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प्रशासन का तर्क, लाल बिहारी कभी मृतक थे ही नहीं
ब्यूरो,अमर उजाला,आजमगढ़
Updated Tue, 13 Mar 2018 12:30 AM IST
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Lal Bihari Mritak
लालबिहारी ‘मृतक’ प्रकरण में प्रशासन की ओर से एसडीएस सदर ने शासन के समक्ष पक्ष पेश किया। इसमें मामले में अब तक की गई प्रशासनिक कार्रवाई से अवगत कराया साथ ही ये साबित करने की भी कोशिश की गई है कि अभिलेखों में लालबिहारी कभी मृतक हुए ही नहीं थे। लोगों की नजरें हाईकोर्ट से होने वाली इस हाई प्रोफाइल फैसले पर टिकी हुई है।
लाल बिहारी ‘मृतक’ ने राजस्व अभिलेखों में मृत घोषित करने के मामले में हाईकोर्ट में 25 करोड़ के हर्जाने के लिए अपील कर रखी है। इस मामले में हाईकोर्ट ने पिछले दिनों शासन और प्रशासन से पूछा था कि लालबिहारी को मुआवजा क्यों न दिया जाए। साथ ही प्रशासन से मामले में अब तक हुई कार्रवाई से 13 मार्च को अवगत कराने के निर्देश दिया था।
पांच दिन पहले जिला प्रशासन का पक्ष लेकर एसडीएम सदर लखनऊ रवाना हुए थे। प्रशासन का कहना है कि लाल बिहारी कभी मृत घोषित ही नहीं हुए थे। 1988 और 94 की वोटर लिस्ट में उनका नाम है। इससे उनके मृतक घोषित होने की बात गलत है। एक साल की उम्र में ही उनकी मां उन्हें लेकर अमिलो चली गई थी।
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वो सात साल से ज्यादा समय तक खलीलाबाद में आए ही नहीं, इसी आधार पर उनका नाम राजस्व अभिलेखों से हटा होगा। यदि 1976 में तहसीलदार कोर्ट से उनका नाम हटाया गया तो उन्हें उसी समय ऊपरी कोर्ट में अपील करनी चाहिए थी। इसके साथ ही लालबिहारी के आर्थिक नुकसान के आरोप की भी काट तलाशी गई है। सभी सुबूतों को एसडीएम सदर की ओर से शासन को सौंपा जा चुका है। शासन की ओर से पूरी पत्रावली तैयार कर मंगलवार को हाईकोर्ट में पेश की जाएगी।
जबकि लाल बिहारी का कहना है कि 1976 में राजस्व अभिलेखों से उनका नाम हटाकर उन्हें ‘मृतक’ साबित कर दिया था। इसके लिए उन्होंने 1994 में कानूनी लड़ाई लड़ी। इसके बाद उनका नाम दर्ज किया गया। उन्होंने भी देर शाम लखनऊ जाने की तैयारी कर ली थी।
उनका कहना था कि वो अपने स्थान पर सही है। जवाब शासन-प्रशासन को देना है और फैसला हाईकोर्ट को करना है। उधर, इस हाईप्रोफाइल मामले को लेकर स्थानीय लोगों की नजरें भी हाईकोर्ट पर लगी हुई है। सभी हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार पक्ष और सभी सबूतों को एसडीएम सदर प्रशांत कुमार को लखनऊ भेजा गया है। उन्होंने पूरी पत्रावली उच्चाधिकारियों को दे दी है। शासन की ओर से 13 मार्च को अपना पक्ष रखा जाएगा। -सीबी सिंह, जिलाधिकारी
30 अन्य भी बन सकते हैं गले की फांस
लालबिहारी ने एक ‘मृतक’ संघ भी बना रखा है। बताते हैं कि संगठन में इस तरह के प्रकरण से संबंधित लोग शामिल है। यदि हाईकोर्ट की ओर से लालबिहारी को मुआवजा देने का कोई फैसला होता है तो निश्चित रूप से ये 30 भी प्रशासन के गले की फांस बन जाएंगे।
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लाल बिहारी ‘मृतक’ ने राजस्व अभिलेखों में मृत घोषित करने के मामले में हाईकोर्ट में 25 करोड़ के हर्जाने के लिए अपील कर रखी है। इस मामले में हाईकोर्ट ने पिछले दिनों शासन और प्रशासन से पूछा था कि लालबिहारी को मुआवजा क्यों न दिया जाए। साथ ही प्रशासन से मामले में अब तक हुई कार्रवाई से 13 मार्च को अवगत कराने के निर्देश दिया था।
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पांच दिन पहले जिला प्रशासन का पक्ष लेकर एसडीएम सदर लखनऊ रवाना हुए थे। प्रशासन का कहना है कि लाल बिहारी कभी मृत घोषित ही नहीं हुए थे। 1988 और 94 की वोटर लिस्ट में उनका नाम है। इससे उनके मृतक घोषित होने की बात गलत है। एक साल की उम्र में ही उनकी मां उन्हें लेकर अमिलो चली गई थी।
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वो सात साल से ज्यादा समय तक खलीलाबाद में आए ही नहीं, इसी आधार पर उनका नाम राजस्व अभिलेखों से हटा होगा। यदि 1976 में तहसीलदार कोर्ट से उनका नाम हटाया गया तो उन्हें उसी समय ऊपरी कोर्ट में अपील करनी चाहिए थी। इसके साथ ही लालबिहारी के आर्थिक नुकसान के आरोप की भी काट तलाशी गई है। सभी सुबूतों को एसडीएम सदर की ओर से शासन को सौंपा जा चुका है। शासन की ओर से पूरी पत्रावली तैयार कर मंगलवार को हाईकोर्ट में पेश की जाएगी।
जबकि लाल बिहारी का कहना है कि 1976 में राजस्व अभिलेखों से उनका नाम हटाकर उन्हें ‘मृतक’ साबित कर दिया था। इसके लिए उन्होंने 1994 में कानूनी लड़ाई लड़ी। इसके बाद उनका नाम दर्ज किया गया। उन्होंने भी देर शाम लखनऊ जाने की तैयारी कर ली थी।
उनका कहना था कि वो अपने स्थान पर सही है। जवाब शासन-प्रशासन को देना है और फैसला हाईकोर्ट को करना है। उधर, इस हाईप्रोफाइल मामले को लेकर स्थानीय लोगों की नजरें भी हाईकोर्ट पर लगी हुई है। सभी हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार पक्ष और सभी सबूतों को एसडीएम सदर प्रशांत कुमार को लखनऊ भेजा गया है। उन्होंने पूरी पत्रावली उच्चाधिकारियों को दे दी है। शासन की ओर से 13 मार्च को अपना पक्ष रखा जाएगा। -सीबी सिंह, जिलाधिकारी
30 अन्य भी बन सकते हैं गले की फांस
लालबिहारी ने एक ‘मृतक’ संघ भी बना रखा है। बताते हैं कि संगठन में इस तरह के प्रकरण से संबंधित लोग शामिल है। यदि हाईकोर्ट की ओर से लालबिहारी को मुआवजा देने का कोई फैसला होता है तो निश्चित रूप से ये 30 भी प्रशासन के गले की फांस बन जाएंगे।