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धोखे के कारण दूसरी बार कुर्सी से दूर हुए प्रमोद
Updated Wed, 27 Sep 2017 12:03 AM IST
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आजमगढ़। पूर्व ब्लॉक प्रमुख और वर्तमान जिला पंचायत सदस्य प्रमोद कुमार यादव दूसरी बार जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पाने से वंचित रह गए। इस बार भी उन्होंने अपने साथ धोखा किए जाने का आरोप लगाया। इस धोखे से उनका राजनीतिक कैरियर एक बार फिर से हॉसिए पर आ गया है।
पल्हनी से ब्लॉक प्रमुख रहे प्रमोद यादव पूर्व वनमंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के भतीजे हैैं। उन्होंने दुर्गा प्रसाद यादव से ही राजनीति का ककहरा सीखा। वर्ष 2016 में जब जिला पंचायत सदस्य पद के चुनाव में उन्होंने हाफिजपुर निर्वाचन क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य पद का चुनाव लड़ा। सूत्रों की मानें तो जिले में सपा के एक दिग्गज ने उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने का सपना दिखाया। चुनाव उन्होंने रिकार्ड मतों से जीता। उस समय सपा दिग्गज शिवपाल सिंह यादव ने जब जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशियों की सूची जारी की तो उसमें प्रमोद कुमार यादव का नाम शामिल था, लेकिन बाद में इनका टिकट काटकर मीरा यादव को दे दिया गया। सपा की सत्ता होने के कारण मीरा यादव का निर्विरोध निर्वाचन हो गया। लेकिन टिकट कटने के बाद प्रमोद कुमार यादव अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के विरोधी हो गए और चाचा को ही टिकट कटने का जिम्मेदार ठहराया।
इसके बाद अपने चाचा से अलग होकर वे अपना राजनीति ठौर तलाशने लगे। विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के विरोध में बसपा प्रत्याशी भूपेंद्र सिंह मुन्ना का प्रचार भी किया। लेकिन चुुनाव दुर्गा प्रसाद यादव जीत गए। इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद दूसरा मौका पाकर सपा की जिला पंचायत अध्यक्ष मीरा यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए। लेकिन इस प्रस्ताव में उनके पास जरूरी जिला पंचायत सदस्य नहीं हो सके। इस दूसरी हार ने प्रमोद के राजनीतिक कैरियर को हासिए पर ला दिया है साथ ही उनकी छवि को भी धक्का लगा है।
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पल्हनी से ब्लॉक प्रमुख रहे प्रमोद यादव पूर्व वनमंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के भतीजे हैैं। उन्होंने दुर्गा प्रसाद यादव से ही राजनीति का ककहरा सीखा। वर्ष 2016 में जब जिला पंचायत सदस्य पद के चुनाव में उन्होंने हाफिजपुर निर्वाचन क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य पद का चुनाव लड़ा। सूत्रों की मानें तो जिले में सपा के एक दिग्गज ने उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने का सपना दिखाया। चुनाव उन्होंने रिकार्ड मतों से जीता। उस समय सपा दिग्गज शिवपाल सिंह यादव ने जब जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशियों की सूची जारी की तो उसमें प्रमोद कुमार यादव का नाम शामिल था, लेकिन बाद में इनका टिकट काटकर मीरा यादव को दे दिया गया। सपा की सत्ता होने के कारण मीरा यादव का निर्विरोध निर्वाचन हो गया। लेकिन टिकट कटने के बाद प्रमोद कुमार यादव अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के विरोधी हो गए और चाचा को ही टिकट कटने का जिम्मेदार ठहराया।
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इसके बाद अपने चाचा से अलग होकर वे अपना राजनीति ठौर तलाशने लगे। विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के विरोध में बसपा प्रत्याशी भूपेंद्र सिंह मुन्ना का प्रचार भी किया। लेकिन चुुनाव दुर्गा प्रसाद यादव जीत गए। इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद दूसरा मौका पाकर सपा की जिला पंचायत अध्यक्ष मीरा यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए। लेकिन इस प्रस्ताव में उनके पास जरूरी जिला पंचायत सदस्य नहीं हो सके। इस दूसरी हार ने प्रमोद के राजनीतिक कैरियर को हासिए पर ला दिया है साथ ही उनकी छवि को भी धक्का लगा है।
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