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एक कुर्सी पर टिके कइयों के ख्वाब
आजमगढ़/ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Mon, 11 Sep 2017 11:36 PM IST
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आजमगढ़। जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी खींचने और बचाने का दौर जोरों पर शुरू हो गया है। एक कुर्सी के जरिए कई रातनीतिक धुरंधर जहां कई तरह के अपने ख्वाब पूरा करने की फिराक में हैं। वहीं समर्थन में उतरे बाहुबलियों ने भी अपनी अलग गोटी फिट करने में जुटे हैं।
ऐसे में सदस्यों के ऊपर निर्भर करता है कि उन्हें कौन सा उम्मीदवार पसंद है। किसके बीच बैठकर वह विकास का एजेंडा तैयार करेंगे। यह फैसला 26 सितंबर को आयोजित बहस के बाद स्पष्ट हो जाएगा।
कभी पूर्व कैबिनेट मंत्री और अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के चुनाव से लेकर कारोबार तक की पूरी जिम्मेदारी संभालने वाले प्रमोद यादव की मंशा पहले से ही जिला पंचायत अध्यक्ष बनने की थी। वह इसके लिए पार्टी आलाकमान सहित जिले के अन्य बड़े नेताओं का आर्शिवाद भी प्राप्त कर लिया।
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लेकिन बीच में न जाने क्या हुआ कि प्रमोद का मामला गड़बड़ा गया। इस गड़बड़ी के लिए प्रमोद अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव को जिम्मेदार ठहराते हुए बगावती तेवर अपना लिए और विधान सभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी भूपेंद्र सिंह मुन्ना के समर्थन में खुलकर उतर गए।
हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद प्रमोद को कामयाबी नहीं मिली और जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर हवलदार यादव की बहु मीरा यादव निर्विरोध अध्यक्ष चुन ली गई। सूबे में सत्ता परिवर्तन होने के बाद प्रमोद ने जिला पंचायत की कुर्सी भी बदलने की ठान ली और तैयारी शुरू कर दी।
प्रमोद के मैदान में उतर जाने के बाद अपनी पार्टी में उपेक्षा का दंश झेल रहे भाजपा के एक बड़े नेता समेत एक पूर्व मंत्री ने भी प्रमोद को समर्थन दे दिया है। राजनीति के धुरंधर जहां जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी लेकर कई तरह के ख्वाब पूरा करने की फिराक में हैं। वहीं ठेके और डेंटरों पर बाहुबलियों की नजर है। ऐसे में सदस्यों को तय करना है कि उन्हें किसकी बादशाहत पसंद है।
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ऐसे में सदस्यों के ऊपर निर्भर करता है कि उन्हें कौन सा उम्मीदवार पसंद है। किसके बीच बैठकर वह विकास का एजेंडा तैयार करेंगे। यह फैसला 26 सितंबर को आयोजित बहस के बाद स्पष्ट हो जाएगा।
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कभी पूर्व कैबिनेट मंत्री और अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के चुनाव से लेकर कारोबार तक की पूरी जिम्मेदारी संभालने वाले प्रमोद यादव की मंशा पहले से ही जिला पंचायत अध्यक्ष बनने की थी। वह इसके लिए पार्टी आलाकमान सहित जिले के अन्य बड़े नेताओं का आर्शिवाद भी प्राप्त कर लिया।
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लेकिन बीच में न जाने क्या हुआ कि प्रमोद का मामला गड़बड़ा गया। इस गड़बड़ी के लिए प्रमोद अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव को जिम्मेदार ठहराते हुए बगावती तेवर अपना लिए और विधान सभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी भूपेंद्र सिंह मुन्ना के समर्थन में खुलकर उतर गए।
हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद प्रमोद को कामयाबी नहीं मिली और जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर हवलदार यादव की बहु मीरा यादव निर्विरोध अध्यक्ष चुन ली गई। सूबे में सत्ता परिवर्तन होने के बाद प्रमोद ने जिला पंचायत की कुर्सी भी बदलने की ठान ली और तैयारी शुरू कर दी।
प्रमोद के मैदान में उतर जाने के बाद अपनी पार्टी में उपेक्षा का दंश झेल रहे भाजपा के एक बड़े नेता समेत एक पूर्व मंत्री ने भी प्रमोद को समर्थन दे दिया है। राजनीति के धुरंधर जहां जिला पंचायत अध्यक्ष पद की कुर्सी लेकर कई तरह के ख्वाब पूरा करने की फिराक में हैं। वहीं ठेके और डेंटरों पर बाहुबलियों की नजर है। ऐसे में सदस्यों को तय करना है कि उन्हें किसकी बादशाहत पसंद है।