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काकोरी ट्रेन एक्शन : मुकुंदीलाल ने हाथों से तोड़ दिए थे बक्सों के ताले
Sat, 09 Aug 2025 12:04 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Sat, 09 Aug 2025 12:04 AM IST
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शहीद पार्क में स्थित वीर मुकुंदीलाल की प्रतिमा।
- फोटो : शहीद पार्क में स्थित वीर मुकुंदीलाल की प्रतिमा।
औरैया। काकोरी ट्रेन एक्शन में औरैया के वीर मुकुंदीलाल गुप्ता प्रमुख रूप से शामिल रहे थे। उन्होंने ट्रेन में लूटे गए बक्सों के ताले अपने हाथों से तोड़ दिए थे। इस पर चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें भारत वीर की उपाधि से नवाजा था।
शहर के शहीद पार्क में मुकुंदीलाल की प्रतिमा आज भी उनकी वीरता की कहानी कह रही है। जनवरी 1901 में जन्मे मुकुंदीलाल गुप्ता अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ थे। बड़े होने पर वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गेंदालाल दीक्षित के संपर्क में आए। सबसे पहले उन्होंने षड्यंत्र केस में हिस्सा लिया था। इसमें उन पर वर्ष 1918 में मुकदमा चला और छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
जेल से छूटने के बाद वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए थे। इस बीच वह रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आ गए थे। इसके बाद काकोरी ट्रेन एक्शन की योजना बनाई गई थी।
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साल 1925 की नौ अगस्त को क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर मुकुंदीलाल ने काकोरी में ट्रेन से ले जाया जा रहा अंग्रेजों का खजाना लूट लिया था। मुकुंदीलाल 26 सितंबर 1926 को गिरफ्तार हो गए थे। लखनऊ में काकोरी का मुकदमा चला था। जिसमें मुकुंदीलाल को काला पानी की सजा सुनाई गई थी। देश आजाद होने के बाद उन्हें रिहा किया गया।
वहीं 12 अक्तूबर 1972 को कानपुर के हैलट अस्पताल में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली थी। इसके बाद शहर के शहीद पार्क में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जो आज भी उनकी वीरता की गवाही दे रही है। यहां लोग नौ अगस्त हो पहुंचते हैं।
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शहर के शहीद पार्क में मुकुंदीलाल की प्रतिमा आज भी उनकी वीरता की कहानी कह रही है। जनवरी 1901 में जन्मे मुकुंदीलाल गुप्ता अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ थे। बड़े होने पर वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गेंदालाल दीक्षित के संपर्क में आए। सबसे पहले उन्होंने षड्यंत्र केस में हिस्सा लिया था। इसमें उन पर वर्ष 1918 में मुकदमा चला और छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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जेल से छूटने के बाद वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए थे। इस बीच वह रामप्रसाद बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आ गए थे। इसके बाद काकोरी ट्रेन एक्शन की योजना बनाई गई थी।
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साल 1925 की नौ अगस्त को क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर मुकुंदीलाल ने काकोरी में ट्रेन से ले जाया जा रहा अंग्रेजों का खजाना लूट लिया था। मुकुंदीलाल 26 सितंबर 1926 को गिरफ्तार हो गए थे। लखनऊ में काकोरी का मुकदमा चला था। जिसमें मुकुंदीलाल को काला पानी की सजा सुनाई गई थी। देश आजाद होने के बाद उन्हें रिहा किया गया।
वहीं 12 अक्तूबर 1972 को कानपुर के हैलट अस्पताल में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली थी। इसके बाद शहर के शहीद पार्क में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जो आज भी उनकी वीरता की गवाही दे रही है। यहां लोग नौ अगस्त हो पहुंचते हैं।