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एंबुलेंस कबाड़, मरीजों की जान से खिलवाड़
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कबाड़ 108 एंबुलेंस व सामने से नंबर प्लेट भी गायब। संवाद
- फोटो : AURAIYA
औरैया। गंभीर बीमारी से ग्रसित मरीज व सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को समय से अस्पताल में पहुंचाने के लिए सरकार प्रत्येक माह लाखों रुपये खर्च कर 102 व 108 एंबुलेंस का संचालन कर रही है। इसके बावजूद भी सेवा प्रदाता कंपनी एंबुलेंस सेवा की खामियों में सुुुधार नहीं कर पा रहीं हैं। नतीजतन छह एंबुलेंस अपनी आयु पूरी करने के बाद भी जिले में मरीजों को ढोने में प्रयोग की जा रही हैं। इसके अलावा अन्य कई एंबुलेंस भी तीन लाख किमी के मुहाने पर हैं। इससे यह साफ है कि सेवा प्रदाता कंपनी को न तो अपने पायलट, ईएमटी की चिंता है और न ही मरीज व उनके तीमारदारों की।
जिले में 102 नंबर की 19, 108 नंबर की 16 एंबुलेंस व तीन एएलएस हैं। हर सीएचसी में दो से तीन एंबुलेंस मौजूद हैं। 108 एंबुलेंस गंभीर बीमारियों से ग्रसित मरीजों व दुर्घटना का शिकार हुए लोगों को अस्पताल पहुंचाती हैं। 102 एंबुलेंस गर्भवती महिलाओं व शून्य से दो वर्ष तक के बच्चों को अस्पताल लाने व अस्पताल से घर पहुंचाने का कार्य करती हैं।
रेफर होने वाले मरीजों को हायर सेंटर पहुंचाने के लिए भी एंबुलेंस की सहायता ली जाती है। मरीज व उनके तीमारदारों को यह जानकारी नहीं है कि जिस एंबुलेंस में वह सवार हैं, उसकी आयु पूरी हो चुकी है या नहीं। वह खुद भगवान भरोसे चल रहीं हैं। एंबुलेंस कर्मचारी संघ के प्रदेश संगठन मंत्री महेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि तीन लाख किलोमीटर से अधिक चलने पर एंबुलेंस कबाड़ की श्रेणी में आ जाती है। सेवा प्रदाता कंपनी के दबाव और नौकरी जाने के डर से पायलट व ईएमटी मरीज व उनके तीमारदारों की जान से खिलवाड़ करने में लगे हैं।
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102 व 108 एंबुलेंस कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष सतीश यादव ने बताया कि जिले में 38 एंबुलेंस हैं। जानकारी के मुताबिक छह एंबुलेंस तीन लाख किलोमीटर से अधिक दूरी तय करके अपनी आयु पूरी कर चुकी हैं, जो कबाड़ की श्रेणी में हैं। यह एंबुलेंस अयाना, अजीतमल, मुरादगंज समेत अन्य जगह पर संचालित सीएचसी व पीएचसी केंद्रों पर हैं। वर्ष 2012 में जिले को नौ व वर्ष 2014 में सात एंबुलेंस मिलीं थीं। इसमें से अभी तक सिर्फ छह एंबुलेंस ही बदली जा सकी हैं। सीएमओ डॉ. अर्चना श्रीवास्तव ने बताया कि जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
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जिले में 102 नंबर की 19, 108 नंबर की 16 एंबुलेंस व तीन एएलएस हैं। हर सीएचसी में दो से तीन एंबुलेंस मौजूद हैं। 108 एंबुलेंस गंभीर बीमारियों से ग्रसित मरीजों व दुर्घटना का शिकार हुए लोगों को अस्पताल पहुंचाती हैं। 102 एंबुलेंस गर्भवती महिलाओं व शून्य से दो वर्ष तक के बच्चों को अस्पताल लाने व अस्पताल से घर पहुंचाने का कार्य करती हैं।
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रेफर होने वाले मरीजों को हायर सेंटर पहुंचाने के लिए भी एंबुलेंस की सहायता ली जाती है। मरीज व उनके तीमारदारों को यह जानकारी नहीं है कि जिस एंबुलेंस में वह सवार हैं, उसकी आयु पूरी हो चुकी है या नहीं। वह खुद भगवान भरोसे चल रहीं हैं। एंबुलेंस कर्मचारी संघ के प्रदेश संगठन मंत्री महेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि तीन लाख किलोमीटर से अधिक चलने पर एंबुलेंस कबाड़ की श्रेणी में आ जाती है। सेवा प्रदाता कंपनी के दबाव और नौकरी जाने के डर से पायलट व ईएमटी मरीज व उनके तीमारदारों की जान से खिलवाड़ करने में लगे हैं।
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102 व 108 एंबुलेंस कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष सतीश यादव ने बताया कि जिले में 38 एंबुलेंस हैं। जानकारी के मुताबिक छह एंबुलेंस तीन लाख किलोमीटर से अधिक दूरी तय करके अपनी आयु पूरी कर चुकी हैं, जो कबाड़ की श्रेणी में हैं। यह एंबुलेंस अयाना, अजीतमल, मुरादगंज समेत अन्य जगह पर संचालित सीएचसी व पीएचसी केंद्रों पर हैं। वर्ष 2012 में जिले को नौ व वर्ष 2014 में सात एंबुलेंस मिलीं थीं। इसमें से अभी तक सिर्फ छह एंबुलेंस ही बदली जा सकी हैं। सीएमओ डॉ. अर्चना श्रीवास्तव ने बताया कि जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

अंदर से कबाड़ हो चुकी एंबुलेंस, फिर जा रही दौड़ाई। संवाद- फोटो : AURAIYA

टायर छोड़ चुके एंबुलेंस की बॉडी का साथ, दिखती दरार से सड़क। संवाद- फोटो : AURAIYA

पट्टी से बंधा एंबुलेंस का पुर्जा व टायर सही करता युवक। संवाद- फोटो : AURAIYA