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Ambedkar Nagar News: करोड़ों का बजट, फिर भी राजकीय स्कूलों के छात्र मेधा सूची में शून्य
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अंबेडकरनगर। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा परिणामों में जिले के राजकीय विद्यालयों का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा है। जिले की टॉप-10 सूची में एक भी राजकीय विद्यालय का विद्यार्थी स्थान नहीं बना सका। इसके उलट, निजी विद्यालयों के छात्रों ने मेधा सूची में अपना दबदबा बनाए रखा है।
जिले में कुल 32 राजकीय विद्यालय संचालित हैं, जबकि 60 अनुदानित और 286 निजी विद्यालय हैं। सरकार इन राजकीय विद्यालयों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है। यहां प्रधानाचार्यों और शिक्षकों की नियुक्ति आयोग के माध्यम से होती है और उन्हें निजी स्कूलों की तुलना में बेहतर वेतन व संसाधन मिलते हैं। इसके बावजूद परीक्षा परिणामों में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है।
राजकीय विद्यालयों के पिछड़ने के पीछे शिक्षकों की कमी एक बड़ी बाधा है। विशेषकर विज्ञान और गणित जैसे विषयों के लिए विशेषज्ञ शिक्षकों (प्रवक्ताओं) के पद खाली पड़े हैं।
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15 इंटर कॉलेजों में से 14 में भौतिक विज्ञान विषय पढ़ाया जा रहा है, लेकिन पूरे जिले में केवल एक प्रवक्ता तैनात है। जबकि सात कॉलेजों में से केवल चार में ही गणित के शिक्षक उपलब्ध हैं। वहीं 15 कॉलेजों में से सिर्फ आठ में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता हैं। 14 विद्यालयों में से आठ में ही जीव विज्ञान के शिक्षक तैनात हैं।
प्रधानाचार्यों का कहना है कि प्रवक्ताओं की कमी के कारण वैकल्पिक व्यवस्था से काम चलाया जाता है। पार्ट-टाइम रखे गए निजी शिक्षक केवल दो-तीन पीरियड पढ़ाकर चले जाते हैं, जिससे विषयों की गहन तैयारी नहीं हो पाती। यही कारण है कि छात्र निजी संसाधनों (कोचिंग या ट्यूशन) से पढ़ने को मजबूर हैं।
(संवाद)
वर्जन
प्रवक्ताओं और शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए विभाग को मांग पत्र भेजा जा चुका है। रिक्त पदों पर नियुक्तियां होने के बाद ही व्यवस्था में सुधार होगा। इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
- प्रवीण कुमार तिवारी, डीआईओएस
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जिले में कुल 32 राजकीय विद्यालय संचालित हैं, जबकि 60 अनुदानित और 286 निजी विद्यालय हैं। सरकार इन राजकीय विद्यालयों पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करती है। यहां प्रधानाचार्यों और शिक्षकों की नियुक्ति आयोग के माध्यम से होती है और उन्हें निजी स्कूलों की तुलना में बेहतर वेतन व संसाधन मिलते हैं। इसके बावजूद परीक्षा परिणामों में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है।
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राजकीय विद्यालयों के पिछड़ने के पीछे शिक्षकों की कमी एक बड़ी बाधा है। विशेषकर विज्ञान और गणित जैसे विषयों के लिए विशेषज्ञ शिक्षकों (प्रवक्ताओं) के पद खाली पड़े हैं।
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15 इंटर कॉलेजों में से 14 में भौतिक विज्ञान विषय पढ़ाया जा रहा है, लेकिन पूरे जिले में केवल एक प्रवक्ता तैनात है। जबकि सात कॉलेजों में से केवल चार में ही गणित के शिक्षक उपलब्ध हैं। वहीं 15 कॉलेजों में से सिर्फ आठ में रसायन विज्ञान के प्रवक्ता हैं। 14 विद्यालयों में से आठ में ही जीव विज्ञान के शिक्षक तैनात हैं।
प्रधानाचार्यों का कहना है कि प्रवक्ताओं की कमी के कारण वैकल्पिक व्यवस्था से काम चलाया जाता है। पार्ट-टाइम रखे गए निजी शिक्षक केवल दो-तीन पीरियड पढ़ाकर चले जाते हैं, जिससे विषयों की गहन तैयारी नहीं हो पाती। यही कारण है कि छात्र निजी संसाधनों (कोचिंग या ट्यूशन) से पढ़ने को मजबूर हैं।
(संवाद)
वर्जन
प्रवक्ताओं और शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए विभाग को मांग पत्र भेजा जा चुका है। रिक्त पदों पर नियुक्तियां होने के बाद ही व्यवस्था में सुधार होगा। इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
- प्रवीण कुमार तिवारी, डीआईओएस