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Amroha News: शहीद के परिजन बोले, इंसाफ के इंतजार में बीते 19 साल, दोषियों को मिले सजा-ए-मौत

Fri, 31 Oct 2025 02:33 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा Updated Fri, 31 Oct 2025 02:33 AM IST
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The martyr's family said, they have been waiting for justice for 19 years, the culprits should be given death penalty.
नौगांवा सादात (अमरोहा)। रामपुर के सीआरपीएफ सेंटर पर हुए आतंकी हमले के दोषियों की फांसी की सजा रद्द होने से शहीद आनंद के परिजन नाखुश है। 31 दिसंबर 2007 को हुए हमले में नौगांवा सादात के गांव देहरा निवासी आनंद कुमार भी शहीद हुए थे।
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शहीद आनंद के परिजनों ने कहा कि बेटे को इंसाफ मिलने के इंतजार में 19 साल बीत गए हैं। दोषियों को फांसी की सजा मिलेगी वह बस इसी उम्मीद में आस लगाए बैठे थे। दोषियों को सजा-ए-मौत ही मिलनी चाहिए। भाई अशोक ने कहा कि जिस समय आनंद शहीद हुए उसे समय उनकी उम्र बहुत कम थी। वह अपने परिवार के लिए क्या कुछ करते इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। वह देश के लिए परिवार को बीच मझधार में छोड़ गए। उनके शहीद होने के बाद भी आज तक कुछ नहीं मिल सका।
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नौगांवा सादात थानाक्षेत्र के गांव देहरा निवासी आनंद कुमार अपने बड़े भाई जितेंद्र सिंह के नक्शे कदम पर चलते हुए 25 अप्रैल 2001 को सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। छह साल आठ महीने की सर्विस में आनंद कुमार असम, जम्मू कश्मीर, मणिपुर आदि प्रदेशों में ड्यूटी की थी। बाद में गांव से करीब 70 किमी दूर सीआरपीएफ सेंटर रामपुर में तैनाती हो गई। एक जनवरी 2008 को आनंद के परिवार के लिए दुख की रात साबित हुई।
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साल 2008 के पहले दिन रात करीब ढाई बजे आतंकवादियों ने सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर रामपुर पर हमला कर दिया था। स्वचालित हथियारों और ग्रेनेड से लैस आतंकवादियों ने पहले गेट नंबर एक पर तैनात संतरियों पर फायरिंग की और ग्रेनेड फेंके। गेट पर तैनात जवानों ने इस हमले का जवाब दिया। आतंकियों के इस हमले में आनंद कुमार ने शहादत को चूम लिया था। अपने गांव से इतने करीब आने के बाद आनंद परिजनों से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो गए थे।



नहीं आया वो कल...

शहीद आनंद के पिता कमल सिंह की साल 2014 और माता हीरावती का मार्च 2025 में निधन हो गया। शहीद आनंद के भाई अशोक ने बताया कि शहादत से एक दिन पहले आनंद ने मां पैगाम भेजा था कि कल से एक माह की छुट्टी शुरू हो रही है। आ जाऊंगा लेकिन वह कल कभी आया ही नहीं। उसी रात आंतकी हमले में आनंद शहीद हो गए। आखिरे दम तक मां हीरावती सभी दोषियों को फांसी की सजा की मांग करती हुई खुद ही चल बसी। अशोक बताते हैं कि ड्यूटी पर देश के लिए जान देने के बावजूद सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली। पेंशन और नौकरी आनंद की पत्नी को मिली। जो आनंद के शहीद होने एक दो महीने बाद ही मायके चली गई। फिर लौट के नहीं आई।



हमले के समय आनंद के साथ बड़े भाई जितेंद्र की तैनाती

आनंद के भाई अशोक ने बताया कि आतंकी हमले के समय बड़े भाई जितेंद्र और आनंद की तैनाती सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर रामपुर में ही थी। दोनों का परिवार साथ में रहता था। आनंद की तीस दिन की छुट्टी स्वीकृत हो गई थी लेकिन नाइट ड्यूटी नहीं बदली गई थी। ऐसे में आनंद को एक जनवरी की रात कंट्रोल रूम में ड्यूटी करनी पड़ी। अगले दिन से उसकी तीस दिन की छुट्टी थी लेकिन एक जनवरी की रात मेरे परिवार के लिए दुखों का पहाड़ टूट चुका था।




भर्ती के चार साल बाद हुई थी शादी

शहीद आनंद कुमार वैवाहिक का जीवन का सुख ज्यादा दिन नहीं रहा। सीआरपीएफ में भर्ती होने के चार साल बाद उनकी शादी देहात थानाक्षेत्र के गांव नन्हेड़ा निवासी युवती से हुई थी लेकिन शादी के 32 महीने बाद ही वह शहीद हो गए। उनकी कोई औलाद नहीं थी।



शहीद आनंद कुमार की प्रोफाइल

जीडी, सीआरपीएफ 31 बटालियन

गांव देहरा, थाना नौगांवा सादात

जन्म एक अगस्त 1979

सीआरपीएफ में भर्ती 25 अप्रैल 2001

शहीद हुए एक जनवरी 2008

सर्विस अवधि छह साल आठ महीने
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