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बाबा भंवरनाथ दरबार में उमड़ता है श्रद्घालुओं का रेला
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आजमगढ़। देश-विदेश में स्थापित शिव लिंगों में जहां काठमांडू के बाबा पशुपति नाथ, काशी के बाबा विश्वनाथ और देवघर के बाबा बैजनाथ धाम का विशेष महत्व माना जाता है। वहीं आजमगढ़ के लोगों के लिए बाबा भंवरनाथ के दर्शन-पूजन का खास महत्व है।
नगर के पश्चिमी छोर पर स्थित मंदिर के बारे में मान्यता है कि दर्शन-पूजन करने से बाबा भंवरनाथ अपने भक्तों को संकटों मुक्ति दिलाते हैं। शायद यही वजह है कि शिव आराधना का कोई भी पर्व आता है तो शहर एवं आसपास के लोग यहां जरूर पहुंचते हैं। बताया जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां भंवरनाथ नाम के एक वृद्ध संत आया करते थे और यहां पर अपनी गाय चराते थे। उन्हीं के समय में यहां एक शिवलिंग की स्थापना की गई थी। यहां एक तरफ उनकी गाय चरती थी तो दूसरी तरफ बाबा बैठकर शिव का ध्यान करते थे। उसी गाय चराने वाले बाबा के नाम पर आगे चलकर इस स्थान का नाम भंवरनाथ पड़ गया। मंदिर की स्थापना के बारे में बताया जाता है कि चार अक्तूबर 1951 को मंदिर की नींव रखी गई जो सात वर्षों बाद 13 दिसंबर 1958 में बनकर तैयार हो गया। अब यहां श्रद्धालुओं के लिए लगभग सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर बाबा की महिमा केवल शहर तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे जनपद के लोग बाबा का आशीर्वाद लेने आते रहते हैं। महाशिवरात्रि हो या फिर सावन का महीना, यहां लोग एक बार पहुंचकर बाबा का दर्शन करना नहीं भूलते। यहां तक कि इस क्षेत्र से बाबा धाम जाने वाले भक्त भी रवाना होने से पहले यहां जलाभिषेक करते हैं। शहर की सीमा के अंदर स्थापित सभी शिवालयों में दर्शन-पूजन के बाद यहां आए बगैर शिव की आराधना पूरी नहीं मानी जाती। लोगों का मानना है कि नाम के अनुसार यहां दर्शन करने से किसी भी संकट से मुक्ति मिल जाती है और बाबा भंवरनाथ अपने भक्तों की वर्ष पर्यंत सुरक्षा करते हैं।
इस बार अलग रूप में दिखेंगे बाबा भंवरनाथ
मंदिर के व्यवस्थापक विपिन सिंह डब्बू ने बताया कि मंदिर की साफ-सफाई और रंगरोगन का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। नंदी की पेंटिंग का कार्य कुछ बाकी है जिसे आज कल में पूरा कर लिया जाएगा। इस बार भक्तों को बाबा के अलग रूप के दर्शन मिलेंगे। वाराणसी हर सोमवार को बाबा के शृंगार के लिए अलग-अलग रंग के फूलों का आर्डर दिया जा चुका है। इसके साथ ही बाबा की हर सोमवार को अलग रंग की पगड़ी तैयार कराई गई है। यह पगड़ी महाकाल सरीखी होगी। महिलाओं द्वारा शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ ही नंदी पर भी जल चढ़ाया जाता है, इसलिए इस बार नंदी को शीशे से ढ़का जाएगा।
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नगर के पश्चिमी छोर पर स्थित मंदिर के बारे में मान्यता है कि दर्शन-पूजन करने से बाबा भंवरनाथ अपने भक्तों को संकटों मुक्ति दिलाते हैं। शायद यही वजह है कि शिव आराधना का कोई भी पर्व आता है तो शहर एवं आसपास के लोग यहां जरूर पहुंचते हैं। बताया जाता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व यहां भंवरनाथ नाम के एक वृद्ध संत आया करते थे और यहां पर अपनी गाय चराते थे। उन्हीं के समय में यहां एक शिवलिंग की स्थापना की गई थी। यहां एक तरफ उनकी गाय चरती थी तो दूसरी तरफ बाबा बैठकर शिव का ध्यान करते थे। उसी गाय चराने वाले बाबा के नाम पर आगे चलकर इस स्थान का नाम भंवरनाथ पड़ गया। मंदिर की स्थापना के बारे में बताया जाता है कि चार अक्तूबर 1951 को मंदिर की नींव रखी गई जो सात वर्षों बाद 13 दिसंबर 1958 में बनकर तैयार हो गया। अब यहां श्रद्धालुओं के लिए लगभग सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। कुल मिलाकर बाबा की महिमा केवल शहर तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे जनपद के लोग बाबा का आशीर्वाद लेने आते रहते हैं। महाशिवरात्रि हो या फिर सावन का महीना, यहां लोग एक बार पहुंचकर बाबा का दर्शन करना नहीं भूलते। यहां तक कि इस क्षेत्र से बाबा धाम जाने वाले भक्त भी रवाना होने से पहले यहां जलाभिषेक करते हैं। शहर की सीमा के अंदर स्थापित सभी शिवालयों में दर्शन-पूजन के बाद यहां आए बगैर शिव की आराधना पूरी नहीं मानी जाती। लोगों का मानना है कि नाम के अनुसार यहां दर्शन करने से किसी भी संकट से मुक्ति मिल जाती है और बाबा भंवरनाथ अपने भक्तों की वर्ष पर्यंत सुरक्षा करते हैं।
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इस बार अलग रूप में दिखेंगे बाबा भंवरनाथ
मंदिर के व्यवस्थापक विपिन सिंह डब्बू ने बताया कि मंदिर की साफ-सफाई और रंगरोगन का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। नंदी की पेंटिंग का कार्य कुछ बाकी है जिसे आज कल में पूरा कर लिया जाएगा। इस बार भक्तों को बाबा के अलग रूप के दर्शन मिलेंगे। वाराणसी हर सोमवार को बाबा के शृंगार के लिए अलग-अलग रंग के फूलों का आर्डर दिया जा चुका है। इसके साथ ही बाबा की हर सोमवार को अलग रंग की पगड़ी तैयार कराई गई है। यह पगड़ी महाकाल सरीखी होगी। महिलाओं द्वारा शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ ही नंदी पर भी जल चढ़ाया जाता है, इसलिए इस बार नंदी को शीशे से ढ़का जाएगा।
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