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आजमगढ़ हिंदी साहित्य और संस्कृति का गौरवशाली केंद्र : डॉ मोहन झा

Sun, 14 Sep 2025 12:52 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 14 Sep 2025 12:52 AM IST
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Azamgarh is a glorious center of Hindi literature and culture: Dr. Mohan Jha
चक्रपानपुर। तमसा नदी के तट पर बसा यह शहर, हिंदी साहित्य, कला, संस्कृति और संगीत का एक ऐतिहासिक केंद्र है। हिंदी दिवस पर महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अतिथि शिक्षक डॉ मोहन झा ने अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा हिंदी दिवस पर आजमगढ़ की साहित्यिक धरोहर और इसकी महान हस्तियों के योगदान को याद करना प्रासंगिक है।
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उन्होंने कहा कि प्राचीन काल से ही यह भूमि ऋषि-मुनियों, विद्वानों, चिंतकों और स्वतंत्रता सेनानियों की कर्मस्थली रही है। सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा जैसे ऋषियों के आश्रमों से लेकर आधुनिक युग के साहित्यकारों तक, आजमगढ़ ने हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
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बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ (1855) भारतेंदु युग के प्रमुख कवि-लेखक थे। उनकी कृति भारत सौभाग्य और पत्रिका आनन्द कादम्बनी ने आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रचनाओं में देशप्रेम और सामाजिक चेतना झलकती है। अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (1865) ने खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास की रचना कर हिंदी साहित्य में क्रांति ला दी।
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आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय (1904) ने तसव्वुफ अथवा सूफीमत जैसी कृतियों के माध्यम से सूफी काव्य को हिंदी में स्थापित किया। पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र (1903) ने अपने नाटकों अशोक और सिंदूर की होली के जरिए भारतीय संस्कृति को जीवंत किया। डॉ. कन्हैया सिंह (1935) ने सूफी काव्य और पाठ-सम्पादन में उल्लेखनीय योगदान दिया, जबकि प्रो. तुलसीराम (1949) की आत्म कथाएं मुर्दहिया और मणि कर्णिका दलित साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

सांस्कृतिक और कलात्मक वैभव
अतिथि प्रवक्ता मनीषा सिंह ने कहा कि आजमगढ़ का हरिहरपुर संगीत घराना 500 वर्षों से शास्त्रीय संगीत की परंपरा को जीवित रखे हुए है। निजामाबाद के काली मिट्टी के बर्तन अपनी अनूठी नक्काशी के लिए विश्वविख्यात हैं। कला, हस्तशिल्प, स्थापत्य और मसालों के लिए भी यह शहर प्रसिद्ध है। हिंदी दिवस पर आजमगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को याद करना गर्व का विषय है।
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