वतन वापसीः अफगानिस्तान से आजमगढ़ अपने घर लौटे धर्मेंद्र, बताया- काबुल एयरपोर्ट पर क्या हुआ था
घर पहुंचते ही धर्मेंद्र ने सबसे पहले अपनी माता के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया। काबुल एयरपोर्ट के समीप ही एक स्टील प्लांट में फंसे 27 भारतीयों में धर्मेंद्र चौहान भी थे। भारतीयों के दल की देश वापसी रविवार को ही हुई थी।
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अफगानिस्तान के एक स्टील प्लांट में कार्य करने वाले आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर थाना क्षेत्र के नरावं गांव निवासी धर्मेंद्र चौहान सोमवार को घर पहुंच गए। घर पहुंचते ही धर्मेंद्र ने सबसे पहले अपनी माता के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
धर्मेंद्र चौहान ने बताया कि अफगानिस्तान में स्टील प्लांट से वह 20 अगस्त को 2:30 बजे दिन में घर के लिए निकला। सहकर्मियों के साथ बस से काबुल हवाई अड्डे पहुंचा तो वहां काफी भीड़ थी। एयरपोर्ट का गेट बंद कर दिया गया था। लोग देर तक गेट खुलने का इंतजार करते रहे लेकिन उसे खोला नहीं गया। शनिवार को दिन में 11 बजे वहां तालिबान पहुंच गए। सबका पासपोर्ट देखा और नाम-पता नोट किया। बस में सवार सभी यात्रियों को होटल में ले जाया गया। वहां भोजन में सब्जी, रोटी, चावल दिया गया।
उसके बाद उन्हें बाईपास गेट से आधी रात को काबुल एयरपोर्ट में प्रवेश कराया गया। भोर में चार बजे विमान ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी। विमान रविवार को आठ बजे सुबह हिंडन एयरपोर्ट पहुंचा। हवाई अड्डे की बस से ही उन्हें गाजियाबाद से चलकर शाम चार बजे दिल्ली भेजा गया। वहां से धर्मेंद्र अपने साथियों के साथ बस से गोरखपुर पहुंचा। गोरखपुर से जीयनपुर के रास्ते घर पहुंचा। घर पहुंचते ही माता मुलरी देवी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया।
सात कर्मचारियों को मिले दो-दो सौ डॉलर
धर्मेंद्र ने बताया कि चलते वक्त कंपनी ने स्टील प्लांट के सात कर्मचारियों को दो-दो सौ डॉलर दिए थे लेकिन बाद में जाने वाले वाले कर्मचारियों को खाली ही हाथ घर लौटना पड़ा। जब तक हम कंपनी में थे किसी प्रकार की दिक्कत नहीं थी लेकिन एयरपोर्ट का नजारा कुछ और ही था। वहां भगदड़ का माहौल था। हर कोई अफगानिस्तान छोड़कर जाना चाहता था। विमान में 161 यात्री थे, जिसमे 90 यात्री भारत के थे और शेष यात्रियों के बारे कोई जानकारी नहीं है।
दो साल में मात्र दो दिन निकला प्लांट से बाहर
धर्मेंद्र चौहान ने बताया कि वहां प्लांट में ही भोजन-पानी की व्यवस्था है। दो साल में मधुमेह का इलाज कराने के लिए दो दिन तक वह स्टील प्लांट परिसर से बाहर रहा। प्लांट का मालिक बहुत अच्छा था। हालत कुछ ऐसे बन गए कि वापस घर आना पड़ा अन्यथा कोई दिक्कत नहीं थी। इस दौरान हम लोग भारतीय दूतावास से बराबर संपर्क में थे। घर वालों से भी लगातार बातचीत होती रही।