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सरयू तट पर 30 हजार दीप जला मनाएंगे देव दीपावली
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आलापुर। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर शुक्रवार को नयागांव स्थित सरयू घाट पर 30 हजार दीप जलाकर देव दीपावली मनाई जाएगी। यह कार्यक्रम सनातन वैदिक आश्रम देवभूमि नयागांव के संरक्षक श्रीनिवास दास वेदांती महाराज की देखरेख में संपन्न होगा।
देव दीपावली के महत्व को बताते हुए श्रीनिवास दास वेदांती महाराज ने कहा कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दीपदान करने की परंपरा है। इस दिन धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व होता है। इससे देवताओं को प्रसन्न किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद दान-पुण्य करने से कई तरह के पापों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान और तुलसी पूजा भी की जाती है। इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
विष्णु पुराण के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान नारायण ने मत्स्यावतार लिया था। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार त्रिपुरासुर राक्षस ने अपने आतंक से पूरी धरती और स्वर्गलोक के सभी लोगों को परेशान कर दिया था। देवता और ऋषि मुनि भी उसके आतंक से त्रस्त थे।
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परेशान होकर सभी देव उस राक्षस का अंत करने के लिए भगवान शिव से सहायता मांगने गए। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध कर दिया। इससे देवलोक में सभी देवता प्रसन्न हो गए और भोलेनाथ की नगरी काशी पहुंचे। सभी देवों ने काशी नगरी में दीपक जलाकर खुशियां मनाईं।
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देव दीपावली के महत्व को बताते हुए श्रीनिवास दास वेदांती महाराज ने कहा कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दीपदान करने की परंपरा है। इस दिन धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व होता है। इससे देवताओं को प्रसन्न किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद दान-पुण्य करने से कई तरह के पापों से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा कार्तिक पूर्णिमा के दिन दीपदान और तुलसी पूजा भी की जाती है। इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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विष्णु पुराण के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही भगवान नारायण ने मत्स्यावतार लिया था। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार त्रिपुरासुर राक्षस ने अपने आतंक से पूरी धरती और स्वर्गलोक के सभी लोगों को परेशान कर दिया था। देवता और ऋषि मुनि भी उसके आतंक से त्रस्त थे।
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परेशान होकर सभी देव उस राक्षस का अंत करने के लिए भगवान शिव से सहायता मांगने गए। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध कर दिया। इससे देवलोक में सभी देवता प्रसन्न हो गए और भोलेनाथ की नगरी काशी पहुंचे। सभी देवों ने काशी नगरी में दीपक जलाकर खुशियां मनाईं।