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खेलने कूदने की उम्र में अरविंद को चढ़ा था देशभक्ति का जूनुन
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शहीद अरविंद की तस्वीर के साथ माता-पिता।
- फोटो : JPNAGAR
खेलने कूदने की उम्र में देश के लिए अमरोहा के लाल को देशभक्ति का ऐसा जुनून चढ़ा की सेना में भर्ती होकर दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। कारगिल युद्ध में 21 दुश्मनों को ढेर करने के बाद सिर-सीने पर 11 गोली खाकर देश के लिए कुर्बानी दी थी। उनकी शहादत पर परिजन ही नहीं पूरा जिला गर्व करता है। बेटे को शहादत की दास्तान बताते हुए बुजुर्ग माता-पिता रो-पड़ते हैं।
जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर स्थित गांव मिलक छावी निवासी किसान मुखत्यार सिंह के पांच बच्चों में अरविंद सबसे बड़े थे। खेलने कूदने की उम्र में अरविंद देशभक्ति का जूनुन चढ़ा था। वर्ष 1996 में अरविंद सेना में भर्ती हुए। उनकी तैनाती 22 ग्रेनेडियर्स बटालिन में थी। पौने तीन वर्ष ड्यूटी करने के बाद अप्रैल 1999 में अरविंद दो माह की छुट्टी पर गांव आए थे। अरविंद 13 जून 1999 को ड्यूटी पर लौट रहे थे तभी कारगिल युद्ध शुरू हो गया। परिजनों ने अरविंद से एक महीने और अवकाश लेने की सलाह दी लेकिन वह नहीं माने, उन्होंने परिजनों को वतन पर मर मिटने का फर्ज याद दिलाया। पिता मुख्त्यार बताते है कि अरविंद रणभूमि में पीठ नहीं, सीने पर गोली खाने की बात करते थे। इसके बाद वह कारगिल के लिए रवाना हो गए थे। बताया जाता है कि आपरेशन विजय के दौरान 22 ग्रेनेडियर्स की ब्रावो कंपनी को प्वाइंट 5287 पर कब्जा करने का टास्क मिला था। 25-26 जून 1999 को दुश्मनों ने अग्रिम जमाव क्षेत्र में भारी बमबारी करना शुरू कर दिया। अचानक बमबारी से सेना आश्चर्यचकित हो गई। भारी बमबारी के बीच ग्रेनेडियर अरविंद सिंह ने हथियार और गोला बारूद सही जगह पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस बीच उन्होंने दुश्मन के 21 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। बाद में सीने और सिर में 11 गोली खाकर शहीद हो गए। 29 जून को तिरंगे में लिपटा अरविंद का शव गांव पहुंचा था।
कुशलक्षेम के तार से पहले पहुंच गया था शव
अमरोहा। दो महीने की छुट्टी काटने के बाद अरविंद 13 जून 1999 को डयूटी पर लौटे थे। यहां पहुंचने के बाद अरविंद ने 22 जून को अपने कुशलक्षेम का तार लिखकर परिजनों को भेजा था। लेकिन इसी बीच 25-26 जून को वह कारगिल में शहीद हो गए थे। 29 जून को शाम के समय उनका शव गांव पहुंचा था। अभी परिवार गम से उबरा नहीं था कि चार दिन बाद तीन जुलाई को अरविंद के कुशलक्षेम का तार पहुंचा। जिसमें उन्होंने लिखा था कि वहां के हालात सामान्य है और वह सकुशल पहुंच गए हैं। कुशलक्षेम का तार पढ़कर परिवार फिर से उनके गम में डूब गया।
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शहीदी गेट और अस्पताल का वादा नहीं हुआ पूरा
अमरोहा। शहीद के नाम से पेट्रोल पंप, गांव में अरविंद के नाम पर प्राइमरी स्कूल और शहीदी गेट का निर्माण, 25 बेड का सरकारी अस्पताल और गांव का नाम अरविंद नगर करने का वादा किया गया था। इनमें पेट्रोल पंप, प्राइमरी स्कूल खुलने और गांव का नाम अरविंद नगर मिलक करने के अलावा अन्य वादे आज तक पूरे नहीं हो सके है। अरविंद के भाई धर्मेंद्र सिंह बताते है कि कई बार शहीदी गेट के निर्माण और अस्पताल के लिए अफसरों से मांग की गई लेकिन आज तक सुनवाई नहीं हुई।
दोस्तों को आखिरी दावत देकर गया थे अरविंद, आई तो शहादत की खबर
अमरोहा। अरविंद के पिता मुखत्यार सिंह बताते हैं कि कारगिल युद्ध जाने से पहले पहले अरविंद अपने दोस्तों को दावत देकर गया था। उसने दोस्तों से कहा था कि पता नहीं अब वापसी होगी या नहीं। इसलिए उन्होंने दोस्तों का दावत दी थी।
हर साल मनाया जाता है अरविंद का बलिदान दिवस
अमरोहा। कारगिल में शहीद हुए अरविंद के माता-पिता उनकी शहादत को याद कर फफक पड़े हैं। रोजाना बेटे की तस्वीर देखकर जख्म हरे हो जाते हैं। मां चंद्रवती को 32 हजार रुपये पेंशन मिलती है। शहीद अरविंद पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनके भाई धर्मेंद्र सिंह के अलावा तीन बहनें सुदेश देवी, शशि देवी और सर्वेश देवी हैं। चारों भाई-बहनों को शादी हो चुकी है।
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जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर स्थित गांव मिलक छावी निवासी किसान मुखत्यार सिंह के पांच बच्चों में अरविंद सबसे बड़े थे। खेलने कूदने की उम्र में अरविंद देशभक्ति का जूनुन चढ़ा था। वर्ष 1996 में अरविंद सेना में भर्ती हुए। उनकी तैनाती 22 ग्रेनेडियर्स बटालिन में थी। पौने तीन वर्ष ड्यूटी करने के बाद अप्रैल 1999 में अरविंद दो माह की छुट्टी पर गांव आए थे। अरविंद 13 जून 1999 को ड्यूटी पर लौट रहे थे तभी कारगिल युद्ध शुरू हो गया। परिजनों ने अरविंद से एक महीने और अवकाश लेने की सलाह दी लेकिन वह नहीं माने, उन्होंने परिजनों को वतन पर मर मिटने का फर्ज याद दिलाया। पिता मुख्त्यार बताते है कि अरविंद रणभूमि में पीठ नहीं, सीने पर गोली खाने की बात करते थे। इसके बाद वह कारगिल के लिए रवाना हो गए थे। बताया जाता है कि आपरेशन विजय के दौरान 22 ग्रेनेडियर्स की ब्रावो कंपनी को प्वाइंट 5287 पर कब्जा करने का टास्क मिला था। 25-26 जून 1999 को दुश्मनों ने अग्रिम जमाव क्षेत्र में भारी बमबारी करना शुरू कर दिया। अचानक बमबारी से सेना आश्चर्यचकित हो गई। भारी बमबारी के बीच ग्रेनेडियर अरविंद सिंह ने हथियार और गोला बारूद सही जगह पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस बीच उन्होंने दुश्मन के 21 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। बाद में सीने और सिर में 11 गोली खाकर शहीद हो गए। 29 जून को तिरंगे में लिपटा अरविंद का शव गांव पहुंचा था।
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कुशलक्षेम के तार से पहले पहुंच गया था शव
अमरोहा। दो महीने की छुट्टी काटने के बाद अरविंद 13 जून 1999 को डयूटी पर लौटे थे। यहां पहुंचने के बाद अरविंद ने 22 जून को अपने कुशलक्षेम का तार लिखकर परिजनों को भेजा था। लेकिन इसी बीच 25-26 जून को वह कारगिल में शहीद हो गए थे। 29 जून को शाम के समय उनका शव गांव पहुंचा था। अभी परिवार गम से उबरा नहीं था कि चार दिन बाद तीन जुलाई को अरविंद के कुशलक्षेम का तार पहुंचा। जिसमें उन्होंने लिखा था कि वहां के हालात सामान्य है और वह सकुशल पहुंच गए हैं। कुशलक्षेम का तार पढ़कर परिवार फिर से उनके गम में डूब गया।
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शहीदी गेट और अस्पताल का वादा नहीं हुआ पूरा
अमरोहा। शहीद के नाम से पेट्रोल पंप, गांव में अरविंद के नाम पर प्राइमरी स्कूल और शहीदी गेट का निर्माण, 25 बेड का सरकारी अस्पताल और गांव का नाम अरविंद नगर करने का वादा किया गया था। इनमें पेट्रोल पंप, प्राइमरी स्कूल खुलने और गांव का नाम अरविंद नगर मिलक करने के अलावा अन्य वादे आज तक पूरे नहीं हो सके है। अरविंद के भाई धर्मेंद्र सिंह बताते है कि कई बार शहीदी गेट के निर्माण और अस्पताल के लिए अफसरों से मांग की गई लेकिन आज तक सुनवाई नहीं हुई।
दोस्तों को आखिरी दावत देकर गया थे अरविंद, आई तो शहादत की खबर
अमरोहा। अरविंद के पिता मुखत्यार सिंह बताते हैं कि कारगिल युद्ध जाने से पहले पहले अरविंद अपने दोस्तों को दावत देकर गया था। उसने दोस्तों से कहा था कि पता नहीं अब वापसी होगी या नहीं। इसलिए उन्होंने दोस्तों का दावत दी थी।
हर साल मनाया जाता है अरविंद का बलिदान दिवस
अमरोहा। कारगिल में शहीद हुए अरविंद के माता-पिता उनकी शहादत को याद कर फफक पड़े हैं। रोजाना बेटे की तस्वीर देखकर जख्म हरे हो जाते हैं। मां चंद्रवती को 32 हजार रुपये पेंशन मिलती है। शहीद अरविंद पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनके भाई धर्मेंद्र सिंह के अलावा तीन बहनें सुदेश देवी, शशि देवी और सर्वेश देवी हैं। चारों भाई-बहनों को शादी हो चुकी है।