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Azamgarh News: 1930 में शिब्ली एकेडमी आए थे महात्मा गांधी, स्नान का स्थल और कुआं आज भी है संरक्षित
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दारुलमुसन्तेफीन शिब्ली एकेडमी। स्रोत-लाइब्रेरी
महात्मा गांधी का शिब्ली अकादमी के परिसर में आगमन इतिहास के पन्नों के सुनहरे अक्षरों में आज भी अंकित है। उन्होंने शाम की नमाज के वक्त शिब्ली एकेडमी में अपना कदम रखा था।
यहां आगमन के दौरान खातिरदारी से खुश होकर उन्होंने उर्दू में एक पत्र भी लिखा था, जो आज भी यहां मौजूद है। इतना ही नहीं, महात्मा गांधी ने एकेडमी के जिस कुएं से पानी लेकर चबूतरे पर बैठकर स्नान किया था, वह कुआं और चबूतरा दोनों संरक्षित हैं।
1857 के आजादी के संघर्षों से लेकर आजादी के लिए हुए सभी आंदोलनों में आजमगढ़ ने बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका अदा की है। आजमगढ़ ने हर कदम पर अपना भरपूर योगदान दिया है।
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इतिहास के पन्नों में आजमगढ़ का नाम स्वतंत्रता के लिए हुए संघर्षों के मुख्य केंद्रों के रूप में आज भी याद किया जाता है। आजमगढ़ की शिब्ली एकेडमी भी उन्हीं केंद्रों में से एक है, जहां महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू द्वारा कई बार दौरा किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह जगह रणनीतिक रूप से विशेष महत्वपूर्ण हुआ करती थी।
1929 का वह दौर, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां तेज हो रही थीं। इस दौरान महात्मा गांधी के कदम आजमगढ़ की सरजमीं पर पड़े थे। उनका शिब्ली अकादमी के परिसर में आगमन इतिहास के पन्नों के सुनहरे अक्षरों में आज भी अंकित है।
उन्होंने शाम की नमाज के वक्त शिब्ली एकेडमी में अपना कदम रखा था। महात्मा गांधी ने अपने आजमगढ़ प्रवास के दौरान शिब्ली एकेडमी के गेस्ट हाउस में प्रवास किया था। वहां स्थित एक कुएं पर स्नान भी किया था, जो आज भी इस परिसर में मौजूद है।
अकादमी के स्कॉलर उमैर सिद्दीक बताते हैं कि उस वक्त अकादमी के परिसर में नमाज चल रही थी। महात्मा गांधी का आगमन हुआ था। नमाज पढ़ते लोगों को देख उन्होंने अपने साथ के लोगों से शांत रहने का इशारा किया और नमाज पढ़ रहे लोगों के पीछे जाकर खुद बैठ गए।
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आजादी के दीवानों से एकेडमी में की थी मुलाकात
अपने आजमगढ़ आगमन के दौरान उन्होंने यहां पर मौजूद स्वतंत्रता सेनानियों से मुलाकात भी की थी और आजादी के संघर्षों की रणनीति पर चर्चा भी की थी। इसके बाद एकेडमी के प्रबंधन के साथ मिलकर तत्कालीन समय में मौजूद एकेडमी की लाइब्रेरी में भी गए थे। कुतुबखाने में रखी गई उर्दू की किताबों को भी लालटेन की रोशनी में देखा और पढ़ा था। अकादमी के प्रबंधन की अगवानी और खिदमत से खुश होकर गांधी जी ने लोगों का शुक्रिया अदा किया था और शिब्ली अकादमी की लाइब्रेरी के लिए एक चिट्ठी भी लिखी थी, जो आज भी यहां मौजूद है।
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महात्मा गांधी का उर्दू में लिखा खत लाइब्रेरी में मौजूद
महात्मा गांधी ने शिब्ली एकेडमी के तत्कालीन डायरेक्टर रहे मोहम्मद सैयद सुलेमान नदवी को भी उर्दू में पत्र लिखा था, जो आज भी शिब्ली एकेडमी की इस लाइब्रेरी में मौजूद है। तालीम की इस धरती के लिए गांधी जी द्वारा कई पत्र लिखे गए थे, जो यहां आज भी सुरक्षित रखे गए हैं।
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यहां आगमन के दौरान खातिरदारी से खुश होकर उन्होंने उर्दू में एक पत्र भी लिखा था, जो आज भी यहां मौजूद है। इतना ही नहीं, महात्मा गांधी ने एकेडमी के जिस कुएं से पानी लेकर चबूतरे पर बैठकर स्नान किया था, वह कुआं और चबूतरा दोनों संरक्षित हैं।
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1857 के आजादी के संघर्षों से लेकर आजादी के लिए हुए सभी आंदोलनों में आजमगढ़ ने बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका अदा की है। आजमगढ़ ने हर कदम पर अपना भरपूर योगदान दिया है।
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इतिहास के पन्नों में आजमगढ़ का नाम स्वतंत्रता के लिए हुए संघर्षों के मुख्य केंद्रों के रूप में आज भी याद किया जाता है। आजमगढ़ की शिब्ली एकेडमी भी उन्हीं केंद्रों में से एक है, जहां महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू द्वारा कई बार दौरा किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह जगह रणनीतिक रूप से विशेष महत्वपूर्ण हुआ करती थी।
1929 का वह दौर, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां तेज हो रही थीं। इस दौरान महात्मा गांधी के कदम आजमगढ़ की सरजमीं पर पड़े थे। उनका शिब्ली अकादमी के परिसर में आगमन इतिहास के पन्नों के सुनहरे अक्षरों में आज भी अंकित है।
उन्होंने शाम की नमाज के वक्त शिब्ली एकेडमी में अपना कदम रखा था। महात्मा गांधी ने अपने आजमगढ़ प्रवास के दौरान शिब्ली एकेडमी के गेस्ट हाउस में प्रवास किया था। वहां स्थित एक कुएं पर स्नान भी किया था, जो आज भी इस परिसर में मौजूद है।
अकादमी के स्कॉलर उमैर सिद्दीक बताते हैं कि उस वक्त अकादमी के परिसर में नमाज चल रही थी। महात्मा गांधी का आगमन हुआ था। नमाज पढ़ते लोगों को देख उन्होंने अपने साथ के लोगों से शांत रहने का इशारा किया और नमाज पढ़ रहे लोगों के पीछे जाकर खुद बैठ गए।
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आजादी के दीवानों से एकेडमी में की थी मुलाकात
अपने आजमगढ़ आगमन के दौरान उन्होंने यहां पर मौजूद स्वतंत्रता सेनानियों से मुलाकात भी की थी और आजादी के संघर्षों की रणनीति पर चर्चा भी की थी। इसके बाद एकेडमी के प्रबंधन के साथ मिलकर तत्कालीन समय में मौजूद एकेडमी की लाइब्रेरी में भी गए थे। कुतुबखाने में रखी गई उर्दू की किताबों को भी लालटेन की रोशनी में देखा और पढ़ा था। अकादमी के प्रबंधन की अगवानी और खिदमत से खुश होकर गांधी जी ने लोगों का शुक्रिया अदा किया था और शिब्ली अकादमी की लाइब्रेरी के लिए एक चिट्ठी भी लिखी थी, जो आज भी यहां मौजूद है।
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महात्मा गांधी का उर्दू में लिखा खत लाइब्रेरी में मौजूद
महात्मा गांधी ने शिब्ली एकेडमी के तत्कालीन डायरेक्टर रहे मोहम्मद सैयद सुलेमान नदवी को भी उर्दू में पत्र लिखा था, जो आज भी शिब्ली एकेडमी की इस लाइब्रेरी में मौजूद है। तालीम की इस धरती के लिए गांधी जी द्वारा कई पत्र लिखे गए थे, जो यहां आज भी सुरक्षित रखे गए हैं।

दारुलमुसन्तेफीन शिब्ली एकेडमी। स्रोत-लाइब्रेरी