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शनै-शनै लोकतंत्र के सफर में आता गया बदलाव
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01 : जगदीशपुर : रानी जाहिदुल निशा। -संवाद
- फोटो : AMETHI
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जगदीशपुर (अमेठी)। बात उन दिनों की है, जब देश आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में धीरे-धीरे अपने पांव जमा रहा था। तब आज की तरह न तो संसाधन थे और न ही वोटर। न लक्जरी गाड़ियां थीं, न दो पहिया वाहन और न ही सोशल मीडिया का ताम-झाम। गांव की पगडंडियां और खेतों के मेड़ों से चल कर मतदाताओं की तलाश करनी पड़ती थी। पहले हर व्यक्ति वोटर नहीं हुआ करता था। उस समय केवल दो तरह के मतदाताओं को मतदान का अधिकार होता था। पहले वे जो माल गुजारी देते थे या फिर मिडिल पास व्यक्ति ही मतदाता हुआ करते थे। उन्हें ही अपना वोट देकर प्रतिनिधि चुनने का हक मिलता था।
शनै-शनै लोकतंत्र के इस सफर में बदलाव आता गया। आज आम आदमी वोटर जरूर है, लेकिन उसके भीतर राजनीतिक शुचिता का अभाव है। इसे लेकर चिंतित हैं वे वयोवृद्ध जो आजाद भारत के पहले चुनाव में शामिल रहे हैं। इसमें से कुछ उम्र के नौ दशक गुजार चुके हैं तो कुछ इसी के करीब हैं। जन सेवा में लंबा वक्त गुजार चुके इन वयो वृद्ध लोगों से जब ‘अमर उजाला’ ने बात की तो वे गुजरे जमाने की राजनीतिक चेतना को लेकर भावुक हो गए।
कंपकंपाते होठों से जो शब्द निकलते हैं वे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। महोना रियासत की 95 वर्षीय रानी जाहिदुल निशा अब थोड़ा तेज आवाज में सुनती हैं। ज्यादा बातें कर पाना संभव नहीं था। फिर भी जो जानकारियां मिलीं वह काफी रोचक हैं। इस रियासत के राजा सिराज का इंतकाल (मृत्यु) चार अप्रैल वर्ष 1964 में हो गया था। कंपकंपाते होठों से बताती हैं कि वर्ष 1949 में उनकी शादी हुई थी और 15 वर्षों बाद 28 साल की उम्र में वे विधवा हो गईं।
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जेहन पर जोर डालते हुए वे पहले आम चुनाव की बात करते हुए बताती हैं कि सन 1952 के चुनाव में उस समय हर व्यक्ति वोट तो दे नहीं सकता था। जो 25 रुपये माल गुजारी देते थे या फिर मिडिल पास होते थे वही मतदाता रहा करते थे। गांव की पगडंडियां छान वोटर खोजना पड़ता था। एक वाकये का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 1952 और 57 के चुनाव में मात्र दो हजार रुपये के खर्चे में चुनाव हो जाता था।
वोटर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते साधन के अभाव में प्रत्याशियों को गावों के भीतर खलिहान में ही पुआल के बिछोने पर रात गुजारनी पड़ती थी। उस समय उनके पति राजा सिराज ने भी वर्ष 1962 का निर्दलीय चुनाव मामूली खर्चे पर लड़ा था और हार गए थे। तब से जो भी प्रत्याशी चुनाव में उनसे मिलने कोट के भीतर जाता था। उसके समर्थन में दीवारों के भीतर से ही अपने लोगों को मदद के लिए कह देती थीं। (संवाद)
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शनै-शनै लोकतंत्र के इस सफर में बदलाव आता गया। आज आम आदमी वोटर जरूर है, लेकिन उसके भीतर राजनीतिक शुचिता का अभाव है। इसे लेकर चिंतित हैं वे वयोवृद्ध जो आजाद भारत के पहले चुनाव में शामिल रहे हैं। इसमें से कुछ उम्र के नौ दशक गुजार चुके हैं तो कुछ इसी के करीब हैं। जन सेवा में लंबा वक्त गुजार चुके इन वयो वृद्ध लोगों से जब ‘अमर उजाला’ ने बात की तो वे गुजरे जमाने की राजनीतिक चेतना को लेकर भावुक हो गए।
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कंपकंपाते होठों से जो शब्द निकलते हैं वे मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था पर प्रहार करते हैं। महोना रियासत की 95 वर्षीय रानी जाहिदुल निशा अब थोड़ा तेज आवाज में सुनती हैं। ज्यादा बातें कर पाना संभव नहीं था। फिर भी जो जानकारियां मिलीं वह काफी रोचक हैं। इस रियासत के राजा सिराज का इंतकाल (मृत्यु) चार अप्रैल वर्ष 1964 में हो गया था। कंपकंपाते होठों से बताती हैं कि वर्ष 1949 में उनकी शादी हुई थी और 15 वर्षों बाद 28 साल की उम्र में वे विधवा हो गईं।
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जेहन पर जोर डालते हुए वे पहले आम चुनाव की बात करते हुए बताती हैं कि सन 1952 के चुनाव में उस समय हर व्यक्ति वोट तो दे नहीं सकता था। जो 25 रुपये माल गुजारी देते थे या फिर मिडिल पास होते थे वही मतदाता रहा करते थे। गांव की पगडंडियां छान वोटर खोजना पड़ता था। एक वाकये का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 1952 और 57 के चुनाव में मात्र दो हजार रुपये के खर्चे में चुनाव हो जाता था।
वोटर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते साधन के अभाव में प्रत्याशियों को गावों के भीतर खलिहान में ही पुआल के बिछोने पर रात गुजारनी पड़ती थी। उस समय उनके पति राजा सिराज ने भी वर्ष 1962 का निर्दलीय चुनाव मामूली खर्चे पर लड़ा था और हार गए थे। तब से जो भी प्रत्याशी चुनाव में उनसे मिलने कोट के भीतर जाता था। उसके समर्थन में दीवारों के भीतर से ही अपने लोगों को मदद के लिए कह देती थीं। (संवाद)