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महंगाई और आधुनिकता में पीछे रह गए मिट्टी के दीपक

Mon, 25 Oct 2021 11:48 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 25 Oct 2021 11:48 PM IST
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Earthen lamps left behind in inflation and modernity
14 : इन्हौना : मिट्टी के दीये बनाता कुम्हार। -संवाद - फोटो : AMETHI
इन्हौना (अमेठी)। महंगाई की मार और आधुनिकता की दौड़ में लोगों ने देश की परंपरा को भुला दिया है। रोशनी के त्योहार दीपावली पर जहां लोग दीपों से अपने घरों और प्रतिष्ठानों को जगमग करते थे वहीं अब इनकी जगह बिजली की झालरों ने ले ली है। इसका एक कारण मिलने वाली सहूलियत है वहीं दूसरा कारण महंगाई भी है।
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जहां लोग बिजली की एक झालर खरीद कर सालों इस्तेमाल में लाते हैं, वहीं तेल के बेतहाशा बढ़े दामों ने भी उन्हें परंपरा से कोसों दूर कर दिया है। ऐसे में सरकार की मिट्टी के बर्तनों को इस्तेमाल कर पर्यावरण संतुलन की सीख फीकी पड़ रही है तो कुम्हारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो रहा है।
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दीपावली हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख त्योहारों में एक है। इस दिन लोग अपने घरों को रोशन करने के साथ लक्ष्मी गणेश की पूजा करते हैं। पहले लोग अपने घरों व प्रतिष्ठानों को रोशन करने के लिए मिट्टी के दीयों का इस्तेमाल करते थे।
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दीपावली पर्व का आगमन मिट्टी के कामगारों के लिए एक सहालग की तरह होता था। चारों ओर मिट्टी के बने दीयों एवं मिट्टी से बने खिलौनों की धूम मची होती थी। गांव से लेकर शहरों तक मिट्टी से बने दीयों एवं खिलौनों की मांग बढ़ जाती थी। वर्तमान समय पर गौर करें तो मिट्टी से बने दीयों की जगह अब इलेक्ट्रानिक झालरों और मोमबत्ती ने ले ली है। यह दीवाली के दीयों की अपेक्षा सस्ती और सुविधाजनक हो गई है।

साल भर चल जाता था खर्च
सेमरौता कसबे के जुम्मन कसगर एवं सिद्दीक कसगर बताते हैं कि पिछली चार पीढ़ियों से उनके घर मिट्टी का काम होता आ रहा है। पूर्वज इस काम और कला से संतुष्ट थे। गांव में दीया देने पर उन्हें इतना राशन मिल जाता था उससे उनका साल भर खर्चा चल जाता था। लेकिन बिजली की रंग बिरंगी झालरों व मोमबत्ती ने काम बहुत ही कम कर दिया। इससे जीविकोपार्जन में भी परेशानी हो रही है।
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