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Ayodhya News: शून्य से शिखर तक... एक ऐतिहासिक यात्रा

Wed, 16 Apr 2025 09:49 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Wed, 16 Apr 2025 09:49 PM IST
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From zero to the top... a historic journey
अयोध्या। कभी अकल्पनीय हो चुकी कल्पना ने साकार रूप ले लिया है। शून्य से शिखर तक की यह यात्रा केवल मंदिर के पत्थरों की कहानी नहीं है, यह उस विश्वास की कहानी है जो पीढ़ियों तक लोगों के हृदय में जीवित रहा। 500 सालों के संघर्ष के बाद भव्य राम मंदिर में रामभक्त रामलला के दर्शन कर पा रहे हैं। राम मंदिर 1200 करोड़ की लागत से 56 माह में बनकर तैयार हुआ है। नागर शैली में बने राममंदिर में वंशी पहाड़पुर के करीब 4़ 50 लाख क्यूबिक लाल पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है। यह तकनीक व स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है।
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सदियों के संघर्ष, आस्था, और इंतजार के बाद राम नगरी में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण अब पूर्ण हो चुका है। यह भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। राम जन्मभूमि विवाद वर्षों तक अदालतों में चला और नौ नवंबर 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। न्यायालय ने अपने सर्वसम्मत निर्णय में स्पष्ट किया कि विवादित भूमि रामलला विराजमान की थी और वहीं मंदिर निर्माण की अनुमति दी गई।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच अगस्त 2020 को मंदिर निर्माण का भूमि पूजन किया। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से निर्माण कार्य की निगरानी की गई। पत्थरों की नक्काशी, शिल्पकला और वैदिक परंपराओं का समावेश करते हुए मंदिर का निर्माण वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण बन गया। नागर शैली में निर्मित यह मंदिर 380 फीट लंबा, 250 फीट चौड़ा और 161 फीट ऊंचा है। तीन मंजिला इस मंदिर में कुल 392 स्तंभ हैं, जो प्राचीन भारतीय शिल्पकला की गौरवगाथा कहते हैं। मंदिर की नींव 50 फीट गहरी पत्थरों की चट्टान पर बनी है। मंदिर एक हजार साल तक प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रहेगा।
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राम मंदिर को लेकर संघर्ष 1528 में तब से चल रहा था, जब कहा जाता है कि बाबर के सेनापति मीर बाकी ने मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना दी थी। वर्ष 1949 तक हिंदुओं ने इस स्थल की मुक्ति के लिए 76 युद्ध लड़े। इनमें कई लोग मारे गए। पर, जिस लड़ाई के बाद मंदिर निर्माण की शुरुआत हुई, उसकी पूरी पटकथा 22-23 दिसंबर, 1949 को लिखी गई, जब विवादित परिसर में रामलला का प्राकट्य हुआ। संघर्ष तो इसके बाद भी हुए और 1990 में सुरक्षा बलों की गोलियों से कारसेवकों की मौत और छह दिसंबर, 1992 को ढांचा ध्वंस जैसी घटनाएं भी घटीं, लेकिन सफलता 1949 में लिखी गई संघर्ष की पटकथा को ही मिली।
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