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Ayodhya News: लावारिसों काे किसी अस्पताल में नहीं मिल रहा ठिकाना

Mon, 10 Nov 2025 07:58 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Mon, 10 Nov 2025 07:58 PM IST
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The abandoned are not getting shelter in any hospital
अयोध्या। जिले के किसी भी अस्पताल में लावारिसों को ठिकाना नहीं मिल पा रहा है। या तो उनके इलाज में अमानवीयता की जा रही है या उन्हें रेफर कर दिया जा रहा है। सोमवार को एंबुलेंस चालक ऐसे ही एक मरीज को लेकर इधर-उधर भटकता रहा, लेकिन उसे समुचित इलाज नहीं मिल सका।
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पैर में घाव होने से एक लावारिस मरीज जिला अस्पताल में भर्ती था। वहां भर्ती एक अन्य मरीज से अमानवीयता की वीडियो वायरल होने के बाद अस्पताल प्रशासन ने अपनी जान छुड़ाने के लिए मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। 108 एंबुलेंस से उसे मेडिकल काॅलेज पहुंचाया गया तो वहां चिकित्सकों ने भर्ती करने से इन्कार कर दिया।
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उनका दावा था कि मरीज का जिला अस्पताल में ही इलाज संभव है। फिर भी जान-बूझकर उसे रेफर किया जा रहा है। करीब दो घंटे तक एंबुलेंस चालक जद्दोजहद करते रहे, लेकिन उसे ठिकाना नहीं मिला तो वापस जिला अस्पताल लाया गया, जहां उसे फिर से भर्ती किया गया। वहीं, सूत्रों के अनुसार यही मरीज पहले श्रीराम अस्पताल में भर्ती था, जिसे जिला अस्पताल भेजा गया था।
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दोनों अस्पतालों में नहीं है लावारिस वार्ड
जिला अस्पताल में पहले लावारिस वार्ड था, जहां ऐसे रोगियों का इलाज किया जाता था। बीते वर्ष लावारिस रोगियों की दुर्दशा का वीडियो वायरल होने के बाद अस्पताल प्रशासन से यह वार्ड बंद कर दिया। वहीं, मेडिकल कॉलेज में लावारिस रोगियों के लिए कोई वार्ड नहीं बन सका है। ऐसे में लावारिसों की कहीं सुनवाई नहीं है।

हाथ-पैर बांधने वाले मरीज की मौत
पांच नवंबर से जिला अस्पताल में भर्ती जिस मरीज के हाथ-पैर बांधने की तस्वीर वायरल हुई थी, उसे रविवार को मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया था। वहां पहुंचे बीकापुर के सरायभनौली निवासी राहुल निषाद ने मरीज की पहचान अपने चाचा सालिकराम के रूप में की। इसके बाद वह मरीज अपने घर लेकर चले गए, जहां उनकी मौत हो गई।


जिला अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अजय चौधरी ने बताया कि मरीज को बेहतर इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। वहां भर्ती नहीं किया गया तो दोबारा भर्ती करके इलाज किया जा रहा है। वहीं, प्राचार्य डॉ. सत्यजीत वर्मा ने बताया कि मरीज का जिला अस्पताल स्तर पर ही इलाज संभव था।
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