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अमेठी की सियासत में रहा राजघराने का दबदबा
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अमेठी। आजादी के बाद से अब तक के चुनावी इतिहास को खंगालें तो अमेठी की सियासत में राजघराने का दबदबा पता चलता है। 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर पिछले चुनाव तक (2004 में हुए उपचुनाव को लेकर 18) यह परिवार 11 बार चुनावी मैदान में उतरा। इन चुनावों में से नौ बार उसे जीत तो दो बार हार नसीब हुई। इस परिवार की दो पीढ़ियों के चार लोग अब तक निर्दलीय से लेकर अलग-अलग दलों से विधायक बनकर विधानसभा पहुंच चुके हैं।
अमेठी सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हमेशा चर्चा में रही है। सिद्ध पीठ कालिकन धाम, स्वामी परमहंस महाराज, महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी की कर्मस्थली इसी पुनीत क्षेत्र के आंगन में है। साहित्यिक दृष्टिकोण से भी अमेठी ने काफी कीर्ति हासिल की है। अमेठी का जनमानस सहृदयता पूर्वक अपने प्रतिनिधि का चयन करता रहा है।
पहले आम चुनाव से लेकर पिछले आम चुनाव तक अमेठी की सियासत में राजघराने का दबदबा रहा है। इस परिवार के प्रभाव को इस बात से भी समझा जा सकता है कि पंडित मोतीलाल नेहरू से लेकर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी से लेकर संजय, राजीव, सोनिया व राहुल तक से इस घराने का मधुर संबंध रहा।
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इस परिवार के पहले सदस्य रणंजय प्रताप सिंह उर्फ ददन ने आजादी के बाद 1952 में हुए पहले विधानसभा आम चुनाव में बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ा। इस चुनाव में जनता रणंजय के साथ रही और उन्हें क्षेत्र का प्रथम विधायक बनने का गौरव हासिल हुआ। इस चुनाव के बाद यह परिवार एक दशक तक राजनीति से दूर रहा।
1969 के विधानसभा चुनाव में रणंजय प्रताप सिंह जनसंघ से चुनाव लड़े और कांग्रेस के बैजनाथ सिंह को हराकर सदन में पहुंचे। इसके बाद वर्ष 1974 में रणंजय प्रताप सिंह ने कांग्रेस से चुनाव लड़ कर जनसंघ प्रत्याशी रवींद्र प्रताप सिंह को पराजित किया। वर्ष 1980 में इस परिवार के डॉ. संजय सिंह कांग्रेस पार्टी से चुनाव मैदान में उतरे और जनता पार्टी के हरिचरन यादव को पराजित कर पहली बार विधानसभा पहुंचे। वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में डॉ. संजय सिंह फिर कांग्रेस से चुनाव लड़े और बीजेपी के बीसी मिश्र को पराजित किया।
वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में डॉ. संजय सिंह जनता दल से चुनाव लड़े लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 2002 में अमेठी राजघराने से भाजपा के टिकट पर संजय सिंह की पत्नी डॉ. अमीता सिंह चुनाव मैदान में उतरीं और कांग्रेस प्रत्याशी आशीष शुक्ला को पराजित किया। हालांकि अमीता सिंह लंबे समय तक भाजपा में नहीं रहीं।
2004 में लोकसभा चुनाव के ऐन पहले अमीता सिंह ने भाजपा व विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। लोकसभा चुनाव के साथ यहां उपचुनाव हुआ। कांग्रेस ने अमीता को प्रत्याशी बनाया और वे चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गईं। 2007 में वे फिर कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनीं। 2012 के चुनाव में अमीता को हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें सपा के गायत्री प्रसाद प्रजापति ने पराजित किया। 2017 के चुनाव में डॉ. संजय सिंह की पत्नी गरिमा सिंह भाजपा से लड़ीं और चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं। (संवाद)
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अमेठी सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हमेशा चर्चा में रही है। सिद्ध पीठ कालिकन धाम, स्वामी परमहंस महाराज, महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी की कर्मस्थली इसी पुनीत क्षेत्र के आंगन में है। साहित्यिक दृष्टिकोण से भी अमेठी ने काफी कीर्ति हासिल की है। अमेठी का जनमानस सहृदयता पूर्वक अपने प्रतिनिधि का चयन करता रहा है।
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पहले आम चुनाव से लेकर पिछले आम चुनाव तक अमेठी की सियासत में राजघराने का दबदबा रहा है। इस परिवार के प्रभाव को इस बात से भी समझा जा सकता है कि पंडित मोतीलाल नेहरू से लेकर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी से लेकर संजय, राजीव, सोनिया व राहुल तक से इस घराने का मधुर संबंध रहा।
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इस परिवार के पहले सदस्य रणंजय प्रताप सिंह उर्फ ददन ने आजादी के बाद 1952 में हुए पहले विधानसभा आम चुनाव में बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ा। इस चुनाव में जनता रणंजय के साथ रही और उन्हें क्षेत्र का प्रथम विधायक बनने का गौरव हासिल हुआ। इस चुनाव के बाद यह परिवार एक दशक तक राजनीति से दूर रहा।
1969 के विधानसभा चुनाव में रणंजय प्रताप सिंह जनसंघ से चुनाव लड़े और कांग्रेस के बैजनाथ सिंह को हराकर सदन में पहुंचे। इसके बाद वर्ष 1974 में रणंजय प्रताप सिंह ने कांग्रेस से चुनाव लड़ कर जनसंघ प्रत्याशी रवींद्र प्रताप सिंह को पराजित किया। वर्ष 1980 में इस परिवार के डॉ. संजय सिंह कांग्रेस पार्टी से चुनाव मैदान में उतरे और जनता पार्टी के हरिचरन यादव को पराजित कर पहली बार विधानसभा पहुंचे। वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में डॉ. संजय सिंह फिर कांग्रेस से चुनाव लड़े और बीजेपी के बीसी मिश्र को पराजित किया।
वर्ष 1989 के विधानसभा चुनाव में डॉ. संजय सिंह जनता दल से चुनाव लड़े लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 2002 में अमेठी राजघराने से भाजपा के टिकट पर संजय सिंह की पत्नी डॉ. अमीता सिंह चुनाव मैदान में उतरीं और कांग्रेस प्रत्याशी आशीष शुक्ला को पराजित किया। हालांकि अमीता सिंह लंबे समय तक भाजपा में नहीं रहीं।
2004 में लोकसभा चुनाव के ऐन पहले अमीता सिंह ने भाजपा व विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। लोकसभा चुनाव के साथ यहां उपचुनाव हुआ। कांग्रेस ने अमीता को प्रत्याशी बनाया और वे चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गईं। 2007 में वे फिर कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनीं। 2012 के चुनाव में अमीता को हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें सपा के गायत्री प्रसाद प्रजापति ने पराजित किया। 2017 के चुनाव में डॉ. संजय सिंह की पत्नी गरिमा सिंह भाजपा से लड़ीं और चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं। (संवाद)