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Amroha News: ... और कम उम्र में ही बे आवाज हो गया अमरोहा का हयात
Mon, 06 Jan 2025 01:46 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
Updated Mon, 06 Jan 2025 01:46 AM IST
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हयात अमरोहवी।
अमरोहा। आज के दौर में ढोलक कारोबार के रूप में अपनी पहचान बनाने वाला अमरोहा पुराने दौर में शायरी और संगीत की दुनिया में अपनी बादशाहत रखता था। यहां से निकले कई शायरों ने न केवल बॉलीवुड में अपनी छाप छोड़ी, बल्कि विदेशों में भी उनके कलाम को खूब तव्वजो मिली। अमरोहा के इतिहास में ऐसे शायरों की लंबी फेहरिस्त शामिल है। इनमें एक नाम सैयद मोहम्मद जाफर का भी है, जो अदबी दुनिया में हयात अमरोहवी के नाम से पहचाने गए।
मोहल्ला सफातपोता में सैयद मुहम्मद अहसान नकवी के यहां 1912 में जन्मे सैयद मोहम्मद जाफर का रुझान बचपन से ही शायरी में रहा। किशोर अवस्था आते-आते रोजगार की तलाश में वह मेरठ गए। लेकिन, उनका शायरी में झुकाव कम नहीं हुआ। इनके खानदान से ताल्लुक रखने वाले सैयद अहसन अख्तर की माने तो वह रईस अमरोहवी और कमाल अमरोही के समकालीन शायरों में एक थे। उन्होंने अमरोहा से हयात नामक मासिक पत्रिका से अपने कॅरियर की शुरुआत की। कविताओं और शायरी के प्रति जुनून का देखते हुए कमाल अमरोही के बुलावे पर वह मुंबई चले गए थे।
पुकार फिल्म के लिए लिखा था गाना
सैयद अहसन ने बताया कि सैयद मोहम्मद जाफर कमाल अमरोही से प्रभावित थे। उन्होंने उनकी फिल्म पुकार के लिए जिंदगी का साज भी किया साज है, बज रहा है और बे आवाज है लिखा। जो उस दौर बहुत पसंद किया गया। इसके अलावा गजल और शायरी में उन्हाेंने काफी नाम कमाया। हालांकि, उनके इस शौक को उनकी उम्र का साथ नहीं मिल सका। 1946 में अल्पायु में ही उनका निधन हो गया।
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हयात के इंतकाल के बाद पाकिस्तान चला गया परिवार
सैयद अहसन अख्तर ने बताया कि उनके कोई संतान नहीं थी। परिवार में भाई और भतीजे थे, जो उनके इंतकाल के बाद 1947 के बंटवारे में पाकिस्तान चले गए थे। यहां का मकान भी किसी को बेच दिया। अब उनसे से ताल्लुक रखने वाला कोई यहां नहीं है। हालांकि, उनके नाम पर कभी कभार मुशायरा आदि आयोजित होता रहता है।
फारसी और अरबी में भी थी मजबूत पकड़
बताया जाता है कि हयात अमरोहवी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उसके बाद कदीमी मदरसे सैयद अल-मदारिस से फारसी और अरबी की पढ़ाई की। इसके बाद वह मेरठ में नौकरी करने चले गए, रोजगार के साथ शिक्षा भी जारी रखी। हालांकि, बाद में वह अमरोहा लौट आए और शहर के आईएम काॅलेज में बतौर शिक्षक के रूप में भी सेवा दी।
ये हैं मुख्य शायरी
वो दिल नहीं रहा वो तबीअत नहीं रही
शायद अब उन को मुझ से मोहब्बत नहीं रही
-- -
हां ऐ हयात हम ने जमाने के दुख सहे
फिर भी हमें किसी से शिकायत नहीं रही
करीब मौत खड़ी है जरा ठहर जाओ
कजा से आंख लड़ी है जरा ठहर जाओ
-- -
न जाओ तुम अभी तारों का दिल धड़कता है
तमाम रात पड़ी है जरा ठहर जाओ
-- --
बुझे बुझे से सितारे थकी थकी सी निगाह
बड़ी उदास घड़ी है जरा ठहर जाओ
-- --
नहीं उम्मीद कि हम आज की सहर देखें
ये रात हम पे कड़ी है जरा ठहर जाओ
-- --
हयात का दम-ए-आखिर नहीं है जान-ए-हयात
ये फैसले की घड़ी है जरा ठहर जाओ
-- --
तुम्हें तो कद्र करनी चाहिए थी अपने आशिक की
गिराते हो नजर से तुम उसे जो दिल से मिलता है
-- -
हयात उन का जमाना है वो जो चाहें सितम ढाएं
मगर आशिक भी मुझ जैसा बड़ी मुश्किल से मिलता है
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मोहल्ला सफातपोता में सैयद मुहम्मद अहसान नकवी के यहां 1912 में जन्मे सैयद मोहम्मद जाफर का रुझान बचपन से ही शायरी में रहा। किशोर अवस्था आते-आते रोजगार की तलाश में वह मेरठ गए। लेकिन, उनका शायरी में झुकाव कम नहीं हुआ। इनके खानदान से ताल्लुक रखने वाले सैयद अहसन अख्तर की माने तो वह रईस अमरोहवी और कमाल अमरोही के समकालीन शायरों में एक थे। उन्होंने अमरोहा से हयात नामक मासिक पत्रिका से अपने कॅरियर की शुरुआत की। कविताओं और शायरी के प्रति जुनून का देखते हुए कमाल अमरोही के बुलावे पर वह मुंबई चले गए थे।
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पुकार फिल्म के लिए लिखा था गाना
सैयद अहसन ने बताया कि सैयद मोहम्मद जाफर कमाल अमरोही से प्रभावित थे। उन्होंने उनकी फिल्म पुकार के लिए जिंदगी का साज भी किया साज है, बज रहा है और बे आवाज है लिखा। जो उस दौर बहुत पसंद किया गया। इसके अलावा गजल और शायरी में उन्हाेंने काफी नाम कमाया। हालांकि, उनके इस शौक को उनकी उम्र का साथ नहीं मिल सका। 1946 में अल्पायु में ही उनका निधन हो गया।
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हयात के इंतकाल के बाद पाकिस्तान चला गया परिवार
सैयद अहसन अख्तर ने बताया कि उनके कोई संतान नहीं थी। परिवार में भाई और भतीजे थे, जो उनके इंतकाल के बाद 1947 के बंटवारे में पाकिस्तान चले गए थे। यहां का मकान भी किसी को बेच दिया। अब उनसे से ताल्लुक रखने वाला कोई यहां नहीं है। हालांकि, उनके नाम पर कभी कभार मुशायरा आदि आयोजित होता रहता है।
फारसी और अरबी में भी थी मजबूत पकड़
बताया जाता है कि हयात अमरोहवी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उसके बाद कदीमी मदरसे सैयद अल-मदारिस से फारसी और अरबी की पढ़ाई की। इसके बाद वह मेरठ में नौकरी करने चले गए, रोजगार के साथ शिक्षा भी जारी रखी। हालांकि, बाद में वह अमरोहा लौट आए और शहर के आईएम काॅलेज में बतौर शिक्षक के रूप में भी सेवा दी।
ये हैं मुख्य शायरी
वो दिल नहीं रहा वो तबीअत नहीं रही
शायद अब उन को मुझ से मोहब्बत नहीं रही
हां ऐ हयात हम ने जमाने के दुख सहे
फिर भी हमें किसी से शिकायत नहीं रही
करीब मौत खड़ी है जरा ठहर जाओ
कजा से आंख लड़ी है जरा ठहर जाओ
न जाओ तुम अभी तारों का दिल धड़कता है
तमाम रात पड़ी है जरा ठहर जाओ
बुझे बुझे से सितारे थकी थकी सी निगाह
बड़ी उदास घड़ी है जरा ठहर जाओ
नहीं उम्मीद कि हम आज की सहर देखें
ये रात हम पे कड़ी है जरा ठहर जाओ
हयात का दम-ए-आखिर नहीं है जान-ए-हयात
ये फैसले की घड़ी है जरा ठहर जाओ
तुम्हें तो कद्र करनी चाहिए थी अपने आशिक की
गिराते हो नजर से तुम उसे जो दिल से मिलता है
हयात उन का जमाना है वो जो चाहें सितम ढाएं
मगर आशिक भी मुझ जैसा बड़ी मुश्किल से मिलता है