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Azamgarh News: बीमा कंपनी 4.77 लाख रुपये 9 प्रतिशत ब्याज के साथ करें भुगतान
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आजमगढ़। इलाज के लिए पहले कैशलेस अप्रूवल देने के बाद मरीज को पुरानी बीमारी का हवाला देकर भुगतान से इन्कार करना बीमा कंपनी को भारी पड़ गया। उपभोक्ता फोरम ने पीड़ित महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को 4 लाख 77 हजार रुपये 9 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश दिया है।
आजमगढ़ निवासी अनुपमा ने बताया कि वह वर्ष 2017 में हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी कराई थी। बाद में यह पॉलिसी नीवा बूपा इंश्योरेंस कंपनी में शिफ्ट हो गई। वर्ष 2021 में अनुपमा की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ स्थित मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। परिजनों ने कैशलेस इलाज के लिए बीमा कंपनी से संपर्क किया, जिस पर कंपनी की ओर से इलाज का अप्रूवल दे दिया गया। इलाज शुरू होने के बाद जब डिस्चार्ज का समय आया तो बीमा कंपनी ने अचानक अपना अप्रूवल वापस लेते हुए अस्पताल को मरीज से पूरा भुगतान लेने का निर्देश दे दिया।
बीमा कंपनी के इस फैसले से मरीज और उसके परिजन मुश्किल में पड़ गए। परिजनों ने किसी तरह धन की व्यवस्था कर अस्पताल का भुगतान किया, जिसके बाद मरीज को डिस्चार्ज मिल सका। बीमा कंपनी के इस रवैये से नाराज होकर पीड़िता ने उपभोक्ता फोरम में वाद दाखिल किया।
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मामले की सुनवाई के दौरान उपभोक्ता फोरम ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का परीक्षण किया। अपने फैसले में फोरम ने कहा कि बीमा कंपनी केवल पुरानी बीमारी का हवाला देकर बीमा दावा खारिज नहीं कर सकती। यदि बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी की है, तो यह उसकी जिम्मेदारी थी कि बीमा करने से पहले संबंधित व्यक्ति का परीक्षण कराए। इलाज के दौरान भुगतान करना बीमा कंपनी का दायित्व है। फोरम ने मामले को सेवा में कमी मानते हुए बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह वादी को 4 लाख 77 हजार रुपये की धनराशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करे।
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आजमगढ़ निवासी अनुपमा ने बताया कि वह वर्ष 2017 में हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी कराई थी। बाद में यह पॉलिसी नीवा बूपा इंश्योरेंस कंपनी में शिफ्ट हो गई। वर्ष 2021 में अनुपमा की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ स्थित मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। परिजनों ने कैशलेस इलाज के लिए बीमा कंपनी से संपर्क किया, जिस पर कंपनी की ओर से इलाज का अप्रूवल दे दिया गया। इलाज शुरू होने के बाद जब डिस्चार्ज का समय आया तो बीमा कंपनी ने अचानक अपना अप्रूवल वापस लेते हुए अस्पताल को मरीज से पूरा भुगतान लेने का निर्देश दे दिया।
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बीमा कंपनी के इस फैसले से मरीज और उसके परिजन मुश्किल में पड़ गए। परिजनों ने किसी तरह धन की व्यवस्था कर अस्पताल का भुगतान किया, जिसके बाद मरीज को डिस्चार्ज मिल सका। बीमा कंपनी के इस रवैये से नाराज होकर पीड़िता ने उपभोक्ता फोरम में वाद दाखिल किया।
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मामले की सुनवाई के दौरान उपभोक्ता फोरम ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का परीक्षण किया। अपने फैसले में फोरम ने कहा कि बीमा कंपनी केवल पुरानी बीमारी का हवाला देकर बीमा दावा खारिज नहीं कर सकती। यदि बीमा कंपनी ने पॉलिसी जारी की है, तो यह उसकी जिम्मेदारी थी कि बीमा करने से पहले संबंधित व्यक्ति का परीक्षण कराए। इलाज के दौरान भुगतान करना बीमा कंपनी का दायित्व है। फोरम ने मामले को सेवा में कमी मानते हुए बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह वादी को 4 लाख 77 हजार रुपये की धनराशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करे।