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यहां हिंदू मनाते हैं मुहर्रम, निकाले हैं ताजिए
Updated Wed, 04 Oct 2017 12:11 AM IST
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सगड़ी। धार्मिक एकता को चरितार्थ करता है सगड़ी तहसील का डोरवा गांव। पूरा गांव हिंदू, फिर भी न सिर्फ सभी मिलकर मुहर्रम मनाते हैं, बल्कि पूरे जोश ओ खरोश के साथ ताजिया भी निकालते हैं।
सगड़ी तहसील क्षेत्र के डोरवा गांव के चौहान बस्ती 125 से अधिक घर हैं। सभी मिलकर मुहर्रम मनाते हैं और ताजिया निकालते हैं। दो सौ वर्षों से ये क्रम जा रही है। यहां का ताजिया पूरे पूर्वांचल में मशहूर है। दूरदराज से लोग यहां मोहर्रम पर ताजिए का जुलूस देखने आते हैं। यहां ताजिया बनाने के लिए चार सोने के झूमर और 16 चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी। आज भी इसका प्रयोग ताजिया बनाने में किया जाता है। ताजिया रखने के लिए यहां इमामबाड़ा भी बनाया गया है। गांव में दो सौ साल पुराना तंबू भी मौजूद है। इसे रामदीन और अन्य सहयोगियों ने मिलकर छह महीने में अपने हाथों से तैयार किया था। मुहर्रम के समय इसका प्रयोग किया जाता है।
पूरी हुई मनौती, आगे बढ़ा वंश
सगड़ी। डोरवा गांव चौहान बस्ती में मुहर्रम के आयोजन के बारे में लोगों ने बताया कि दो सौ वर्ष चौहान बस्ती में एक ही परिवार था। मुखिया का नाम था टोकरी। इसके बेटे धर्मू को कोई संतान नहीं थी। एक दिन एक फकीर ने अंजान शहीद में निकलने वाले ताजिए पर जाकर प्रार्थना करने की सलाह दी।
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कहते हैं कि एक साल के अंदर ही उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उन्हें चार बेटे हुए। आज 125 से अधिक घर चौहान बस्ती में हैं। तभी से लोग मुहर्रम में ताजिया अपने हाथों से बनाते हैं और मुहर्रम मनाते हैं।
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सगड़ी तहसील क्षेत्र के डोरवा गांव के चौहान बस्ती 125 से अधिक घर हैं। सभी मिलकर मुहर्रम मनाते हैं और ताजिया निकालते हैं। दो सौ वर्षों से ये क्रम जा रही है। यहां का ताजिया पूरे पूर्वांचल में मशहूर है। दूरदराज से लोग यहां मोहर्रम पर ताजिए का जुलूस देखने आते हैं। यहां ताजिया बनाने के लिए चार सोने के झूमर और 16 चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी। आज भी इसका प्रयोग ताजिया बनाने में किया जाता है। ताजिया रखने के लिए यहां इमामबाड़ा भी बनाया गया है। गांव में दो सौ साल पुराना तंबू भी मौजूद है। इसे रामदीन और अन्य सहयोगियों ने मिलकर छह महीने में अपने हाथों से तैयार किया था। मुहर्रम के समय इसका प्रयोग किया जाता है।
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पूरी हुई मनौती, आगे बढ़ा वंश
सगड़ी। डोरवा गांव चौहान बस्ती में मुहर्रम के आयोजन के बारे में लोगों ने बताया कि दो सौ वर्ष चौहान बस्ती में एक ही परिवार था। मुखिया का नाम था टोकरी। इसके बेटे धर्मू को कोई संतान नहीं थी। एक दिन एक फकीर ने अंजान शहीद में निकलने वाले ताजिए पर जाकर प्रार्थना करने की सलाह दी।
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कहते हैं कि एक साल के अंदर ही उनकी मनोकामना पूर्ण हुई और उन्हें चार बेटे हुए। आज 125 से अधिक घर चौहान बस्ती में हैं। तभी से लोग मुहर्रम में ताजिया अपने हाथों से बनाते हैं और मुहर्रम मनाते हैं।