{"_id":"437e5ac4e413e98cd078033aeaff2069","slug":"upsc-news-hindi-news-3","type":"story","status":"publish","title_hn":"उप्र लोक सेवा आयोग अध्यक्ष की नियुक्ति अवैध, रद्द","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उप्र लोक सेवा आयोग अध्यक्ष की नियुक्ति अवैध, रद्द
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 14 Oct 2015 11:52 PM IST
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से की जा रही मनमानी नियुक्तियों पर एक और चोट करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार यादव की नियुक्ति को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अध्यक्ष पद पर अनिल यादव की नियुक्ति के लिए सरकार ने पूरी तरह से मनमानी की है। बिना संवैधानिक प्रक्रिया का पालन और बिना विवेक का प्रयोग किए उनकी नियुक्ति की गई। अध्यक्ष पद पर चयन करते समय न तो योग्यता, आचरण, चरित्र, सत्यनिष्ठा जैसी किसी भी बात पर विचार किया गया, न ही इस पद के लिए आए अन्य 83 आवेदनों पर भी तुलनात्मक दृष्टि से विचार किया गया। एक व्यक्ति का चयन कर पूरी नियुक्ति प्रक्रिया एक ही दिन पूरी कर ली गई जबकि ऐसा करने की कोई जल्दी नहीं थी।
मुख्य न्यायमूर्ति डॉ.डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि अनिल यादव के खिलाफ गुंडा एक्ट, जिला बदर किए जाने और हत्या के प्रयास सहित सात गंभीर मुकदमे होने के बावजूद उनको आयोग के अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर नियुक्त करना संविधान के अनुच्छेद 316(ए) का स्पष्ट उल्लंघन है। उनकी नियुक्ति में सरकार ने अपने ही शासनादेश 12 सितंबर 1984 का उल्लंघन किया जिसमें स्पष्ट प्रावधान है कि चरित्र का सत्यापन व्यक्ति के कार्यस्थल और जन्म स्थान, दोनों जगह किया जाएगा। अनिल यादव मैनपुरी में डिग्री कालेज के प्राचार्य थे। सरकार ने चरित्र का सत्यापन सिर्फ मैनपुरी जिले में किया। उनके जन्म स्थान आगरा से चरित्र का सत्यापन नहीं कराया गया। हाईकोर्ट द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने पर एसएसपी आगरा ने बताया कि उनके खिलाफ सात गंभीर आपराधिक मुकदमे थे।
आयोग के अध्यक्ष का पद 31 मार्च 2013 को रिक्त हो रहा था। व्यवस्था के अनुसार अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर कोई सदस्य उसका काम देख सकता है। इसके बावजूद पूरी चयन प्रक्रिया एक दिन में पूरी कर ली गई। इतना ही नहीं 31 मार्च 2013 को रविवार होने के बावजूद लेखपाल ने अनिल यादव के हलफनामे के आधार पर रिपोर्ट दे दी कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है।
विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि अनिल यादव का बॉयोडाटा 31 मार्च 2013 को सपा मुख्यालय में रिसीव हुआ। मूल दस्तावेज में उपलब्ध फैक्स देखने से कोर्ट को इस बात की जानकारी हुई। खंडपीठ ने अन्य 83 आवेदकों की योग्यता का हवाला देते हुए कहा कि बॉयोडाटा देने वाले 41 आवेदक पीएचडी डिग्री धारक थे। चार के पास एमफिल और चार के पास डीलिट् की उपाधि थी। एक आवेदक पहले से लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं। इन सब के बावजूद सरकार ने आवेदकों की योग्यता में तुलना करने की आवश्यकता नहीं समझी और एक ही नाम पर सहमति दे दी गई।
हाईकोर्ट ने याचिका में उठाई गई सीबीआई जांच की मांग पर फिलहाल विचार नहीं किया। कहा कि फिलहाल उन्होंने सिर्फ नियुक्ति के प्रश्न पर विचार किया है। याचीगण सीबीआई जांच की मांग को लेकर अलग से याचिका दाखिल कर सकते हैं जिस पर सुनवाई होगी।
विज्ञापन
मुख्य न्यायमूर्ति डॉ.डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि अनिल यादव के खिलाफ गुंडा एक्ट, जिला बदर किए जाने और हत्या के प्रयास सहित सात गंभीर मुकदमे होने के बावजूद उनको आयोग के अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर नियुक्त करना संविधान के अनुच्छेद 316(ए) का स्पष्ट उल्लंघन है। उनकी नियुक्ति में सरकार ने अपने ही शासनादेश 12 सितंबर 1984 का उल्लंघन किया जिसमें स्पष्ट प्रावधान है कि चरित्र का सत्यापन व्यक्ति के कार्यस्थल और जन्म स्थान, दोनों जगह किया जाएगा। अनिल यादव मैनपुरी में डिग्री कालेज के प्राचार्य थे। सरकार ने चरित्र का सत्यापन सिर्फ मैनपुरी जिले में किया। उनके जन्म स्थान आगरा से चरित्र का सत्यापन नहीं कराया गया। हाईकोर्ट द्वारा रिपोर्ट मांगे जाने पर एसएसपी आगरा ने बताया कि उनके खिलाफ सात गंभीर आपराधिक मुकदमे थे।
विज्ञापन
आयोग के अध्यक्ष का पद 31 मार्च 2013 को रिक्त हो रहा था। व्यवस्था के अनुसार अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर कोई सदस्य उसका काम देख सकता है। इसके बावजूद पूरी चयन प्रक्रिया एक दिन में पूरी कर ली गई। इतना ही नहीं 31 मार्च 2013 को रविवार होने के बावजूद लेखपाल ने अनिल यादव के हलफनामे के आधार पर रिपोर्ट दे दी कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है।
विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि अनिल यादव का बॉयोडाटा 31 मार्च 2013 को सपा मुख्यालय में रिसीव हुआ। मूल दस्तावेज में उपलब्ध फैक्स देखने से कोर्ट को इस बात की जानकारी हुई। खंडपीठ ने अन्य 83 आवेदकों की योग्यता का हवाला देते हुए कहा कि बॉयोडाटा देने वाले 41 आवेदक पीएचडी डिग्री धारक थे। चार के पास एमफिल और चार के पास डीलिट् की उपाधि थी। एक आवेदक पहले से लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं। इन सब के बावजूद सरकार ने आवेदकों की योग्यता में तुलना करने की आवश्यकता नहीं समझी और एक ही नाम पर सहमति दे दी गई।
हाईकोर्ट ने याचिका में उठाई गई सीबीआई जांच की मांग पर फिलहाल विचार नहीं किया। कहा कि फिलहाल उन्होंने सिर्फ नियुक्ति के प्रश्न पर विचार किया है। याचीगण सीबीआई जांच की मांग को लेकर अलग से याचिका दाखिल कर सकते हैं जिस पर सुनवाई होगी।