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शहरियों ने कहा, संगमनगरी अब भी साफ
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 13 May 2016 01:33 AM IST
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वाटर लेवल घटने से खड़ी बोट
- फोटो : अमर उजाला
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भले ही दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की सूची में इलाहाबाद को तीसरे स्थान पर रखा है लेकिन संगम नगरी के लोग इसे सिरे से खारिज करते हैं। आम शहरियों के मुताबिक निश्चित रूप से तेजी से बदल रहे इलाहाबाद को भी प्रदूषण के तमाम कारणों ने जकड़ रखा है। इसके बावजूद तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो प्रदेश और देश के अन्य शहरों की अपेक्षा इलाहाबाद अब भी सबसे कम प्रदूषित है। शहरियों ने दो टूक कहा, हालांकि प्रदूषण का न्यूनतम स्तर भी चिंताजनक है लेकिन डब्ल्यूएचओ के आंकड़ें तो सच से मुंह चुराते और चौंकाते हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी मानता है कि शहर में प्रदूषण बढ़ा है पर डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक नहीं।
शहर को बढ़ते और बदलते हुए देखने वाले वरिष्ठ प्रोफेसर अमर सिंह कहते हैं, मेरे मुताबिक डब्ल्यूएचओ के आंकड़ें ठीक नहीं है। साफ सुथरी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें और हरियाली इलाहाबाद की पहचान थी, जिसमें कमी आई है लेकिन अन्य शहरों की बात करें तो यह पहचान अब भी कायम है। राजधानी दिल्ली और लखनऊ सहित अन्य तमाम शहरों की अपेक्षा इलाहाबाद में परेशान करने वाला प्रदूषण नहीं है।
वरिष्ठ कथा लेखिका प्रोफेसर अनीता गोपेश कहती हैं, तकरीबन दो वर्ष पहले तो इलाहाबाद सबसे कम प्रदूषित शहर था, ऐसे में प्रदूषण के शीर्ष पर पहुंचना चौंकाता है। दिल्ली में दिन भर घूमने के बाद पूरे शरीर पर प्रदूषण की छाप होती है, इसी तरह लखनऊ में आटो-विक्रम के धुएं से आंखों से पानी गिरने लगता था, इन सबको पीछे करके इलाहाबाद कैसे आगे निकल गया। भारती और भुवनेश्वर ने गुलमोहर और अमलताश और मुक्तछंद सी सड़कों की बात कही है। नि:संदेह स्थितियां पहले से खराब हैं लेकिन अब भी इलाहाबाद में गुलमोहर और अमलताश दिखते हैं। काफी हद तक हरियाली है और जाम तथा प्रदूषण की मात्रा भी कम।
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इलाहाबाद। डब्ल्यूएचओ की ओर से इलाहाबाद में प्रदूषण को लेकर आई रिपोर्ट सवालों के घेरे में है, क्योंकि क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इसकी खबर ही नहीं है। बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी एसबी फ्रैंकलीन के मुताबिक शहर में प्रदूषण का स्तर जांचने के लिए डब्ल्यूएचओ ने कब सर्वे कराया, इसके लिए स्टडी कैसे हुई, किस सीजन में प्रदूषण की जांच हुई, कुछ पता नहीं। मुमकिन है सेंट्रल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक रिपोर्ट तैयार हुई होगी।
ग्राउंड रियलिटी की बात करें तो बीते कई वर्षों में इलाहाबाद में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। इसकी मुख्य वजह शहर में तेजी से बढ़ती वाहनों की संख्या और बेतहाशा जनरेटर के इस्तेमाल के साथ सीवर लाइन बिछाने के लिए खोदी गई सड़क, रोड पटरी पर मिट्टी, खाना बनाने एवं होटलों में लकड़ी, कोयले के इस्तेमाल जैसे कारण हैं। बोर्ड के मुताबिक इलाहाबाद में वायु प्रदूषण (पार्टीकुलेट मैटर-10) तीन गुना तक बढ़ गया है। फिलहाल यह सौ माईक्रान प्रति घनमीटर के मानक की जगह तीन सौ माईक्रान प्रति घनमीटर या उससे अधिक पहुंच गया है।
शहर में वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या इसके लिए मुख्य वजह है। शहर में डीजल से चलने वाली बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों की संख्या काफी बढ़ी है। आरटीओ विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अकेले जनवरी से मार्च के बीच में ही शहर में तकरीबन 60 हजार गाड़ियां बिकीं और रोजाना तकरीबन 300 नई गाड़ियां सड़कों पर उतर रही हैं। छह हजार से अधिक विक्रम, ऑटो की वजह से भी वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। शहर में तकरीबन हर दुकान पर जनरेटर की वजह से प्रदूषण को बढ़ाने में अहम है।
इसी क्रम में वायु प्रदूषण बढ़ने का एक और बड़ा कारण सड़कों की खोदाई है। बीते कई वर्षों में शहर के तकरीबन हर हिस्से में सीवर लाइन बिछाने के लिए सड़कें खोदी गई, यह काम लगातार जारी है। सड़कों की खोदाई में निकलने वाली मिट्टी के अतिरिक्त सड़क किनारे की कच्ची पटरी से भी लगातार धूल उड़ती है। इससे पीएम-10 लगातार बढ़ रहा है।
बेतरतीब यातायात व्यवस्था भी एक अन्य वजह है जिससे जगह-जगह जाम लगता है और स्टार्ट वाहन काफी देर तक जाम में फंसे रहते हैं। रामबाग रेलवे क्रासिंग, बाई का बाग, जानसेनगंज चौराहा, हाईकोर्ट पानी टंकी चौराहा, फोर्ट रोड चौराहा, बैरहना में नए पुल के पास आदि में स्थिति ज्यादा गंभीर है।
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शहर को बढ़ते और बदलते हुए देखने वाले वरिष्ठ प्रोफेसर अमर सिंह कहते हैं, मेरे मुताबिक डब्ल्यूएचओ के आंकड़ें ठीक नहीं है। साफ सुथरी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें और हरियाली इलाहाबाद की पहचान थी, जिसमें कमी आई है लेकिन अन्य शहरों की बात करें तो यह पहचान अब भी कायम है। राजधानी दिल्ली और लखनऊ सहित अन्य तमाम शहरों की अपेक्षा इलाहाबाद में परेशान करने वाला प्रदूषण नहीं है।
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वरिष्ठ कथा लेखिका प्रोफेसर अनीता गोपेश कहती हैं, तकरीबन दो वर्ष पहले तो इलाहाबाद सबसे कम प्रदूषित शहर था, ऐसे में प्रदूषण के शीर्ष पर पहुंचना चौंकाता है। दिल्ली में दिन भर घूमने के बाद पूरे शरीर पर प्रदूषण की छाप होती है, इसी तरह लखनऊ में आटो-विक्रम के धुएं से आंखों से पानी गिरने लगता था, इन सबको पीछे करके इलाहाबाद कैसे आगे निकल गया। भारती और भुवनेश्वर ने गुलमोहर और अमलताश और मुक्तछंद सी सड़कों की बात कही है। नि:संदेह स्थितियां पहले से खराब हैं लेकिन अब भी इलाहाबाद में गुलमोहर और अमलताश दिखते हैं। काफी हद तक हरियाली है और जाम तथा प्रदूषण की मात्रा भी कम।
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इलाहाबाद। डब्ल्यूएचओ की ओर से इलाहाबाद में प्रदूषण को लेकर आई रिपोर्ट सवालों के घेरे में है, क्योंकि क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इसकी खबर ही नहीं है। बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी एसबी फ्रैंकलीन के मुताबिक शहर में प्रदूषण का स्तर जांचने के लिए डब्ल्यूएचओ ने कब सर्वे कराया, इसके लिए स्टडी कैसे हुई, किस सीजन में प्रदूषण की जांच हुई, कुछ पता नहीं। मुमकिन है सेंट्रल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक रिपोर्ट तैयार हुई होगी।
ग्राउंड रियलिटी की बात करें तो बीते कई वर्षों में इलाहाबाद में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। इसकी मुख्य वजह शहर में तेजी से बढ़ती वाहनों की संख्या और बेतहाशा जनरेटर के इस्तेमाल के साथ सीवर लाइन बिछाने के लिए खोदी गई सड़क, रोड पटरी पर मिट्टी, खाना बनाने एवं होटलों में लकड़ी, कोयले के इस्तेमाल जैसे कारण हैं। बोर्ड के मुताबिक इलाहाबाद में वायु प्रदूषण (पार्टीकुलेट मैटर-10) तीन गुना तक बढ़ गया है। फिलहाल यह सौ माईक्रान प्रति घनमीटर के मानक की जगह तीन सौ माईक्रान प्रति घनमीटर या उससे अधिक पहुंच गया है।
शहर में वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या इसके लिए मुख्य वजह है। शहर में डीजल से चलने वाली बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों की संख्या काफी बढ़ी है। आरटीओ विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अकेले जनवरी से मार्च के बीच में ही शहर में तकरीबन 60 हजार गाड़ियां बिकीं और रोजाना तकरीबन 300 नई गाड़ियां सड़कों पर उतर रही हैं। छह हजार से अधिक विक्रम, ऑटो की वजह से भी वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। शहर में तकरीबन हर दुकान पर जनरेटर की वजह से प्रदूषण को बढ़ाने में अहम है।
इसी क्रम में वायु प्रदूषण बढ़ने का एक और बड़ा कारण सड़कों की खोदाई है। बीते कई वर्षों में शहर के तकरीबन हर हिस्से में सीवर लाइन बिछाने के लिए सड़कें खोदी गई, यह काम लगातार जारी है। सड़कों की खोदाई में निकलने वाली मिट्टी के अतिरिक्त सड़क किनारे की कच्ची पटरी से भी लगातार धूल उड़ती है। इससे पीएम-10 लगातार बढ़ रहा है।
बेतरतीब यातायात व्यवस्था भी एक अन्य वजह है जिससे जगह-जगह जाम लगता है और स्टार्ट वाहन काफी देर तक जाम में फंसे रहते हैं। रामबाग रेलवे क्रासिंग, बाई का बाग, जानसेनगंज चौराहा, हाईकोर्ट पानी टंकी चौराहा, फोर्ट रोड चौराहा, बैरहना में नए पुल के पास आदि में स्थिति ज्यादा गंभीर है।