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Auraiya News: दवाओं के पांच नमूने जांच में फेल
Sat, 13 Dec 2025 12:20 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Sat, 13 Dec 2025 12:20 AM IST
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फोटो-24-एक मेडिकल स्टोर पर बिक्री के लिए रखीं दवाएं। संवाद
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औरैया। मरीजों के उपचार के लिए चिकित्सक दवाओं का सहारा लेते हैं, लेकिन जब दवाओं में ही खेल हो तो फिर उपचार कैसे संभव है।
औषधि निरीक्षक ज्योत्सना आनंद की आेर से जांच के लिए भेजी गईं दवाओं की रिपोर्ट में पांच दवाएं फेल हो गईं। दो दवा कंपनियों के खिलाफ सीजेएम कोर्ट में वाद दायर किया गया है, वहीं अन्य के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है।
नकली और अधोमानक दवाओं की पहचान करने और उनका विक्रय रोकने के लिए औषधि निरीक्षक जांच के लिए दवाओं के नमूने लेकर भेजते हैं। ऐसे ही पांच महीनों में लिए गए दवाओं के पांच नमूने जांच में फेल हो गए हैं। ये नमूने जांच के लिए लखनऊ भेजे गए थे।
इनमें पहला नमूना चौहान मेडिकल स्टोर बेला से लिया गया था। सेफीटेक्स 50 नाम से बिकने वाली यह दवा एंटीबायोटिक थी, जो बच्चों के लिए बनाई गई थी। इसमें जांच में दवा की मात्रा 71.64 प्रतिशत ही पाई गई।
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इसके अलावा शाश्वत मेडिकल स्टोर औरैया से लिए गए सिडबैक्ट 250 भी जांच में बेदम निकल गई। इसकी घुलनशीलता मानक के अनुरूप न होने से य सैंपल भी फेल हो गया। दोनों मामलों में जांच के बाद सीजेएम न्यायालय में कंपनियों पर मुकदमे दायर किए गए हैं।
वहीं, कृष्णा मेडिकल स्टोर अछल्दा से लिया गया रोबिसिया-डीएसआर का भी नमूना फेल हो गया है। इसमें रेबीप्राजोल दवा की मात्रा में 18 से 22 प्रतिशत के सापेक्ष 14.99 प्रतिशत थी तो वहीं डॉम्पेरीडोन की मात्रा 33 प्रतिशत के सापेक्ष 25.66 प्रतिशत मिली। इसमें दवा निर्माता कंपनी को नोटिस भेजा गया है।
एक अन्य कार्रवाई के दौरान शहर के सिद्दीकी मेडिकल स्टोर से लिया गया मेडपॉड सस्पेंसन भी जांच में फेल हो गया। इसमें दवा की मात्रा केवल 66.77 प्रतिशत ही पाई गई। मामले में कंपनी को नोटिस भेजा गया है, लेकिन अब तक जवाब नहीं मिल सका है।
इसमें एक दवा जहां एंटासिड है तो बाकी तीन दवाएं एंटीबायोटिक की श्रेणी में हैं। जब ये दवाएं हीं अधोमानक हैं तो इनसे मर्ज पूरा ठीक होने की उम्मीद करना बेमानी होगा। इन चंद नमूनों की रिपोर्ट इस बात की बानगी है कि आखिर जिले में बिक रहीं दवाएं कितनी भरोसेमंद और मानक पर खरी हैं।
एक दवा का नमूना निकला मिसब्रांड
चार दवा के नमूने जहां जांच में फेल हो गए तो वहीं एक नमूना मिसब्रांड भी मिला। दिबियापुर के विश्नोई मेडिकल स्टोर से लिया गया रोफोनिल बोलस का यह नमूना था। इस पर नियमानुसार जानकारी दर्ज नहीं गई थी। यह दवा सिंबोसिस फार्मास्यूटिकल प्राइवेट लिमिटेड, काला अब हिमाचल प्रदेश द्वारा बनाई गई थी। मामले की सूचना संबंधित औषधि निरीक्षक को भेजी गई है।
पर्याप्त डोज न मिलने से ठीक नहीं होता मर्ज
मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. पवन कुमार शर्मा ने बताया कि डॉक्टर द्वारा मरीजों के उपचार के लिए निर्धारित डोज दिया जाता है। अगर दवाओं में ही मात्रा की कमी होगी तो डोज पूरा नहीं होगा। इससे या तो मर्ज ठीक होने में समय अधिक लगेगा या फिर मर्ज ठीक ही नहीं होगा। कई बार बीमारी अधिक समय तक रहने से वह और गंभीर हो जाती है। इससे मरीज की जान का भी संकट खड़ा हो जाता है।
जांच में पांच दवाओं के नमूने फेल आए हैं। इसमें से चार में दवा की मात्रा कम मिली है तो वहीं एक मिसब्रांड है। दो मामलों में सीजेएम न्यायालय में मुकदमे दायर किए गए हैं, अन्य में भी प्रक्रिया चल रही है।
-ज्योत्सना आनंद, औषधि निरीक्षक
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औषधि निरीक्षक ज्योत्सना आनंद की आेर से जांच के लिए भेजी गईं दवाओं की रिपोर्ट में पांच दवाएं फेल हो गईं। दो दवा कंपनियों के खिलाफ सीजेएम कोर्ट में वाद दायर किया गया है, वहीं अन्य के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है।
नकली और अधोमानक दवाओं की पहचान करने और उनका विक्रय रोकने के लिए औषधि निरीक्षक जांच के लिए दवाओं के नमूने लेकर भेजते हैं। ऐसे ही पांच महीनों में लिए गए दवाओं के पांच नमूने जांच में फेल हो गए हैं। ये नमूने जांच के लिए लखनऊ भेजे गए थे।
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इनमें पहला नमूना चौहान मेडिकल स्टोर बेला से लिया गया था। सेफीटेक्स 50 नाम से बिकने वाली यह दवा एंटीबायोटिक थी, जो बच्चों के लिए बनाई गई थी। इसमें जांच में दवा की मात्रा 71.64 प्रतिशत ही पाई गई।
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इसके अलावा शाश्वत मेडिकल स्टोर औरैया से लिए गए सिडबैक्ट 250 भी जांच में बेदम निकल गई। इसकी घुलनशीलता मानक के अनुरूप न होने से य सैंपल भी फेल हो गया। दोनों मामलों में जांच के बाद सीजेएम न्यायालय में कंपनियों पर मुकदमे दायर किए गए हैं।
वहीं, कृष्णा मेडिकल स्टोर अछल्दा से लिया गया रोबिसिया-डीएसआर का भी नमूना फेल हो गया है। इसमें रेबीप्राजोल दवा की मात्रा में 18 से 22 प्रतिशत के सापेक्ष 14.99 प्रतिशत थी तो वहीं डॉम्पेरीडोन की मात्रा 33 प्रतिशत के सापेक्ष 25.66 प्रतिशत मिली। इसमें दवा निर्माता कंपनी को नोटिस भेजा गया है।
एक अन्य कार्रवाई के दौरान शहर के सिद्दीकी मेडिकल स्टोर से लिया गया मेडपॉड सस्पेंसन भी जांच में फेल हो गया। इसमें दवा की मात्रा केवल 66.77 प्रतिशत ही पाई गई। मामले में कंपनी को नोटिस भेजा गया है, लेकिन अब तक जवाब नहीं मिल सका है।
इसमें एक दवा जहां एंटासिड है तो बाकी तीन दवाएं एंटीबायोटिक की श्रेणी में हैं। जब ये दवाएं हीं अधोमानक हैं तो इनसे मर्ज पूरा ठीक होने की उम्मीद करना बेमानी होगा। इन चंद नमूनों की रिपोर्ट इस बात की बानगी है कि आखिर जिले में बिक रहीं दवाएं कितनी भरोसेमंद और मानक पर खरी हैं।
एक दवा का नमूना निकला मिसब्रांड
चार दवा के नमूने जहां जांच में फेल हो गए तो वहीं एक नमूना मिसब्रांड भी मिला। दिबियापुर के विश्नोई मेडिकल स्टोर से लिया गया रोफोनिल बोलस का यह नमूना था। इस पर नियमानुसार जानकारी दर्ज नहीं गई थी। यह दवा सिंबोसिस फार्मास्यूटिकल प्राइवेट लिमिटेड, काला अब हिमाचल प्रदेश द्वारा बनाई गई थी। मामले की सूचना संबंधित औषधि निरीक्षक को भेजी गई है।
पर्याप्त डोज न मिलने से ठीक नहीं होता मर्ज
मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. पवन कुमार शर्मा ने बताया कि डॉक्टर द्वारा मरीजों के उपचार के लिए निर्धारित डोज दिया जाता है। अगर दवाओं में ही मात्रा की कमी होगी तो डोज पूरा नहीं होगा। इससे या तो मर्ज ठीक होने में समय अधिक लगेगा या फिर मर्ज ठीक ही नहीं होगा। कई बार बीमारी अधिक समय तक रहने से वह और गंभीर हो जाती है। इससे मरीज की जान का भी संकट खड़ा हो जाता है।
जांच में पांच दवाओं के नमूने फेल आए हैं। इसमें से चार में दवा की मात्रा कम मिली है तो वहीं एक मिसब्रांड है। दो मामलों में सीजेएम न्यायालय में मुकदमे दायर किए गए हैं, अन्य में भी प्रक्रिया चल रही है।
-ज्योत्सना आनंद, औषधि निरीक्षक