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ंविधान के अनुसार हिंदी को नहीं मिल सका वह दर्जा
Updated Tue, 19 Sep 2017 12:19 AM IST
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अतरौलिया। हिंदी दिवस के अवसर पर संदेश साहित्य परिषद की ओर से अतरौलिया में सोमवार को गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें वक्ताओं ने हिंदी की समृद्घता को लेकर अपने विचार व्यक्त किए।
अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार राजाराम सिंह ने हिंदी की सरलता सहजता व्यापकता और लोकप्रियता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज हिंदी भारत के हर प्रदेश में बोली और लिखी जा रही है। हिंदी का प्रचार-प्रसार अन्य प्रांतों के मनीषियों ने अपेक्षाकृत अधिक किया है। आजादी के बाद से अब तक हिंदी हमेशा राजनीति के घेरे में रही है यही कारण है कि हिंदी को अब तक वह दर्जा नहीं मिल सका जिसकी व्यवस्था संविधान में है। संविधान में शुरुआती दौर के केवल 15 वर्ष अंग्रेजी को राजकाज की भाषा के रूप में स्वीकृत दी गई थी। इसीलिए 1965 में 15 वर्ष पूरे होने पर जब फिर अंग्रेजी को देश पर लादने के लिए राजभाषा विधेयक लाया गया तो लोहिया जी ने पुरजोर विरोध किया था। उस समयऽ अंग्रेजी में काम ना होगा फिर से देश गुलाम न होगाऽ और %%गांधी लोहिया की अभिलाषा चले देश में देशी भाषाऽ के नारे बुलंद हो रहे थे। लेकिन राजनीति जीत गई और अंग्रेजी आज तक हिंदी की जगह बैठी है। उन्होंने कहा कि इस सब के बावजूद हिंदी लगातार आगे बढ़ रही है और संपन्न हो रही है। लेकिन हिंदी के हृदय प्रदेश उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का फार्चून के दूकान की तरफ खुलना और चलना बेहद चिंताजनक है। फिर भी हिंदी एक न एक दिन स्वत: अपने स्थान पर आरूढ़ हो जाएगी। इस मौके पर अरविंद मिश्र, संजय मिश्र, राजेंद्र प्रसाद यादव, प्रदीप सिंह आदि उपस्थित थे।
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अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार राजाराम सिंह ने हिंदी की सरलता सहजता व्यापकता और लोकप्रियता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज हिंदी भारत के हर प्रदेश में बोली और लिखी जा रही है। हिंदी का प्रचार-प्रसार अन्य प्रांतों के मनीषियों ने अपेक्षाकृत अधिक किया है। आजादी के बाद से अब तक हिंदी हमेशा राजनीति के घेरे में रही है यही कारण है कि हिंदी को अब तक वह दर्जा नहीं मिल सका जिसकी व्यवस्था संविधान में है। संविधान में शुरुआती दौर के केवल 15 वर्ष अंग्रेजी को राजकाज की भाषा के रूप में स्वीकृत दी गई थी। इसीलिए 1965 में 15 वर्ष पूरे होने पर जब फिर अंग्रेजी को देश पर लादने के लिए राजभाषा विधेयक लाया गया तो लोहिया जी ने पुरजोर विरोध किया था। उस समयऽ अंग्रेजी में काम ना होगा फिर से देश गुलाम न होगाऽ और %%गांधी लोहिया की अभिलाषा चले देश में देशी भाषाऽ के नारे बुलंद हो रहे थे। लेकिन राजनीति जीत गई और अंग्रेजी आज तक हिंदी की जगह बैठी है। उन्होंने कहा कि इस सब के बावजूद हिंदी लगातार आगे बढ़ रही है और संपन्न हो रही है। लेकिन हिंदी के हृदय प्रदेश उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का फार्चून के दूकान की तरफ खुलना और चलना बेहद चिंताजनक है। फिर भी हिंदी एक न एक दिन स्वत: अपने स्थान पर आरूढ़ हो जाएगी। इस मौके पर अरविंद मिश्र, संजय मिश्र, राजेंद्र प्रसाद यादव, प्रदीप सिंह आदि उपस्थित थे।
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