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दरोगा व सिपाहियों को मारकर ऊंट से निकाली थी वंदेमातरम यात्रा

Fri, 13 Aug 2021 11:18 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Fri, 13 Aug 2021 11:18 PM IST
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Vande Mataram Yatra was taken out by camel after killing the constable and the soldiers
राजेसुल्तानपुर। देश की आजादी की75वीं वर्षगांठ के मौके पर भारतवासियों में देश भक्ति की भावना हिलोरें मार रही है। हर कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के कारनामे का गुणगान कर रहा है। अगस्त क्रांति के महान नायक वसुधा सिंह की कीर्ति गाथा आज भी पूर्वांचल के लोकगीतों और लोककथाओं का अभिन्न हिस्सा है। 23 अगस्त 1942 को इस रणबांकुरे ने आजादी के दीवानों पर कहर बरपाने वाले एक दरोगा और दो सिपाहियों को राजेसुल्तानपुर के मवेशी बाग में एक साथ ढेर कर अगस्त क्रांति के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ जोड़ा था, जिस पर आज भी हर भारतीय को गर्व है। महानायक ने भरी सभा में दरोगा तथा दो सिपाहियों को गोलियों से भून दिया था। इसके बाद उनकी लाश को ऊंट पर लादकर गाजे-बाजे के साथ वंदेमातरम का उद्घोष करते हुए यात्रा निकालकर घाघरा नदी में प्रवाहित कर दिया था।
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बताया जाता है कि घटना के समय वे राजेसुल्तानपुर के मवेशी बाग में आजादी की लड़ाई में शामिल युवाओं की फौज की विशाल जनसभा को संबोधित कर रहे थे। सभा में पूर्वांचल के हजारों नौजवान अंग्रेजी सिपाहियों से बचते-बचते किसी तरह पहुंचे थे। अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन के प्रस्ताव के अनुसार जब क्रांतिकारियों ने बाग में अंग्रेजों भारत छोड़ों, फिरंगी वापस जाओ के नारे लगाने शुरू किए तो जहांगीरगंज थाने का तत्कालीन दरोगा जलालुद्दीन खां पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गया और क्रांतिकारियों के साथ अभद्र व्यवहार शुरू कर दिया।
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अंग्रेजों के पिट्ठू सिपाहियों ने गालियां देते हुए वसुधा सिंह पर लगभग 10 गज की दूरी से ही रिवॉल्वर और रायफल तान दी। वसुधा सिंह सीधे दरोगा के घोड़े पर कूद पड़े और दरोगा अपने घोड़े के साथ भूमि पर गिर गया। दरोगा की सरकारी पिस्टल छीन कर उसे व उसके दो सहयोगी सिपाही कामता प्रसाद सिंह व जिवाऊ राम को उन्होंने मौके पर ही ढेर कर दिया। इसके बाद उनकी लाशों को ऊंट पर लादकर गाजे-बाजे के साथ वंदेमातरम का उद्घोष करते हुए यात्रा निकालकर घाघरा नदी में प्रवाहित कर दिया था। इस घटना के बाद क्षेत्र में अंग्रेजी हुकूमत का तांडव शुरू हो गया।
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दुर्गाईपुर, पोखर भिट्टा, घुघुरपट्टी, बनकटा, नूरावल, जोड़वाबर सहित तमाम गांवों के लोग अपना गांव छोड़कर नेपाल समेत अन्य जनपदों में जाकर छिपने के लिए विवश हुए। मवेशी बाग कांड के नायक वसुधा सिंह सहित 43 सेनानियों के विरुद्ध तीन बार में कत्ल का मुकदमा चला। 11 आरोपी फरार हो गए, जो आजादी के बाद घर लौटे।
15 मई 1946 को इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने कोलकाता के धरमतल्ला मैदान में ब्रिटिश फौज के समक्ष अपनी पूर्व निर्धारित योजना के मुताबिक आत्मसमर्पण कर दिया। बताया जाता है कि फरारी के दौरान उन्हें जिंदा या मृत पकड़ने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने 13 हजार रुपये व एक रिवॉल्वर का इनाम रखा था। इस कांड के लिए वसुधा सिंह को फांसी की सजा व 6 अन्य सेनानियों को उम्रकैद की सजा मिली थी। इस कांड में रामकरण सिंह सबसे कम उम्र के अभियुक्त थे। घटना के समय उनकी उम्र महज 13 वर्ष थी। उन्हें तीन वर्ष नजरबंदी की सजा मिली थी।

वसुधा सिंह को मिली फांसी की सजा को महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू आदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने गंभीरता से लिया और कोर्ट में चुनौती। बाद में काफी प्रयास के बाद फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील हुई। देशवासियों के भारी दबाव के चलते आजादी से तीन माह पहले ही उन्हें रिहा कर दिया गया। आजादी के दीवाने बाबू वसुधा सिंह का जन्म आलापुर तहसील क्षेत्र के पोखरभिट्टा में वर्ष 1901 में हुआ था। उन्होंने 11 दिसंबर 1982 को अंतिम सांस ली। वर्ष 2001 में उत्तर प्रदेश सेनानी कल्याण परिषद के तत्कालीन निदेशक धर्मराज सिंह के प्रयासों से मवेशी बाग में गांधी स्मारक इंटर कॉलेज के बगल पूर्वांचल के इस महान योद्धा की प्रतिमा स्थापित की गई। इस प्रतिमा का अनावरण 26 दिसंबर 2001 को तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने किया था।
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