{"_id":"5aaff92f4f1c1ba6768b6769","slug":"201521482031-azamgarh-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पौराणिक कथाओं में भी मिलता है मां परमज्योति का उल्लेख","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पौराणिक कथाओं में भी मिलता है मां परमज्योति का उल्लेख
Updated Mon, 19 Mar 2018 11:23 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जहानागंज। विकास खंड के टाड़ी स्थित मां परमज्योति के प्रति श्रद्धालुओं के मन में असीम आस्था है। पूरे वर्ष दूर-दूर से मां के भक्त दर्शन और पूजन के लिए माता के दर्शन को आते हैं। मां के दरबार में जो भी मत्था टेकता है उसके सारे कष्ट और मनोकामना दूर होती है।
सदर तहसील के गंभीरवन गांव के पास स्थित भैसहीं ताल पर भैंसासुर नामक राक्षस का बहुत आतंक था। जिससे देवी देवता भी दहशत में रहते थे। देवताओं ने माता दुर्गा की आराधना की और उन्हें अपने भय के कारण भैंसासुर राक्षस से निजात दिलाने की मांग की। मां ने देवताओं के भय को दूर करने के लिए भैंसासुर का वध किया। भैंसासुर के रक्त से भैसहीं नदी बन गई। यहीं से एक ज्योति निकली और वह टाड़ी स्थित एक नीम के पेड़ पर जाकर समा गई। इसलिए इस जगह का नाम परमज्योति पड़ा। 1999 में रामानंद बरनवाल ने मंदिर को नए ढंग से बनवाना शुरू किया तो उसमें से माता की अष्टधातु की मूर्ति मिली। जो आज मंदिर में श्रद्धालुओं के दर्शन पूजन को लगाई गई है। रामानंद इस मंदिर के व्यवस्थापक हैं। वह बताते हैं कि पूरे वर्ष लोग यहां पर शादी-ब्याह, मुंडन आदि संस्कारों को यहां पर संपन्न कराते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त माता के दरबार में मत्था टेकता है उसके सारे कष्ट और समस्याओं का समाधान होता है। ब्यूरो
विज्ञापन
सदर तहसील के गंभीरवन गांव के पास स्थित भैसहीं ताल पर भैंसासुर नामक राक्षस का बहुत आतंक था। जिससे देवी देवता भी दहशत में रहते थे। देवताओं ने माता दुर्गा की आराधना की और उन्हें अपने भय के कारण भैंसासुर राक्षस से निजात दिलाने की मांग की। मां ने देवताओं के भय को दूर करने के लिए भैंसासुर का वध किया। भैंसासुर के रक्त से भैसहीं नदी बन गई। यहीं से एक ज्योति निकली और वह टाड़ी स्थित एक नीम के पेड़ पर जाकर समा गई। इसलिए इस जगह का नाम परमज्योति पड़ा। 1999 में रामानंद बरनवाल ने मंदिर को नए ढंग से बनवाना शुरू किया तो उसमें से माता की अष्टधातु की मूर्ति मिली। जो आज मंदिर में श्रद्धालुओं के दर्शन पूजन को लगाई गई है। रामानंद इस मंदिर के व्यवस्थापक हैं। वह बताते हैं कि पूरे वर्ष लोग यहां पर शादी-ब्याह, मुंडन आदि संस्कारों को यहां पर संपन्न कराते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त माता के दरबार में मत्था टेकता है उसके सारे कष्ट और समस्याओं का समाधान होता है। ब्यूरो
विज्ञापन