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पूर्वजों की याद में दीपदान कर आंखों से छलक आए आंसू
Updated Sat, 04 Nov 2017 01:07 AM IST
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पूर्वजों की याद में दीपदान कर आंखों से छलक आए आंसू
अमर उजाला ब्यूरो
गजरौला। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चर्तुदशी पर सूर्यास्त के समय तिगरी के गंगाघाट जगमगा उठे। यहां दीपदान का सिलसिला शुरू होते ही गंगा का किनारा ऐसा लगने लगा जैसे आकाश से तारे उतर आए हो। यह सिलसिला काफी देर तक चला और महाभारत काल से चली आ रही इस परम्परा के तहत हजारों श्रद्धालुओं ने नम आंखों से पूर्वजों की दिवंगत आत्माओं की शांति को दीये जलाकर गंगा को दान किए।
पूर्वजों की मानें तो महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चल रही है। शुक्रवार की शाम सूर्यास्त होते ही तिगरी हजारों श्रद्धालु दीपदान के लिए घाट पर पहुंच गए और नम आंखों से दीपदान का सिलसिला शुरू हो गया। जो देररात तक जारी रहा। अपने सगे संबंधी और परिजनों से बिछड़े लोगों को याद कर लोगों की आंखें भर आईं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट आसमान में तारों जैसा दिखाई देने लगा। कुछ श्रद्घालु जाम में फंसने के कारण सूर्य अस्त होने के काफी देर बाद तिगरी गंगाघाट पहुंच पाए। इसके बाद दीपदान किया। दीपदान के बाद पुरोहितों को वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा आदि का दान भी किया। पुरोहितों के अनुसार महाभारत काल से चली आ रही इस परंपरा के निर्वहन को काफी श्रद्धालु पहुंचे। इनके लिए घाटों पर सफाई व प्रकाश की भी व्यवस्था रही। इन श्रद्धालुओं को दीपों के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़े, इसके लिए घाटों पर ही दीप व गंगा पूजन की सामग्री बेचने वाले घूम रहे थे। फोटो भी है।
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अमर उजाला ब्यूरो
गजरौला। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चर्तुदशी पर सूर्यास्त के समय तिगरी के गंगाघाट जगमगा उठे। यहां दीपदान का सिलसिला शुरू होते ही गंगा का किनारा ऐसा लगने लगा जैसे आकाश से तारे उतर आए हो। यह सिलसिला काफी देर तक चला और महाभारत काल से चली आ रही इस परम्परा के तहत हजारों श्रद्धालुओं ने नम आंखों से पूर्वजों की दिवंगत आत्माओं की शांति को दीये जलाकर गंगा को दान किए।
पूर्वजों की मानें तो महाभारत युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चल रही है। शुक्रवार की शाम सूर्यास्त होते ही तिगरी हजारों श्रद्धालु दीपदान के लिए घाट पर पहुंच गए और नम आंखों से दीपदान का सिलसिला शुरू हो गया। जो देररात तक जारी रहा। अपने सगे संबंधी और परिजनों से बिछड़े लोगों को याद कर लोगों की आंखें भर आईं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट आसमान में तारों जैसा दिखाई देने लगा। कुछ श्रद्घालु जाम में फंसने के कारण सूर्य अस्त होने के काफी देर बाद तिगरी गंगाघाट पहुंच पाए। इसके बाद दीपदान किया। दीपदान के बाद पुरोहितों को वस्त्र, अन्न एवं दक्षिणा आदि का दान भी किया। पुरोहितों के अनुसार महाभारत काल से चली आ रही इस परंपरा के निर्वहन को काफी श्रद्धालु पहुंचे। इनके लिए घाटों पर सफाई व प्रकाश की भी व्यवस्था रही। इन श्रद्धालुओं को दीपों के लिए इधर उधर भटकना नहीं पड़े, इसके लिए घाटों पर ही दीप व गंगा पूजन की सामग्री बेचने वाले घूम रहे थे। फोटो भी है।
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