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नमाजियों की तादात के सामने मास्जिदें छोटी पड़ीं
Updated Sat, 26 May 2018 12:12 AM IST
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मेजवां। रमजानुल मुबारक के दूसरे जुमे को फूलपुर और ग्रामीण इलाकों की मस्जिदें नमाजियों से खचाखच भरी रहीं। नमाजियों की तादात के सामने मस्जिदें छोटी पड़ गई। अंदर जगह नहीं रही तो बाहर सफबन्दी की गई। इस दौरान उलेमा ने तकरीर के दौरान दूसरे अशरे की फ़जीलत बयान की। कहा कि रोजेदार पर अल्लाह की बेशुमार होती हैं। हर मुसलमान को चाहिए कि इस माह को अच्छी तरह कुरान की नसीहत के दायरे में गुजारे। बाद नमाज तरक्की की दुआ कराई। दूसरे जुमे को लोगों ने अपने बच्चों को पहला रोजा रखवाया। मस्जिदों के आसपास सफाई व्यवस्था चाक-चौबंद की गई थी। फूलपुर के चमावां गांव स्थित मस्जिद में मौलाना इमरान हैदर ने जुमे की नमाज पढ़ाई। कहा कि दूसरे की ग़ीबत करना सबसे बड़ा गुनाह है। नई जामा मस्जिद, मियां का बाड़ा, भेली मंडी, बाबू खां मस्जिद, अंसारी मुहल्ला पुरानी जुमा मस्जिद, फूलपुर देहात समेत ग्रामीण क्षेत्रों की मस्जिदों में जुमे की नमाज अकीदत के साथ अदा की गई।
मस्जिदों में प्रतिदिन हो रही तरावीह की नमाज
मुबारकपुर। रमजान मुबारक के पाक माह में नगर सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों की छोटी-बड़ी सभी मस्जिदों में प्रतिदिन 20 रकात तरावीह की नमाज अदा की जा रही है। तरावीह की नमाज रमजान का चांद दिखाई देते ही ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाती है। ईद का चांद दिखाई देने के साथ ही तरावीह का समापन किया जाता है। स्थानीय बाजार स्थित दारुल उलूम अहले सुन्नत मदरसा अशरफिया मिस्बाहुल उलूम में दुकानदारों की सुविधा के लिए प्रतिदिन पांच पारे के हिसाब से पांचवें रमजान को तरावीह मुकम्मल किए जाने की व्यवस्था की जाती है। इस वर्ष भी पांच रमजान को तरावीह मुकम्मल की गई। अधिक्तर मस्जिदों में 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29 शब में तरावीह मुकम्मल की जाती है।
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पुरानी मस्जिदों में एक है मस्जिद सैय्यद राजा मुबारक शाह
मुबारकपुर। क्षेत्र की सबसे पुरानी मस्जिदों में 12 से अधिक मस्जिदें 50 वर्ष से अधिक की हैं। मुहल्ला पुरानी बस्ती स्थित मस्जिद सैय्यद राजा मुबारक शाह के नाम से बनाई गई है। ये प्रसिद्ध सूफ़ी और बुजुर्ग रहे हैं। मुबारकपुर का पुराना नाम कासिमाबाद था। धीरे-धीरे कासिमाबाद खंडहर हो गया। उसी समय प्रसिद्ध सूफी सैय्यद राजा मुबारक शाह कड़ा मानिकपुर से चलकर तब्लीग़ के लिए आए थे। उन्हीं के नाम से एक बार पुन: मुबारकपुर के नाम से ये कस्बा आबाद हुआ। उन्ही के नाम से मस्जिद भी बनवाई गई जो आजतक मौजूद है।
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आखिरी अशरे में मस्जिदों में रह कर होती है इबादत
मुबारकपुर। रहमतों, बरकतों वाले माह रमजानुल मुबारक के आखिरी अशरे में 20वें रमजान को बाद नमाजे असर मस्जिद में जाकर इबादत करते है। अधिक्तर मस्जिदों में लोग दो, चार, दस की संख्या में प्रतिवर्ष मस्जिद में ही रहते है यहां उनके परिवार के सदस्य सेहरी के साथ इफ्तारी की व्यवस्था करते हैं। यह सिलसिला 10 दिनों तक चलता रहता है। ईद का चांद दिखाई देने पर ही एतकाफ में बैठे लोग मस्जिद से निकलकर अपने अपने घरों को जाते हैं।
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अल्लाह ने दिया है जकात और फितरा अदा करने का हुक्म
मुबारकपुर। रमजान के मुबारक महीने में जिस प्रकार इबादत करने का हुक्म है, वहीं ग़रीबों, मिस्कीनों, असहाय और मजबूर लोगों की मदद भी करने के लिए जकात और फितरा अदा करने का हुक्म है। इसके लिए इस्लाम में एक तरीका बताया गया है। जिसके पास साढ़े सात तोला सोना अथवा साढ़े बावन तोला चांदी अथवा उसके बराबर धन हो तो ऐसे लोगों के लिए हुक्म है कि वह उस धन का ढाई प्रतिशत जकात, सहित फितरा अदा करें। पास, पड़ोस अथवा रिश्तेदार जो कि ग़रीब हों अथवा जहां मिस्कीन, ग़रीब बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हों उन संस्थाओं को दें। जो लोग साहबे हैसियत नहीं हैं और जकात देने की स्थिति में नहीं है तो वह अपने और अपने परिवार के सदस्यों की ओर से फितरा की रक़म अदा करना अनिवार्य है।
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बाजार में दिखने लगी रौनक
मुबारकपुर। रमजानुल मुबारक का महीना जैसे-जैसे गुजर रहा है वैसे वैसे ईद का त्योहार भी नजदीक आ रहा है। बाजारों में चहल-पहल काफी बढ़ गई है। शाम के समय तो बाजारों में इतनी काफी भीड़ हो जाती है कि रास्ता चलना दूभर हो जाता। ईद की भी तैयारी भी हर्षोल्लास के साथ की जा रही है। क़स्बा सहित आसपास के दर्जनों गांव, अमिलो, चकिया, इब्राहिमपुर, डिलियां, देवली, कुकुरसंडा, गजहड़ा, लोहरा, इस्लामपुरा, नया पूरा, सिकठी, मुस्तफाबाद, चांड़ी, सराय मुबारक, ढकवा, सालारपुर आदि क्षेत्रों की महिलाओं की बाजारों में काफी भीड़ है। त्योहार पर कपड़ों की खरीदारी में व्यस्त रहती हैं। इफ्तारी के लिए आम, अनार, सेब, सन्तरा, खरबूजा, केले की बिक्री अधिक हो गई है। पिछले वर्ष की तुलना में कपड़ों, जूते, चप्पल अदि के दाम में डेढ़ गुना वृद्धि हुई है। चाहे वह कपड़ा हो अथवा रेडीमेड हो सभी के दामों में वृद्धि हुई है। इस बार ईद के कपड़ों में रेडीमेड की दुकानों पर काफी भीड़ दिखाई दे रही है।
मस्जिदों में प्रतिदिन हो रही तरावीह की नमाज
मुबारकपुर। रमजान मुबारक के पाक माह में नगर सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों की छोटी-बड़ी सभी मस्जिदों में प्रतिदिन 20 रकात तरावीह की नमाज अदा की जा रही है। तरावीह की नमाज रमजान का चांद दिखाई देते ही ईशा की नमाज के बाद पढ़ी जाती है। ईद का चांद दिखाई देने के साथ ही तरावीह का समापन किया जाता है। स्थानीय बाजार स्थित दारुल उलूम अहले सुन्नत मदरसा अशरफिया मिस्बाहुल उलूम में दुकानदारों की सुविधा के लिए प्रतिदिन पांच पारे के हिसाब से पांचवें रमजान को तरावीह मुकम्मल किए जाने की व्यवस्था की जाती है। इस वर्ष भी पांच रमजान को तरावीह मुकम्मल की गई। अधिक्तर मस्जिदों में 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29 शब में तरावीह मुकम्मल की जाती है।
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पुरानी मस्जिदों में एक है मस्जिद सैय्यद राजा मुबारक शाह
मुबारकपुर। क्षेत्र की सबसे पुरानी मस्जिदों में 12 से अधिक मस्जिदें 50 वर्ष से अधिक की हैं। मुहल्ला पुरानी बस्ती स्थित मस्जिद सैय्यद राजा मुबारक शाह के नाम से बनाई गई है। ये प्रसिद्ध सूफ़ी और बुजुर्ग रहे हैं। मुबारकपुर का पुराना नाम कासिमाबाद था। धीरे-धीरे कासिमाबाद खंडहर हो गया। उसी समय प्रसिद्ध सूफी सैय्यद राजा मुबारक शाह कड़ा मानिकपुर से चलकर तब्लीग़ के लिए आए थे। उन्हीं के नाम से एक बार पुन: मुबारकपुर के नाम से ये कस्बा आबाद हुआ। उन्ही के नाम से मस्जिद भी बनवाई गई जो आजतक मौजूद है।
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आखिरी अशरे में मस्जिदों में रह कर होती है इबादत
मुबारकपुर। रहमतों, बरकतों वाले माह रमजानुल मुबारक के आखिरी अशरे में 20वें रमजान को बाद नमाजे असर मस्जिद में जाकर इबादत करते है। अधिक्तर मस्जिदों में लोग दो, चार, दस की संख्या में प्रतिवर्ष मस्जिद में ही रहते है यहां उनके परिवार के सदस्य सेहरी के साथ इफ्तारी की व्यवस्था करते हैं। यह सिलसिला 10 दिनों तक चलता रहता है। ईद का चांद दिखाई देने पर ही एतकाफ में बैठे लोग मस्जिद से निकलकर अपने अपने घरों को जाते हैं।
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अल्लाह ने दिया है जकात और फितरा अदा करने का हुक्म
मुबारकपुर। रमजान के मुबारक महीने में जिस प्रकार इबादत करने का हुक्म है, वहीं ग़रीबों, मिस्कीनों, असहाय और मजबूर लोगों की मदद भी करने के लिए जकात और फितरा अदा करने का हुक्म है। इसके लिए इस्लाम में एक तरीका बताया गया है। जिसके पास साढ़े सात तोला सोना अथवा साढ़े बावन तोला चांदी अथवा उसके बराबर धन हो तो ऐसे लोगों के लिए हुक्म है कि वह उस धन का ढाई प्रतिशत जकात, सहित फितरा अदा करें। पास, पड़ोस अथवा रिश्तेदार जो कि ग़रीब हों अथवा जहां मिस्कीन, ग़रीब बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हों उन संस्थाओं को दें। जो लोग साहबे हैसियत नहीं हैं और जकात देने की स्थिति में नहीं है तो वह अपने और अपने परिवार के सदस्यों की ओर से फितरा की रक़म अदा करना अनिवार्य है।
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बाजार में दिखने लगी रौनक
मुबारकपुर। रमजानुल मुबारक का महीना जैसे-जैसे गुजर रहा है वैसे वैसे ईद का त्योहार भी नजदीक आ रहा है। बाजारों में चहल-पहल काफी बढ़ गई है। शाम के समय तो बाजारों में इतनी काफी भीड़ हो जाती है कि रास्ता चलना दूभर हो जाता। ईद की भी तैयारी भी हर्षोल्लास के साथ की जा रही है। क़स्बा सहित आसपास के दर्जनों गांव, अमिलो, चकिया, इब्राहिमपुर, डिलियां, देवली, कुकुरसंडा, गजहड़ा, लोहरा, इस्लामपुरा, नया पूरा, सिकठी, मुस्तफाबाद, चांड़ी, सराय मुबारक, ढकवा, सालारपुर आदि क्षेत्रों की महिलाओं की बाजारों में काफी भीड़ है। त्योहार पर कपड़ों की खरीदारी में व्यस्त रहती हैं। इफ्तारी के लिए आम, अनार, सेब, सन्तरा, खरबूजा, केले की बिक्री अधिक हो गई है। पिछले वर्ष की तुलना में कपड़ों, जूते, चप्पल अदि के दाम में डेढ़ गुना वृद्धि हुई है। चाहे वह कपड़ा हो अथवा रेडीमेड हो सभी के दामों में वृद्धि हुई है। इस बार ईद के कपड़ों में रेडीमेड की दुकानों पर काफी भीड़ दिखाई दे रही है।