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हर किसी के लिए प्रेरक है रेखा का व्यक्तित्व
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मुंह में कलम दबाकर लिखती रेखा।
- फोटो : HASANPUR
हसनपुर। सोचिए यदि किसी हादसे की वजह से छह वर्ष की उम्र में किसी बच्चे के दोनों हाथ कट जाएं तो जीवन में क्या वह कुछ कर सकता है। ऐसी सोच को गलत साबित किया है। रजोहा गांव की रेखा चौहान ने जिसने दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद भी जीवन में कभी हार नहीं मानी और विपरीत परिस्थितियों में सपने को पूरा करने की जिद में वह आगे बढ़ती गई। हाथ नहीं थे तो मुंह में कलम दबाकर अपनी जिंदगी को संवारने में जुट गईं।
क्षेत्र के गांव रजोहा निवासी किसान जयपाल सिंह की बेटी रेखा चौहान करीब छह वर्ष की उम्र में घर पर ही चारा मशीन में आकर दोनों हाथ कोहनी तक हाथ कट गए थे। काफी समय तक रेखा को अपने दोनों कटे हुए हाथों की वजह से घर से बाहर निकलने में परेशानी होती थी, लेकिन ऐसी घड़ी में परिवार वालों ने रेखा का साथ नहीं छोड़ा। भाई-बहनों एवं दूसरों बच्चों को स्कूल जाते देख रेखा ने भी पढ़ने की इच्छा जताई। कई लोगों ने तर्क दिया कि वह कैसे लिख पाएगी। रेखा की जिद के आगे परिवार वालों ने गांव के ही प्राथमिक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया। शुरुआत में रेखा को स्कूल आने जाने में काफी परेशानी हुई। हाथ न होने की वजह से रेखा ने पैर से लिखने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिल पाई, लेकिन हार नहीं मानी। इस बार रेखा ने मुंह में कलम दबा ली। कुछ ही दिन बाद वह लिखना सीख गई। लगातार अभ्यास के बाद मुंह से लिखने में वह माहिर हो गई। जब रेखा ने मुंह से लिखना शुरू किया तो परिवार एवं गांव के लोग उसका हौसला देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने रेखा को आगे पढ़ने में पूरी मदद की। इसके बाद गांव सदरपुर स्थित इंटर मदनपाल कॉलेज से वर्ष 2006 में हाईस्कूल एवं वर्ष 2008 में कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसने कोराल डिग्री कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की। फिर लखनऊ की डॉ. शकुंतला यूनिवर्सिटी से वर्ष 2016 में बीएड किया। रेखा का का शिक्षिका बनने का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। अब वह नोएडा में रहकर टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा की तैयारी कर रही है। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। इस समय रेखा घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है और शिक्षिका बनने की तैयारी में जुटी हुई हैं। रेखा का कहना है कि उसे दिव्यांग कहलाना पसंद नहीं है। उसका कहना है कि हौसला कर मजबूत हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है।
घरेलू कार्यों में दक्ष है रेखा
हसनपुर। रेखा का कहना है कि वह सभी घरेलू कार्य खुद ही करती है। खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने तक का कार्य खुद ही करती है। दोनों हाथ कटे होने के बावजूद भी वह किसी की सहायता लेना पसंद नहीं करती। रेखा का कहना है कि हाथ कटने के बाद किसी को उम्मीद नहीं थी कि वह कभी दूसरे लोगों की तरह सामान्य जिंदगी जी सकेगी।
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बहन भाइयों से मिला खूब स्नेह और प्यार
हसनपुर। गांव रजोहा निवासी रेखा को परिवार में बहन-भाइयों से खूब स्नेह और प्यार मिला। रेखा से बड़े तीन भाई हैं। जबसे बड़े नेन सिंह, देवराज, कुंवरपाल इसके बाद रेखा और पिंकी हैं। रेखा का कहना है कि हर कार्य में बहन भाइयों का पूरा सहयोग मिलता है।
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क्षेत्र के गांव रजोहा निवासी किसान जयपाल सिंह की बेटी रेखा चौहान करीब छह वर्ष की उम्र में घर पर ही चारा मशीन में आकर दोनों हाथ कोहनी तक हाथ कट गए थे। काफी समय तक रेखा को अपने दोनों कटे हुए हाथों की वजह से घर से बाहर निकलने में परेशानी होती थी, लेकिन ऐसी घड़ी में परिवार वालों ने रेखा का साथ नहीं छोड़ा। भाई-बहनों एवं दूसरों बच्चों को स्कूल जाते देख रेखा ने भी पढ़ने की इच्छा जताई। कई लोगों ने तर्क दिया कि वह कैसे लिख पाएगी। रेखा की जिद के आगे परिवार वालों ने गांव के ही प्राथमिक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया। शुरुआत में रेखा को स्कूल आने जाने में काफी परेशानी हुई। हाथ न होने की वजह से रेखा ने पैर से लिखने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिल पाई, लेकिन हार नहीं मानी। इस बार रेखा ने मुंह में कलम दबा ली। कुछ ही दिन बाद वह लिखना सीख गई। लगातार अभ्यास के बाद मुंह से लिखने में वह माहिर हो गई। जब रेखा ने मुंह से लिखना शुरू किया तो परिवार एवं गांव के लोग उसका हौसला देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने रेखा को आगे पढ़ने में पूरी मदद की। इसके बाद गांव सदरपुर स्थित इंटर मदनपाल कॉलेज से वर्ष 2006 में हाईस्कूल एवं वर्ष 2008 में कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसने कोराल डिग्री कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की। फिर लखनऊ की डॉ. शकुंतला यूनिवर्सिटी से वर्ष 2016 में बीएड किया। रेखा का का शिक्षिका बनने का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। अब वह नोएडा में रहकर टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा की तैयारी कर रही है। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। इस समय रेखा घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है और शिक्षिका बनने की तैयारी में जुटी हुई हैं। रेखा का कहना है कि उसे दिव्यांग कहलाना पसंद नहीं है। उसका कहना है कि हौसला कर मजबूत हो तो इंसान कुछ भी कर सकता है।
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घरेलू कार्यों में दक्ष है रेखा
हसनपुर। रेखा का कहना है कि वह सभी घरेलू कार्य खुद ही करती है। खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने तक का कार्य खुद ही करती है। दोनों हाथ कटे होने के बावजूद भी वह किसी की सहायता लेना पसंद नहीं करती। रेखा का कहना है कि हाथ कटने के बाद किसी को उम्मीद नहीं थी कि वह कभी दूसरे लोगों की तरह सामान्य जिंदगी जी सकेगी।
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बहन भाइयों से मिला खूब स्नेह और प्यार
हसनपुर। गांव रजोहा निवासी रेखा को परिवार में बहन-भाइयों से खूब स्नेह और प्यार मिला। रेखा से बड़े तीन भाई हैं। जबसे बड़े नेन सिंह, देवराज, कुंवरपाल इसके बाद रेखा और पिंकी हैं। रेखा का कहना है कि हर कार्य में बहन भाइयों का पूरा सहयोग मिलता है।