AZAMGARH
आजमगढ़। भले ही विभिन्न प्रदेशों की सरकारें दावा कर रही हों कि वह प्रवासी मजदूरों को अपने राज्य में सारी सुविधाएं मुहैया करा रही हैं, लेकिन आजमगढ़ स्टेशन पहुंचने वाले प्रवासी मजदूर जिस तरह से अपना दर्द बयां कर रहे हैं, उससे यह साबित हो रहा है कि सरकारी प्रयास जरूरत के मुताबिक काफी कम हैं। प्रवासी मजदूरों का दर्द राज्य सरकारों के खोखले दावों को भी हवा में उड़ा रहा है। दो जून की रोटी भी मिलनी मुश्किल हो गई तो कुछ दिनों तक गाड़ी उधार से चली। जब लाकडाउन तीसरे चरण में बढ़ा तो उनकी घर लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा।
हम जालंधर में पाइप फीटिंग का कार्य करते थे। लाक डाउन के बाद से काम मिलना बंद हो गया। जो पैसे थे उससे काम चलाया, फिर कुछ उधार भी लिया लेकिन कोई भी सरकारी सहायता हमें नहीं मिली। बृहस्पतिवार को हम जालंधर स्टेशन पर पहुंचे। जहां हमें रोटी, सब्जी और पानी की बोतल के साथ टिकट दिया गया। 12 बजे ट्रेन वहां से चली और शाम सात बजे हमें खिचड़ी और पानी की बोतल मुरादाबाद में मिली।
संतोष, महवलटांड़ा, तरवां।
हमारे पति छत की ढलाई का कार्य करते थे। 27 अप्रैल को घर आना था जिसका टिकट हमने पहले ही बुक करा रखा था। लाक डाउन के बाद ट्रेन कैंसल हो गई और घर आने के लिए जो पैसे रखे थे उसी से खाते थे। जब वह पैसे खत्म हो गए तो दूसरों से उधार लेकर पेट की आग बुझाते थे। कभी-कभी व्यवस्था न होने पर भूखे पेट भी सोना पड़ता था। प्रशासन से हमें कोई मदद नहीं मिली।
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मीना, बेनूपुर, मेंहनगर।
हम वहां पर मजदूरी करते थे। लाक डाउन के बाद काम मिलना बंद हो गया। पहले तो हम इस आशा में थे 15 दिन बाद खुल जाएगा फिर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जब यह आगे बढ़ गया तो हमारे पास पैसे की किल्लत हो गई। फिर हम एक समय भोजन करते थे। सरकार की सुविधा का लाभ देने के लिए हमसे आधार कार्ड और फोन नंबर लिया गया लेकिन हमें कोई सुविधा नहीं मिली।
कपिल, सादीपुर, मेहनाजपुर।
हमारे पति वहां रहकर ग्राइंडर चलाते थे। इसी से हमारी गृहस्थी चलती थी। लाक डाउन के बाद जब हमारे पास राशन नहीं था। जब हम राशन लेने निकलते थे तो पुलिस लाठी से मारती थी। वहीं दुकानदार भी हमारी मजबूरी का फायदा उठाते थे। 100 रुपये का सामान उनके द्वारा 150 रुपये में दिया जाता था। लेकिन लेते थे क्योंकि मजबूरी थी।
बतासी, हथिया, नगर कोतवाली।
हम जालंधर में रहकर ढ़लाई का कार्य करते थे। जब लाक डाउन घोषित हुआ तो हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं थे। धीरे- धीरे वह भी खत्म हो गए तब भूखों रहना पड़ा। फिर हमने राशन के लिए हाथ पैर मारना शुरू किया तो कुछ राशन मिला तब जाकर किसी तरह से काम चला। जैसे ही ट्रेन के चलने की जानकारी मिली हम वहां से चल दिए स्टेशन पर भोजन देने के साथ ही हमें ट्रेन में भी खिचड़ी और पानी की बोतल मिली थी।
प्रदीप, जगपतपुर सिंगरौली, अंबेडकर नगर।
हमारे पापा जालंधर में एक कंपनी में काम करते थे। परीक्षा खत्म होने के बाद हम लोग वहां पर घूमने के लिए गए थे। तभी लाक डाउन घोषित हो गया। जिसके घूमना तो दूर हम घरों में कैद होकर रह गए। राशन की अगर दिक्कत होती थी तो पापा कंपनी में फोन करते थे और कोई न कोई व्यवस्था हो जाती थी। जैसे ही ट्रेन चली हम घर के लिए रवाना हो गए।
संजना, अमरौला बनकट, मुबारकपुर।
हमारे पति ढलाई का काम करते थे। लाक डाउन के बाद काम मिलना बंद हो गया। इसके बाद हम लोग घरों में कैद हो गए। जो पैसे थे उससे खाते पीते थे। शासन प्रशासन की ओर से हमें कोई मदद नहीं मिली। ना तो राशन मिला और ना ही पैसा मिला। अगर हम बाहर निकलते थे तो पुलिस की लाठियां खानी पड़ती थी। इसलिए किसी दिन भूखे ही रहना पड़ता था।
मंदा, चौबाहे, मेहनाजपुर।
हम चीनी मिल में प्रयुक्त होने वाली चेन बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। लाक डाउन के बाद फैक्ट्री बंद हो गई। हम घरों में कैद हो गए। सरकार ने कंपनियों को अपने वर्करों को पैसे देने का निर्देश दिया था लेकिन हमें हमारी कंपनी की ओर से कोई पैसा नहीं मिला। सरकारी सहायता के नाम पर हमें सिर्फ एक बार पांच किग्रा चावल मिला था। किसी तरह से काम चलता था।
चंदर कुमार, अभिलाषन, जहानागंज।
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हम जालंधर में पाइप फीटिंग का कार्य करते थे। लाक डाउन के बाद से काम मिलना बंद हो गया। जो पैसे थे उससे काम चलाया, फिर कुछ उधार भी लिया लेकिन कोई भी सरकारी सहायता हमें नहीं मिली। बृहस्पतिवार को हम जालंधर स्टेशन पर पहुंचे। जहां हमें रोटी, सब्जी और पानी की बोतल के साथ टिकट दिया गया। 12 बजे ट्रेन वहां से चली और शाम सात बजे हमें खिचड़ी और पानी की बोतल मुरादाबाद में मिली।
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संतोष, महवलटांड़ा, तरवां।
हमारे पति छत की ढलाई का कार्य करते थे। 27 अप्रैल को घर आना था जिसका टिकट हमने पहले ही बुक करा रखा था। लाक डाउन के बाद ट्रेन कैंसल हो गई और घर आने के लिए जो पैसे रखे थे उसी से खाते थे। जब वह पैसे खत्म हो गए तो दूसरों से उधार लेकर पेट की आग बुझाते थे। कभी-कभी व्यवस्था न होने पर भूखे पेट भी सोना पड़ता था। प्रशासन से हमें कोई मदद नहीं मिली।
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मीना, बेनूपुर, मेंहनगर।
हम वहां पर मजदूरी करते थे। लाक डाउन के बाद काम मिलना बंद हो गया। पहले तो हम इस आशा में थे 15 दिन बाद खुल जाएगा फिर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जब यह आगे बढ़ गया तो हमारे पास पैसे की किल्लत हो गई। फिर हम एक समय भोजन करते थे। सरकार की सुविधा का लाभ देने के लिए हमसे आधार कार्ड और फोन नंबर लिया गया लेकिन हमें कोई सुविधा नहीं मिली।
कपिल, सादीपुर, मेहनाजपुर।
हमारे पति वहां रहकर ग्राइंडर चलाते थे। इसी से हमारी गृहस्थी चलती थी। लाक डाउन के बाद जब हमारे पास राशन नहीं था। जब हम राशन लेने निकलते थे तो पुलिस लाठी से मारती थी। वहीं दुकानदार भी हमारी मजबूरी का फायदा उठाते थे। 100 रुपये का सामान उनके द्वारा 150 रुपये में दिया जाता था। लेकिन लेते थे क्योंकि मजबूरी थी।
बतासी, हथिया, नगर कोतवाली।
हम जालंधर में रहकर ढ़लाई का कार्य करते थे। जब लाक डाउन घोषित हुआ तो हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं थे। धीरे- धीरे वह भी खत्म हो गए तब भूखों रहना पड़ा। फिर हमने राशन के लिए हाथ पैर मारना शुरू किया तो कुछ राशन मिला तब जाकर किसी तरह से काम चला। जैसे ही ट्रेन के चलने की जानकारी मिली हम वहां से चल दिए स्टेशन पर भोजन देने के साथ ही हमें ट्रेन में भी खिचड़ी और पानी की बोतल मिली थी।
प्रदीप, जगपतपुर सिंगरौली, अंबेडकर नगर।
हमारे पापा जालंधर में एक कंपनी में काम करते थे। परीक्षा खत्म होने के बाद हम लोग वहां पर घूमने के लिए गए थे। तभी लाक डाउन घोषित हो गया। जिसके घूमना तो दूर हम घरों में कैद होकर रह गए। राशन की अगर दिक्कत होती थी तो पापा कंपनी में फोन करते थे और कोई न कोई व्यवस्था हो जाती थी। जैसे ही ट्रेन चली हम घर के लिए रवाना हो गए।
संजना, अमरौला बनकट, मुबारकपुर।
हमारे पति ढलाई का काम करते थे। लाक डाउन के बाद काम मिलना बंद हो गया। इसके बाद हम लोग घरों में कैद हो गए। जो पैसे थे उससे खाते पीते थे। शासन प्रशासन की ओर से हमें कोई मदद नहीं मिली। ना तो राशन मिला और ना ही पैसा मिला। अगर हम बाहर निकलते थे तो पुलिस की लाठियां खानी पड़ती थी। इसलिए किसी दिन भूखे ही रहना पड़ता था।
मंदा, चौबाहे, मेहनाजपुर।
हम चीनी मिल में प्रयुक्त होने वाली चेन बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे। लाक डाउन के बाद फैक्ट्री बंद हो गई। हम घरों में कैद हो गए। सरकार ने कंपनियों को अपने वर्करों को पैसे देने का निर्देश दिया था लेकिन हमें हमारी कंपनी की ओर से कोई पैसा नहीं मिला। सरकारी सहायता के नाम पर हमें सिर्फ एक बार पांच किग्रा चावल मिला था। किसी तरह से काम चलता था।
चंदर कुमार, अभिलाषन, जहानागंज।

रेलवे स्टेशन पर बच्चे की थर्मल स्कैनिंग करता स्वास्थ्यकर्मी।- फोटो : AZAMGARH

रेलवे स्टेशन पर जालंधर से आई ट्रेन से उतरे यात्री।- फोटो : AZAMGARH

रेलवे स्टेशन पर जालंधर से आई ट्रेन से उतरे यात्री।- फोटो : AZAMGARH

जालंधर से ट्रेन से आजमगढ़ स्टेशन पर पहुंचे लोग, मेडिकल जांच के लिए खड़े।- फोटो : AZAMGARH