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खतरे में रालोद का सियासी वजूद

Sun, 12 Mar 2017 11:44 PM IST
अमरोहा/अमर उजाला ब्यूरो
अमरोहा/अमर उजाला ब्यूरो Updated Sun, 12 Mar 2017 11:44 PM IST
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rld politics down
ajit sigh
लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा जिले में राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति सिमटती सी नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव-2017 में तो स्थिति ये है कि जिले में रालोद का सियासी वजूद ही खतरे में नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव में जिले में पार्टी का एक भी प्रत्याशी अपनी जमानत तक बचाने में कामयाब नहीं रहा।
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विधनासभा चुनाव से पहले जिले की चारों विधानसभा सीटों पर छोटे चौधरी अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल जिस अंदाज से मैदान में उतरी थी, लग रहा था इस बार पार्टी जिले में कुछ करेगी। पार्टी का मुख्य फोकस नौगावां सादात और धनौरा विधानसभा पर था।
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क्योंकि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रत्याशी ने यहां से लगभग 30 से 35 हजार के आसपास मत प्राप्त किए थे। इस बार भी दोनों सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी भी दमदार थे। नौगावां सादात से सपा का दामन छोड़ कर रालोद पहुंचे विधायक अशफाक अली खां और धनौरा सुरक्षित सीट से विधायक माइकल चंद्रा के पुत्र कपिल चंद्रा चुनाव मैदान में थे।
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इनके पक्ष में फिजा बनाने के लिए चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी ने जनसभा के साथ ही रोड शो भी किया। 11 मार्च को जब चुनाव के नतीजे आए तो दोनों प्रत्याशियों का हश्र देख पार्टी पदाधिकारी भी दंग रह गए। अच्छी खासी जाटों की संख्या वाले में इन क्षेत्रों में पार्टी को जाटों के वोट भी नहीं मिले।

धनौरा से कपिल चंद्रा तो कहीं भी चुनाव लड़ते भी नजर नहीं आए। उन्हें मात्र 3747 मत मिले। उम्मीद के विपरीत नौगावां सादात से अशफाक अली खां का हश्र भी ऐसा ही रहा। पिछली बार 55 हजार से ज्यादा मत प्राप्त कर विधायक बनने वाले अशफाक अली खां को मात्र 14 हजार वोट ही मिले।


अमरोहा में जरूर पार्टी के प्रत्याशी अंदाजे के मुताबिक मत प्राप्त करने में सफल रहे। हसनपुर में पार्टी प्रत्याशी महावीर सैनी को तो मात्र एक हजार वोट मिले। कोई प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाया। कुछ ऐसा ही हाल लोकसभा चुनावों में पार्टी प्रत्याशी राकेश टिकैत के साथ हुआ था। चुनाव नतीजे की माने तो रालोद का सियासी वजूद जिले में खतरे में नजर आ रहा है। जाट बहुल सीटों पर भी उनका राजनीतिक भविष्य सिमटता दिख रहा है।
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