{"_id":"66d8d5ee53ed1176e0082a74","slug":"fakir-singhs-thirteenth-birthday-will-happen-after-204-years-azamgarh-news-c-258-1-svns1001-120180-2024-09-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Azamgarh News: 204 साल बाद 8वीं पीढ़ी मनाएगी फकीर सिंह की तेरहवीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Azamgarh News: 204 साल बाद 8वीं पीढ़ी मनाएगी फकीर सिंह की तेरहवीं
विज्ञापन
बरदह। क्षेत्र के गोड़हरा गांव में एक अजब मामला प्रकाश में आया है। गांव के एक व्यक्ति द्वारा 204 साल बाद अपने एक पूर्वज का तेरहवीं करने का निर्णय लिया गया है। जिन्हें 1820 में बरतानिया हुकूमत के खिलाफ बगावत करने पर अंग्रेजों ने मारकर जंगल में एक पेड़ से बांधकर छोड़ दिया था। बाद में जंगली जानवरों ने अपना निवाला बना लिया था।
बताते हैं कि गोड़हरा गांव निवासी फकीर सिंह 1820 में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिए थे। बरतानिया हुकूमत के खिलाफ बगावत के चलते अंग्रेजों ने सन 1820 में उनको पकड़ने के बाद ऐसी सजा सुनाई कि लोगों की रूह कांप गई थी। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों ने फकीर सिंह को मारने के बाद जंगल में वृक्ष से बांधकर छोड़ दिया था। जिन्हें जंगली जानवरों ने अपना निवाला बना लिया था। जिसके कारण उनका न तो दाह संस्कार हो पाया था और न ही क्रिया कर्म ही घर वाले कर पाए थे। घर के बड़े बुजुर्गों से यह बातें लोग सुनते चले आ रहे हैं।
अब उनकी आठवीं पीढ़ी के प्रमोद सिंह ने 204 साल बाद स्वर्गीय फकीर सिंह की तेरहवीं और अन्य क्रिया कर्म करने का निर्णय लिया है। परिजन किसी अनहोनी की आशंका को मिटाने के लिए और गया पूजन के लिए ज्योतिष विशेषज्ञों के कहने पर अपने पूर्वज स्व. फकीर सिंह की 204 साल बाद शुद्ध एवं त्रयोदशाह का कार्यक्रम रखा है। उनकी तेरहवीं नौ सितंबर को रखी गई है। इसके बाद गतात्मा की पूर्ण शांति के बाद परिजन गया में पिंडदान के लिए अपने गांव से प्रस्थान करेंगे।
विज्ञापन
इस बारे में प्रमोद सिंह ने बताया कि हिंदू धर्म के अनुसार जब तक किसी व्यक्ति का विधि-विधान से क्रिया कर्म न किया जाता है तब तक उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। जिससे मन में हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। जिसे देखते हुए हमने अपने पूर्वज स्व. फकीर सिंह की तेरहवीं करने का निर्णय लिया है।
विज्ञापन
बताते हैं कि गोड़हरा गांव निवासी फकीर सिंह 1820 में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिए थे। बरतानिया हुकूमत के खिलाफ बगावत के चलते अंग्रेजों ने सन 1820 में उनको पकड़ने के बाद ऐसी सजा सुनाई कि लोगों की रूह कांप गई थी। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों ने फकीर सिंह को मारने के बाद जंगल में वृक्ष से बांधकर छोड़ दिया था। जिन्हें जंगली जानवरों ने अपना निवाला बना लिया था। जिसके कारण उनका न तो दाह संस्कार हो पाया था और न ही क्रिया कर्म ही घर वाले कर पाए थे। घर के बड़े बुजुर्गों से यह बातें लोग सुनते चले आ रहे हैं।
विज्ञापन
अब उनकी आठवीं पीढ़ी के प्रमोद सिंह ने 204 साल बाद स्वर्गीय फकीर सिंह की तेरहवीं और अन्य क्रिया कर्म करने का निर्णय लिया है। परिजन किसी अनहोनी की आशंका को मिटाने के लिए और गया पूजन के लिए ज्योतिष विशेषज्ञों के कहने पर अपने पूर्वज स्व. फकीर सिंह की 204 साल बाद शुद्ध एवं त्रयोदशाह का कार्यक्रम रखा है। उनकी तेरहवीं नौ सितंबर को रखी गई है। इसके बाद गतात्मा की पूर्ण शांति के बाद परिजन गया में पिंडदान के लिए अपने गांव से प्रस्थान करेंगे।
विज्ञापन
इस बारे में प्रमोद सिंह ने बताया कि हिंदू धर्म के अनुसार जब तक किसी व्यक्ति का विधि-विधान से क्रिया कर्म न किया जाता है तब तक उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। जिससे मन में हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। जिसे देखते हुए हमने अपने पूर्वज स्व. फकीर सिंह की तेरहवीं करने का निर्णय लिया है।