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Auraiya News: गन हाउस का रिकॉर्ड गायब, क्या हुई कार्रवाई... कोई नहीं जानता
Sun, 07 Dec 2025 12:05 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Sun, 07 Dec 2025 12:05 AM IST
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औरैया। जिस गन हाउस के माध्यम से सराफा कारोबारी कमलकांत वर्मा ने असलहा और कारतूसों के अवैध कारोबार में कदम रखा उसका रिकॉर्ड ही गायब है।
औरैया जिला प्रशासन दो दिन से गन हाउस का रिकॉर्ड खंगाल रहा है, लेकिन यहां कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। इटावा में भी कर्मचारियों ने हाथ खड़े कर दिए। इसका रिकॉर्ड कहां गुम हो गया, इसके पीछे भी कोई साजिश तो नहीं है, फिलहाल यह जांच का मामला बन चुका है।
होमगंज स्थित बाजार की जिस दुकान में आज नैना ज्वैलर्स का कारोबार है, वहीं कभी महेश वर्मा का गन हाउस था। तब यह दुकान किराये पर थी और काफी पुरानी थी। गन हाउस का लाइसेंस भी इटावा से जारी हुआ था क्योंकि 1997 से पहले औरैया जिला नहीं बना था। 1995 के पुरुलिया कांड में नाम आने के बाद महेश वर्मा ने खुदकुशी कर ली। इसके साथ ही गन हाउस पर भी सील लग गई, लेकिन गन हाउस की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
सूत्रों के अनुसार कुछ सालों बाद दोबारा कमलकांत ने गन हाउस अपनी मां के नाम बहाल करा लिया। इसके बाद यह गन हाउस कब तक चला और कब निरस्त हुआ ये किसी को नहीं पता। जिला प्रशासन औरैया के पास भी इसका कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। बीते दो दिनों से असलहा कार्यालय में इसकी पत्रावली खोजी जा रही है, लेकिन सभी पत्रावली देखने के बाद भी महेश वर्मा के गन हाउस का कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला।
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औरैया के असलहा कार्यालय से इटावा से भी जब संपर्क किया गया तो वहां भी इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात सामने आई। ऐसे में साफ है कि गन हाउस का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे भी किसी बड़ी साजिश से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जिम्मेदार भी इसी टेंशन में हैं, अगर एनआईए ने इसका रिकॉर्ड मांगा तो कहां से उपलब्ध कराएंगे।
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जिलों के जाल में कमलकांत ने उलझाए गन हाउस के तार
इटावा से गन हाउस का लाइसेंस कमलकांत के पिता के नाम जारी हुआ था। बाद में वर्ष 1997 में इटावा से कटकर औरैया जिला अलग हो गया। बस इसी का फायदा कमलकांत ने उठाया। दो जिलों के जाल में उसने गन हाउस के तार ऐसे उलझाए जो आज तक नहीं सुलझ पा रहे हैं।
औरैया जिला प्रशासन को हमेशा यही लगता रहा कि गन हाउस का लाइसेंस इटावा से जारी है तो वहीं चल रहा है। वहीं इटावा को लगा कि जब औरैया के लाइसेंस की पत्रावलियां नए जिला मुख्यालय को भेजी जा चुकी हैं तो उन्हें उनकी जिम्मेदारी अब खत्म हो गई। इन सब के बीच हकीकत से कभी पर्दा नहीं उठ सका।
कहां गए जमा असलहे, किसी को नहीं पता
कमलकांत वर्मा के पिता महेश वर्मा के नाम स्वीकृत गन हाउस 1997 में उनकी मौत के बाद सील कर दिया गया। इसके बाद दोबारा अपनी मां के नाम कमलकांत ने गन हाउस का लाइसेंस बहाल करा लिया। इसके बाद लाइसेंस कब निरस्त हुआ, उसमें जमा असलहे और कारतूस कहां गए, इसका भी कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन असलहों और कारतूस के भी गलत हाथों में जाने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
कमलकांत वर्मा के पिता या परिवार के नाम से संचालित गन हाउस का रिकॉर्ड तलाशने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए पुराने कर्मचारियों से भी संपर्क किया जा रहा है। रिकॉर्ड काफी पुराना है, जल्द ही रिकॉर्ड मिलने की उम्मीद है।
-डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी, डीएम।
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औरैया जिला प्रशासन दो दिन से गन हाउस का रिकॉर्ड खंगाल रहा है, लेकिन यहां कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। इटावा में भी कर्मचारियों ने हाथ खड़े कर दिए। इसका रिकॉर्ड कहां गुम हो गया, इसके पीछे भी कोई साजिश तो नहीं है, फिलहाल यह जांच का मामला बन चुका है।
होमगंज स्थित बाजार की जिस दुकान में आज नैना ज्वैलर्स का कारोबार है, वहीं कभी महेश वर्मा का गन हाउस था। तब यह दुकान किराये पर थी और काफी पुरानी थी। गन हाउस का लाइसेंस भी इटावा से जारी हुआ था क्योंकि 1997 से पहले औरैया जिला नहीं बना था। 1995 के पुरुलिया कांड में नाम आने के बाद महेश वर्मा ने खुदकुशी कर ली। इसके साथ ही गन हाउस पर भी सील लग गई, लेकिन गन हाउस की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
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सूत्रों के अनुसार कुछ सालों बाद दोबारा कमलकांत ने गन हाउस अपनी मां के नाम बहाल करा लिया। इसके बाद यह गन हाउस कब तक चला और कब निरस्त हुआ ये किसी को नहीं पता। जिला प्रशासन औरैया के पास भी इसका कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। बीते दो दिनों से असलहा कार्यालय में इसकी पत्रावली खोजी जा रही है, लेकिन सभी पत्रावली देखने के बाद भी महेश वर्मा के गन हाउस का कोई रिकॉर्ड ही नहीं मिला।
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औरैया के असलहा कार्यालय से इटावा से भी जब संपर्क किया गया तो वहां भी इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात सामने आई। ऐसे में साफ है कि गन हाउस का रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे भी किसी बड़ी साजिश से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जिम्मेदार भी इसी टेंशन में हैं, अगर एनआईए ने इसका रिकॉर्ड मांगा तो कहां से उपलब्ध कराएंगे।
जिलों के जाल में कमलकांत ने उलझाए गन हाउस के तार
इटावा से गन हाउस का लाइसेंस कमलकांत के पिता के नाम जारी हुआ था। बाद में वर्ष 1997 में इटावा से कटकर औरैया जिला अलग हो गया। बस इसी का फायदा कमलकांत ने उठाया। दो जिलों के जाल में उसने गन हाउस के तार ऐसे उलझाए जो आज तक नहीं सुलझ पा रहे हैं।
औरैया जिला प्रशासन को हमेशा यही लगता रहा कि गन हाउस का लाइसेंस इटावा से जारी है तो वहीं चल रहा है। वहीं इटावा को लगा कि जब औरैया के लाइसेंस की पत्रावलियां नए जिला मुख्यालय को भेजी जा चुकी हैं तो उन्हें उनकी जिम्मेदारी अब खत्म हो गई। इन सब के बीच हकीकत से कभी पर्दा नहीं उठ सका।
कहां गए जमा असलहे, किसी को नहीं पता
कमलकांत वर्मा के पिता महेश वर्मा के नाम स्वीकृत गन हाउस 1997 में उनकी मौत के बाद सील कर दिया गया। इसके बाद दोबारा अपनी मां के नाम कमलकांत ने गन हाउस का लाइसेंस बहाल करा लिया। इसके बाद लाइसेंस कब निरस्त हुआ, उसमें जमा असलहे और कारतूस कहां गए, इसका भी कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन असलहों और कारतूस के भी गलत हाथों में जाने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।
कमलकांत वर्मा के पिता या परिवार के नाम से संचालित गन हाउस का रिकॉर्ड तलाशने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए पुराने कर्मचारियों से भी संपर्क किया जा रहा है। रिकॉर्ड काफी पुराना है, जल्द ही रिकॉर्ड मिलने की उम्मीद है।
-डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी, डीएम।