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Ambedkar Nagar News: 25 साल पुराने भूमि विवाद में वादिनी को राहत नहीं
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अंबेडकरनगर। करीब 25 साल से लंबित जमीन विवाद में जिला जज चंद्रोदय कुमार ने वादिनी ललदेई को राहत देने से इन्कार कर दिया। उन्होंने सिविल रिवीजन संख्या 10/2025 खारिज करते हुए निचली अदालत के 11 नवंबर 2024 के आदेश को बरकरार रखा।
मामला ललदेई और मदन मोहन के बीच वर्ष 2001 से विचाराधीन है। वादिनी ने मुकदमे के दौरान विवादित भूमि के उत्तर-पूर्वी हिस्से पर विपक्षियों द्वारा निर्माण कर कब्जा करने का आरोप लगाया था। इसे लेकर उन्होंने वादपत्र में संशोधन की मांग की थी। इसमें नया नक्शा दाखिल करने, कथित अवैध निर्माण हटाकर कब्जा दिलाने तथा वाद के मूल्यांकन और न्याय शुल्क में बदलाव का आग्रह किया गया था।
विपक्षियों ने संशोधन का विरोध किया। जिला जज ने पाया कि इस मामले में छह दिसंबर 2013 को पहले ही संशोधन स्वीकार किया जा चुका है। मौजूदा आवेदन मुकदमे की सुनवाई शुरू होने और साक्ष्य के चरण में दाखिल किया गया। अदालत ने कहा कि सुनवाई शुरू होने के बाद संशोधन मांगने पर यह बताना आवश्यक है कि संबंधित तथ्य पहले क्यों नहीं उठाए गए। वादिनी कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सकीं। अदालत ने माना कि प्रस्तावित संशोधन महज औपचारिक सुधार नहीं था, बल्कि इससे मुकदमे का दायरा बढ़ता और विपक्षियों को नुकसान हो सकता था। इसी आधार पर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।
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मामला ललदेई और मदन मोहन के बीच वर्ष 2001 से विचाराधीन है। वादिनी ने मुकदमे के दौरान विवादित भूमि के उत्तर-पूर्वी हिस्से पर विपक्षियों द्वारा निर्माण कर कब्जा करने का आरोप लगाया था। इसे लेकर उन्होंने वादपत्र में संशोधन की मांग की थी। इसमें नया नक्शा दाखिल करने, कथित अवैध निर्माण हटाकर कब्जा दिलाने तथा वाद के मूल्यांकन और न्याय शुल्क में बदलाव का आग्रह किया गया था।
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विपक्षियों ने संशोधन का विरोध किया। जिला जज ने पाया कि इस मामले में छह दिसंबर 2013 को पहले ही संशोधन स्वीकार किया जा चुका है। मौजूदा आवेदन मुकदमे की सुनवाई शुरू होने और साक्ष्य के चरण में दाखिल किया गया। अदालत ने कहा कि सुनवाई शुरू होने के बाद संशोधन मांगने पर यह बताना आवश्यक है कि संबंधित तथ्य पहले क्यों नहीं उठाए गए। वादिनी कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सकीं। अदालत ने माना कि प्रस्तावित संशोधन महज औपचारिक सुधार नहीं था, बल्कि इससे मुकदमे का दायरा बढ़ता और विपक्षियों को नुकसान हो सकता था। इसी आधार पर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।
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