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मॉकड्रिल : मॉकड्रिल ने कराया 1971 के भारत-पाक युद्ध का एहसास
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औरैया। जिले के पुलिस व प्रशासन की ओर से बुधवार को स्कूलों से लेकर शहर कस्बों व गांवों में मॉकड्रिल व ब्लैक आउट को लेकर सजग किया गया।
जगह-जगह पैदल गश्त व जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुए। इसकी जानकारी जैसे ही बूढ़े बुजुर्गों को लगी तो उनकी जुबां पर 1971 के भारत-पाक युद्ध की यादें उभर आईं। बुजुर्ग बोले कि भारत-पाक के बीच तनाव के उस दौर में शाम छह बजते ही शहर कस्बे की बिजली गुल हो जाती थी। अंधेरा छा जाता था। लोग टॉर्च जलाने से भी किनारा करते थे। मकसद बस एक था कि दुश्मन देश को रिहायसी क्षेत्र की भनक न लगे।
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शहर के मोहल्ला तिलकनगर निवासी महेश दत्त बताते हैं कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सभी का खून खौला था। सेना बॉर्डर पर थी। शहर कस्बा में हवाई हमले की संभावना को लेकर ब्लैक आउट लागू कर दिया गया था। ऐसे में शाम छह बजते ही लाइटें बंद कर दी जाती थीं। रेडियो पर महज युद्ध से जुड़ी जानकारी कमरे में दुबककर सुना करते थे। लोगों को उस दौर में भी आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया गया था।
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शहर के लेडीज मार्केट निवासी कैलाश चंद्र ने बताया कि उन दिनों वह युवा थे। शहर का अच्छा खासा बाजार भी था, लेकिन शाम छह बजते ही बाजार बंद हो जाता था। दिन में ही लोग खरीदारी करते थे। शाम को सभी लोग घर में समय से खाना-पीना करने के बाद सो जाते थे। पुलिस भी गली मोहल्लों में घूमकर लोगों को जागरूक करती थी। सायरन बजते थे। आज एक बार फिर से उसी दौर की यादें मॉकड्रिल से ताजा हो गई हैं।
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जगह-जगह पैदल गश्त व जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुए। इसकी जानकारी जैसे ही बूढ़े बुजुर्गों को लगी तो उनकी जुबां पर 1971 के भारत-पाक युद्ध की यादें उभर आईं। बुजुर्ग बोले कि भारत-पाक के बीच तनाव के उस दौर में शाम छह बजते ही शहर कस्बे की बिजली गुल हो जाती थी। अंधेरा छा जाता था। लोग टॉर्च जलाने से भी किनारा करते थे। मकसद बस एक था कि दुश्मन देश को रिहायसी क्षेत्र की भनक न लगे।
शहर के मोहल्ला तिलकनगर निवासी महेश दत्त बताते हैं कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सभी का खून खौला था। सेना बॉर्डर पर थी। शहर कस्बा में हवाई हमले की संभावना को लेकर ब्लैक आउट लागू कर दिया गया था। ऐसे में शाम छह बजते ही लाइटें बंद कर दी जाती थीं। रेडियो पर महज युद्ध से जुड़ी जानकारी कमरे में दुबककर सुना करते थे। लोगों को उस दौर में भी आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया गया था।
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शहर के लेडीज मार्केट निवासी कैलाश चंद्र ने बताया कि उन दिनों वह युवा थे। शहर का अच्छा खासा बाजार भी था, लेकिन शाम छह बजते ही बाजार बंद हो जाता था। दिन में ही लोग खरीदारी करते थे। शाम को सभी लोग घर में समय से खाना-पीना करने के बाद सो जाते थे। पुलिस भी गली मोहल्लों में घूमकर लोगों को जागरूक करती थी। सायरन बजते थे। आज एक बार फिर से उसी दौर की यादें मॉकड्रिल से ताजा हो गई हैं।
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