up assembly election 2022 : देश को पीएम देने वाले राजा मांडा के महल में सन्नाटा
1957 में भूदान आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी विरासत की भूमि दान कर दी। इसके बाद से ही वह देश की सियासत के बड़े चेहरों में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे नहीं देखा और प्रधानमंत्री तक का सफर तक किया।
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प्रतापगढ़ में दो राजघराने विधानसभा चुनाव में जहां टिकट के लिए जूझ रहे हैं वहीं पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की रियासत का हाल भी बहुत अलग नहीं है। करीब पांच दशक तक केंद्र और राज्य की सियासत के धुरी रहे राजा मांडा के महल में वीरानी छाई हुई है। अजेय सिंह ने पिता विश्वनाथ प्रताप सिंह की सियासी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली और अब पूरे परिवार ने राजनीति से दूरी बना ली है।
1957 में भूदान आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी विरासत की भूमि दान कर दी। इसके बाद से ही वह देश की सियासत के बड़े चेहरों में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे नहीं देखा और प्रधानमंत्री तक का सफर तक किया। मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करके वह सामाजिक परिवर्तन के नायक बने लेकिन सियासी दृष्टि से यह उनके लिए आत्मघाती कदम साबित हुआ।
मंडल कमीशन ने उन्हें अगड़ों से दूर कर दिया तो पिछड़ों की राजनीति मुलायम सिंह यादव, अजीत सिंह, लालू प्रसाद यादव जैसे समाजवादी नेताओं के हाथों में चली गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किसान मोर्चा बनाकर नई सियासी पारी शुरू की लेकिन उनकी राजनीतिक पकड़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती गई। इसी के साथ कई बड़ी राजनीतिक घटनाओं के केंद्र रहे राजा मांडा के महल की सियासी चमक भी फीकी पड़ गई।
आलम यह है कि इन दिनों चुनावी बिगुल चुका है लेकिन राजा मांडा का महल विरान है। खैरुआ गांव के फूलशंकर मिश्रा का कहना है कि सियासत में राजा मांडा का साथ देने वाले भी धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। कृष्ण विजय सिंह का कहना है कि 988 के चुनाव में दो पहिया वाहन से प्रचार कर वीपी सिंह लोगों के दिलों पर राज करने लगे लेकिन भविष्य की राजनीति की रफ्तार को नहीं संभाल सके और आज महल की तरफ कोई देखने भी नहीं आता।
छात्र राजनीति से की शुरुआत
1931 में जन्में विश्वनाथ प्रताप सिंह1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष रहे। सन् 1957 में भूदान आंदोलन में कूदे। 1969 में वह विधायक तथा 1971 में पहली बार सांसद निर्वाचित हुए। सन् 1980 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। केंद्र में वित्तमंत्री बने। टैक्स नहीं भरने के मामले में धीरूभाई अंबानी एवं अंमिताभ बच्चन से टकराव हुआ। इसके बाद उन्हे रक्षा मंत्रालय की जिममेदारी सौंपी गई और इस पद पर रहते हुए बोफोर्स घोटाले का मुद्दा उठाकर अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।
बेटे अजेय को नहीं मिली सियासत में सफलता
पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के अजेय सिंह और डॉ. अभय सिंह दो पुत्र हैं। अजेय सिंह 2009 के लोकसभा चुनाव में फतेहपुर सीट से निर्दलीय चुनाव लड़े थे लेकिन हार गए। 2009 के चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी ने उन्हें टिकट तो दिया था लेकिन आखिरी वक्त में दूसरे को प्रत्याशी बना दिया गया। इसके बाद अजेय सिंह निर्दलीय चुनाव लड़े। उन्होंने अन्य दलों से भी टिकट की कोशिश की लेकिन निराशा मिली।
कभी बजता था डंका, अब सियासत में वजूद तलाश रहे राजघराने
जिले की सियासत में कभी राजघरानों का डंका बजता था। लोकसभा व विधानसभा चुनाव में जिले में लंबे समय तक कालाकांकर स्टेट और प्रतापगढ़ राजघराने का वर्चस्व रहा। इन राजघरानों से न सिर्फ सांसद और विधायक बने, बल्कि केंद्रीय व राज्य मंत्रालय में शामिल होकर महत्वपूर्ण विभाग भी संभाले। दोनों ही राजघरानों ने जिले की सियासत में गहरी पकड़ बनाए रखी, मगर अब तीसरी पीढ़ी अपना वजूद तलाश रही है। राजनीति में पकड़ बनाए रखने के लिए दोनों ही परिवार संघर्ष करते नजर आ रहे हैं।
1957 में शुरू हुआ कालाकांकर स्टेट का सियासी सफर
राजनीति में कालाकांकर स्टेट का प्रवेश 1957 के लोकसभा चुनाव में हुआ। कांग्रेस से बांदा संसदीय सीट सीट से दिनेश सिंह सांसद चुने गए थे। बाद में वह प्रतापगढ़ संसदीय सीट से चार बार सांसद चुने गए। इस दौरान उन्होंने केंद्रीय मंत्रालय में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले। 1993 से 1995 तक वह विदेश मंत्री भी रहे। इससे देश में बेल्हा का सियासी कद बढ़ा था। कालाकांकर स्टेट के दिनेश सिंह पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के बेहद करीबी माने जाते थे।
दिनेश सिंह के निधन के बाद 1996 में बेटी रत्ना सिंह ने उनकी विरासत संभाली। राजकुमारी रत्ना सिंह प्रतापगढ़ संसदीय सीट से तीन बार सांसद चुनीं गईं। 1996, 1999 और 2009 में वह सांसद चुनीं गईं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद रत्ना सिंह कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं। रत्ना सिंह अब अपने बेटे भुवन्यू सिंह व बेटी तनुश्री का राजनीति में भविष्य तलाश रहीं हैं। बेटी तनुश्री को सांगीपुर से जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में उतारा था, मगर उन्हें सफलता नहीं मिल पाई।
बेल्हा की सियासत में रही प्रतापगढ़ स्टेट धमक
बेल्हा की सियासत में प्रतापगढ़ स्टेट की भी धमक कम नहीं रही। 1962 के लोकसभा चुनाव में प्रतापगढ़ स्टेट की राजनीति में इंट्री हुई। प्रतापगढ़ राजघराने के राजा अजीत सिंह लोकसभा चुनाव में जनसंघ के प्रत्याशी थे। वह कांग्रेस के दिग्गज नेता पं. मुनीश्वरदत्त उपाध्याय को हराकर सांसद बने थे। इसके बाद 1967 के विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। फिर सदर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए।
वह कांग्रेस की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। इसके बाद कांग्रेस पार्टी में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। इसके बाद 1980 से 1984 तक वह सदर के विधायक रहे। इस दौरान कैबिनेट मंत्री भी रहे। इसके बाद बेटे अभय प्रताप सिंह ने उनकी विरासत संभाली। वह 1991 में जनता दल से प्रतापगढ़ संसदीय सीट से सांसद चुने गए। उनके निधन के बाद से बेटे अनिल प्रताप सिंह पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अनिल प्रताप सिंह भी विधानसभा के चुनाव में तीन बार अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। वह कांग्रेस पार्टी से 1993 और 2007 में सदर से व 2012 में विश्वनाथगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, मगर सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि अब वह भाजपा में हैं और राजघराने की सियासी साख को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।