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जिला जेल ही नहीं, व्यवस्था भी है जर्जर

Sat, 02 Apr 2016 11:34 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़ Updated Sat, 02 Apr 2016 11:34 PM IST
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 District Jail , not too shabby arrangement
जिला जेल
 जर्जर भवन, संसाधन का अभाव और वर्ष 2007 में हुई जेलर दीपसागर की हत्या की घटना से जिला कारागार के अधिकारी और बंदी रक्षक हालात से समझौता कर नौकरी कर रहे हैं। इसका परिणाम है कि जिला जेल में कभी भी बंदीरक्षकों/अधिकारियों का बंदियों से संघर्ष नहीं हुआ। हां लचर व्यवस्था का लाभ उठाते हुए बंदियों के गुट में कई बार संघर्ष जरूर हो चुका है। इसके अलावा, निरीक्षण और छापेमारी में काफी अनधिकृत सामान बरामद हो चुके हैं। हालांकि, बंदियों को सुविधा मुहैय्या कराने के एवज में दस्तूर को पूरा करने में यहां के बंदी रक्षक अन्य जेलों की तरह पीछे नहीं है।
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बताते चले किसी जमाने में अंग्रेजों के घुड़साल रहे भवन को बाद में जेल की शक्ल दे दिया गया। इसकी क्षमता 320 बंदियों को रखने की है लेकिन यहां क्षमता से तीन गुने अधिक करीब 11 सौ बंदी निरूद्ध है। जेल की क्षमता के हिसाब से यहां स्वीकृत पदों में एक जेल अधीक्षक, एक जेलर और पांच डिप्टी जेलर का पद स्वीकृत है लेकिन बरवक्त एक डिप्टी जेलर के भरोसे चल संचालित है। 60 के स्थान पर मात्र 20 बंदी रक्षक तैनात हैं।
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एक बंदी रक्षक के भरोसे चार बैरक है। जबकि एक बैरक में 100 और उससे अधिक भी बंदी निरूद्ध हैं। इसके चलते जेल में निरूद्ध बंदियों के बीच कई बार खूनी संघर्ष हो चुका है। यही नहीं, लचर व्यवस्था के कारण जेल में छापेमारी के दौरान बंदियों के पास से मोबाइलें बरामद हो चुकीं हैं। जेल से कचहरी पेशी पर आए एक बंदी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जेल में दो तरह की व्यवस्था चलती है। इसके तहत नामीगिरामी बंदियों को कुछ भी करने की छूट हैं, जबकि अक्षम बंदियों को कोई भी सुविधा प्राप्त करने के लिए सुविधा शुल्क देना पड़ता है। निरुद्ध नामी बंदियों के भरोसे बंदी रक्षक अन्य छोटे बंदियों पर शिकंजा कसने का भी काम करते हैं।
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