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Amroha News: 1971 की लड़ाई में दिखाया था अदम्य साहस, छुड़ाए थे दुश्मनों के छक्के

Sat, 16 Dec 2023 01:26 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा Updated Sat, 16 Dec 2023 01:26 AM IST
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Showed indomitable courage in the 1971 war, saved sixes from the enemies
अमरोहा//गजरौला। 16 दिसंबर 1971 वह तारीख है, जब भारतीय वीरों ने पाकिस्तान सेना को न केवल धूल चटाई, बल्कि देश में अलग उत्साह भर दिया। आज देशवासी इस दिन को वियज दिवस के रूप में मनाते हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले फौजी अब सेवानिवृत्त हो गए हैं लेकिन उनके हौसले सीमा पर तैनात जवानों से कम नहीं हैं। युद्ध के मंजर को याद करते हुए कहते हैं कि सभी को इस बात की ही फिक्र थी कि दुश्मन की फौज को धूल कैसे चटाई जाए। युद्ध में पाकिस्तान के छक्के छुड़ाने वाले फौजी अब सेवानिवृत्त हो गए हैं। उनका कहना है कि हमारे देश के सैनिकों के अदम्य साहस के कारण पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा। उसके 90 हजार सैनिकों को हमारे देश की सेना ने बंदी बना लिया।
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हसनपुर क्षेत्र के भैंसरी गांव निवासी 80 वर्षीय विक्रम सिंह तंवर ने बताया कि युद्ध के दौरान उनकी तैनाती संधू बॉर्डर पर थी। युद्ध बड़ा डरावना था। हमारे देश के सैनिकों में बड़ा जज्बा था। जिसके चलते हमारी सेना की जीत हुई और पाकिस्तान को हार का मुंह देखना पड़ा। युद्ध में भाग लेना बड़े सौभाग्य की बात है। युद्ध को याद कर सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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भारत और पाकिस्तान के युद्ध में अपनी वीरता का लोहा मनवा चुके नौगावां सादात क्षेत्र के देहरा गुर्जर निवासी जयचंद सिंह पोषवाल राजपूत रेजिमेंट में थे। उनका कहना है कि उनकी तैनाती कुमार कली शहर में थे। युद्ध के दौरान वह ऐसे मोर्चे पर घिर गए, जिसमें सामने दुश्मन की फौज और पीछे नदी थी। दुश्मन की फौज ने उनका पुल उड़ा दिया। मगर हमारी पलटन ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मशीन गन से दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए।
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जेबड़ा निवासी लख्मीचंद गुर्जर सेवानिवृत्त फौजी हैं। वह 1970 में भर्ती हुए। एक साल बाद भारत पाकिस्तान का युद्ध हो गया। उस समय वह रिक्रूट थे। पाकिस्तान के करीब चार हजार युद्ध बंदियों को ग्वालियर में रखा गया। उन युद्ध बंदियों की निगरानी के लिए लख्मी चंद ने पांच महीने ड्यूटी की। लख्मी चंद कहते हैं कि रात को कैदी भागने की कोशिश करते थे। उनको संभालने के लिए गोली भी चलानी पड़ती थी। कई कैदी मारे गए।
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