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Atiq Ahmed: अतीक गैंग के 52 गवाहों पर भारी पड़े अभियोजन पक्ष के आठ सबूत, वो साक्ष्य जो फैसले में अहम साबित हुए
Wed, 29 Mar 2023 08:01 AM IST
शाहरुख खान
आलोक श्रीवास्तव, प्रयागराज
आलोक श्रीवास्तव, प्रयागराज
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 29 Mar 2023 08:01 AM IST
सार
माफिया अतीक एंड कंपनी के 52 गवाहों पर अभियोजन पक्ष के आठ साक्षी भारी पड़े। बचाव पक्ष की दलीलें औंधे मुंह गिरी। पीड़ित पक्ष की ओर से पेश 19 के मुकाबले अतीक और उसके दोनों साथी एक भी अभिलेखीय साक्ष्य नहीं प्रस्तुत कर पाए।
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Atique Ahmed
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उमेश पाल के जिस अपहरण कांड में मंगलवार को माफिया समेत तीन दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई, उसमें अतीक अहमद एंड कंपनी के 52 गवाहों पर उमेश पाल की ओर से पेश किए गए आठ साक्षी भारी पड़े। अतीक अहमद को सजा होने की एक वजह यह भी रही कि पीड़ित पक्ष की ओर से पेश 19 के मुकाबले अभियुक्त पक्ष एक भी अभिलेखीय साक्ष्य अपने समर्थन में नहीं प्रस्तुत कर सका।
इसका ही नतीजा रहा कि बचाव पक्ष की दलीलें अदालत में औंधे मुंह गिरी और उमेश पाल को इंसाफ मिला। इस मामले में अभियोजन की ओर से कुल आठ गवाह पेश किए गए। इनमें वादी कृष्ण कुमार पाल उर्फ उमेश पाल के साथ ही चश्मदीद दिलीप पाल के अलावा मुकदमे के तीन विवेचक व तीन अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे।
इसके अलावा कुल 19 अभिलेखीय साक्ष्य भी अभियोजन पक्ष की ओर से कोर्ट में प्रस्तुत किए गए। उधर दूसरी तरफ अतीक एंड कंपनी यानी अभियुक्तों की ओर से अपनी दलीलों के समर्थन में कुल 52 गवाह कोर्ट में लाए गए। लेकिन अभियोजन पक्ष के आठ गवाह बचाव पक्ष के इन 50 से ज्यादा गवाहों पर भारी पड़े।
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यह तब था जबकि इन गवाहों में सीबीआई के एक अफसर भी शामिल रहे। इसके अलावा मामले में दोषी करार दिए गए तीनों अभियुक्तों की ओर से एक भी अभिलेखीय साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका। यही वजह रही कि कोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें काम नहीं आईं और अतीक अहमद और उसके दो साथी इस मामले में दोषी करार दिए गए।
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इसका ही नतीजा रहा कि बचाव पक्ष की दलीलें अदालत में औंधे मुंह गिरी और उमेश पाल को इंसाफ मिला। इस मामले में अभियोजन की ओर से कुल आठ गवाह पेश किए गए। इनमें वादी कृष्ण कुमार पाल उर्फ उमेश पाल के साथ ही चश्मदीद दिलीप पाल के अलावा मुकदमे के तीन विवेचक व तीन अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे।
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इसके अलावा कुल 19 अभिलेखीय साक्ष्य भी अभियोजन पक्ष की ओर से कोर्ट में प्रस्तुत किए गए। उधर दूसरी तरफ अतीक एंड कंपनी यानी अभियुक्तों की ओर से अपनी दलीलों के समर्थन में कुल 52 गवाह कोर्ट में लाए गए। लेकिन अभियोजन पक्ष के आठ गवाह बचाव पक्ष के इन 50 से ज्यादा गवाहों पर भारी पड़े।
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यह तब था जबकि इन गवाहों में सीबीआई के एक अफसर भी शामिल रहे। इसके अलावा मामले में दोषी करार दिए गए तीनों अभियुक्तों की ओर से एक भी अभिलेखीय साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका। यही वजह रही कि कोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें काम नहीं आईं और अतीक अहमद और उसके दो साथी इस मामले में दोषी करार दिए गए।
वह साक्ष्य, जो फैसले में अहम साबित हुए
घटना में प्रयुक्त लैंड क्रूजर की बरामदगी
उमेश पाल अपहरण केस के निर्णय में घटना में प्रयुक्त लैंड क्रूजर की बरामदगी एक अहम साक्ष्य साबित हुई। गौरतलब है कि उमेश पाल ने अपने बयान में बताया था कि उसका अपहरण लैंड क्रूजर गाड़ी संख्या डीजल 1सीजी 8418 में किया गया। जिसे दौराने विवेचना विवेचक केके मिश्र ने अभियुक्त अतीक अहमद के घर से बरामद किया था। अभियुक्त के अधिवक्ताओं ने बरामदगी के संबंध में जनसाक्षी का उल्लेख केस डायरी में ना होने का तर्क देते हुए इसे संदिग्ध बताया था।
उमेश पाल अपहरण केस के निर्णय में घटना में प्रयुक्त लैंड क्रूजर की बरामदगी एक अहम साक्ष्य साबित हुई। गौरतलब है कि उमेश पाल ने अपने बयान में बताया था कि उसका अपहरण लैंड क्रूजर गाड़ी संख्या डीजल 1सीजी 8418 में किया गया। जिसे दौराने विवेचना विवेचक केके मिश्र ने अभियुक्त अतीक अहमद के घर से बरामद किया था। अभियुक्त के अधिवक्ताओं ने बरामदगी के संबंध में जनसाक्षी का उल्लेख केस डायरी में ना होने का तर्क देते हुए इसे संदिग्ध बताया था।
हालांकि उनका यह तर्क अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए इस तर्क के आगे धरा रह गया कि विवेचक ने साक्षी प्राप्त करने का प्रयास किया था लेकिन सांसद अतीक अहमद के घर से बरामदगी हुई थी और इस कारण से आम जनता का कोई भी व्यक्ति साक्षी बनने को तैयार नहीं हुआ।
चश्मदीद दिलीप पाल की गवाही
इस मामले में पीड़ित उमेश पाल को इंसाफ मिला तो इसकी एक अहम वजह घटना के चश्मदीद दिलीप पाल का अपने बयान पर अडिग रहना भी रहा। दिलीप इस घटना का चश्मदीद था जिसने अपने बयान में बताया था कि घटना वाले दिन यानी 28 फरवरी 2006 को वह अपने मोटर गैराज से घर वापस आ रहा था। दोपहर 2:00 बजे करीब वह फांसी इमली पेड़ के पास पहुंचने वाला था कि तभी देखा की पटरी पर उमेश पाल सांसद अतीक अहमद की दो गाड़ियों के बीच फंसे हुए थे।
इस मामले में पीड़ित उमेश पाल को इंसाफ मिला तो इसकी एक अहम वजह घटना के चश्मदीद दिलीप पाल का अपने बयान पर अडिग रहना भी रहा। दिलीप इस घटना का चश्मदीद था जिसने अपने बयान में बताया था कि घटना वाले दिन यानी 28 फरवरी 2006 को वह अपने मोटर गैराज से घर वापस आ रहा था। दोपहर 2:00 बजे करीब वह फांसी इमली पेड़ के पास पहुंचने वाला था कि तभी देखा की पटरी पर उमेश पाल सांसद अतीक अहमद की दो गाड़ियों के बीच फंसे हुए थे।
गाड़ी लैंड क्रूजर और चैलेंजर थी। इसी दौरान लैंड क्रूजर गाड़ी से दिनेश पासी, अंसार अहमद व एक अन्य आदमी हाथ में असलहा लिए उतरे और मारपीट कर उमेश पाल को गाड़ी में पटक दिया। बयान में उसने यह भी बताया कि घटना के बाद वह उमेश के घर गया और उनकी मां, भाई-भाभी व बहन को जानकारी दी। जिन्हें वह पहचानता था उन मुलजिमों का नाम भी बताया और इसके बाद अपने घर चला गया।
अभियुक्तों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने दिलीप पाल के बयान को संदिग्ध बताया। सवाल उठाया कि अगर वह घटना का चश्मदीद था तो आखिर बिना पुलिस को सूचना दिए वह अपने घर पर जाकर कैसे सो गया। उसका यह आचरण उसके बयान को संदिग्ध बनाता है। हालांकि दिलीप के बयान के मूल्यांकन पर पाया गया कि वह क्रास परीक्षण में भी लगातार यह कहता रहा कि उसे जान का खतरा था और वह बेहद डरा हुआ था, इसी वजह से उमेश के परिवार को सूचना देकर वह सीधे अपने घर चला गया।
उसका यह आचरण स्वाभाविक भी है। एक और अहम बात यह रही कि अभियुक्तों की ओर से ऐसा कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका जिससे यह साबित हो सके कि दिलीप पाल घटना का चश्मदीद नहीं है और यही वजह रही कि दिलीप की गवाही इस केस के निर्णय में अहम साबित हुई।
अतीक नहीं दे पाया गैरमौजूदगी के सबूत
इस मामले में अतीक अहमद की ओर से दलील दी गई कि वह घटना के समय घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं था बल्कि अपने कार्यालय में कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग ले रहा था। इस दलील के समर्थन में उसने कुल 13 गवाह भी पेश किए। जिनका कहना था कि सुबह 11:00 बजे से लेकर शाम 4:30 बजे तक अतीक के चकिया स्थित कार्यालय पर 28 फरवरी 2006 को बैठक चली। हालांकि अतीक अहमद की ओर से ऐसा कोई भी अभिलेखीय साक्ष्य नहीं प्रस्तुत किया जा सका जिससे यह साबित हो सके कि उस दिन चकिया स्थित कार्यालय पर कोई मीटिंग चल रही थी।
इस मामले में अतीक अहमद की ओर से दलील दी गई कि वह घटना के समय घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं था बल्कि अपने कार्यालय में कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग ले रहा था। इस दलील के समर्थन में उसने कुल 13 गवाह भी पेश किए। जिनका कहना था कि सुबह 11:00 बजे से लेकर शाम 4:30 बजे तक अतीक के चकिया स्थित कार्यालय पर 28 फरवरी 2006 को बैठक चली। हालांकि अतीक अहमद की ओर से ऐसा कोई भी अभिलेखीय साक्ष्य नहीं प्रस्तुत किया जा सका जिससे यह साबित हो सके कि उस दिन चकिया स्थित कार्यालय पर कोई मीटिंग चल रही थी।
यह भी नहीं बताया जा सका कि उस मीटिंग का एजेंडा क्या था और इसमें कौन-कौन लोग शामिल होने वाले थे। गवाहों की ओर से यह भी बयान दिया गया कि मीटिंग में 400 से 500 लोग शामिल हुए थे और सभी ने भोजन भी किया लेकिन अतीक की ओर से कोई ऐसा साक्ष्य नहीं प्रस्तुत किया गया जो भोजन के व्यय से संबंधित हो।
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सीबीआई के डिप्टी एसपी की गवाही भी नहीं आई काम
अतीक अहमद की ओर से अपने बचाव में सीबीआई के डिप्टी एसपी की भी गवाही कराई गई लेकिन यह भी उसे सजा से बचा नहीं पाई। दरअसल बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उमेश राजू पाल हत्याकांड का गवाह नहीं था। इस संबंध में उन्होंने डिप्टी एसपी सीबीआई की गवाही कराई। जिन्होंने अपने बयान में बताया कि राजू पाल हत्याकांड का जो आरोप पत्र उनकी ओर से दाखिल किया गया उसमें कुल 77 गवाह हैं जिनमें से जनता के 61 गवाह शामिल थे। लेकिन इनमें उमेश पाल का नाम शामिल नहीं था।
अतीक अहमद की ओर से अपने बचाव में सीबीआई के डिप्टी एसपी की भी गवाही कराई गई लेकिन यह भी उसे सजा से बचा नहीं पाई। दरअसल बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने दलील दी कि उमेश राजू पाल हत्याकांड का गवाह नहीं था। इस संबंध में उन्होंने डिप्टी एसपी सीबीआई की गवाही कराई। जिन्होंने अपने बयान में बताया कि राजू पाल हत्याकांड का जो आरोप पत्र उनकी ओर से दाखिल किया गया उसमें कुल 77 गवाह हैं जिनमें से जनता के 61 गवाह शामिल थे। लेकिन इनमें उमेश पाल का नाम शामिल नहीं था।
उन्होंने यह भी बताया कि सीबीआई दिल्ली में पूजा पाल के सामने ही उमेश पाल ने माना था कि यह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और चश्मदीद गवाह नहीं हैं। बाद में जब चोटहिल गवाहों के बयान लिए गए, तो स्पष्ट हो गया कि उमेश पाल इस केस में गवाह नहीं है़ं, इसलिए उन्हें गवाह नहीं बनाया गया। इस संबंध में किसके विचारण के दौरान माना गया कि घटना उमेश पाल के अपहरण से संबंधित है ना कि राजू पाल हत्याकांड से, ऐसे में गवाह के इस कथन से इस घटना का कोई लेना देना नहीं है।
तीन गवाह नहीं साबित कर पाए अपनी प्रामाणिकता
इस मामले में दोषी करार दिए गए दिनेश पासी की ओर से अपने बचाव में कुल तीन गवाह पेश किए गए। इनमें से एक ने खुद को घटनास्थल पर हेलमेट बेचने वाला, दूसरे ने सीट मेकर की दुकान चलाने वाला बताया। दोनों ने ही अपने बयान में कहा था कि 28 फरवरी 2006 को इस तरह की कोई घटना नहीं हुई थी। यह भी बताया था कि उमेश और दिनेश पासी के बीच पहले से रंजिश है। लेकिन दोनों ही घटनास्थल पर दुकान चलाने के संबंध में कोई भी प्रलेखीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं करा पाए जिससे कि यह साबित हो सके कि वह घटनास्थल के पास दुकान चलाते हैं। यही वजह रही कि उनके बयान विश्वसनीय नहीं पाए गए।
आजमगढ़ में मौजूदगी का साक्ष्य नहीं दे पाए सौलत
उमेश पाल अपहरण केस में दोषी करार दिए गए तीन अभियुक्तों में शामिल खान सौलत हनीफ दोषी करार दिए गए क्योंकि उनकी ओर से तर्क दिया गया था कि घटना के समय वह अतीक के चकिया स्थित कार्यालय पर मौजूद नहीं थे। लेकिन वह इस संबंध में कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं दे पाए। दरअसल उनकी ओर से अपने बचाव में दो गवाह कोर्ट में पेश किए गए। इसमें से नायाब अहमद खान ने कथन किया कि 28 फरवरी 2006 को खान सौलत शादी में शामिल होने के लिए सुबह 9:00 बजे के लगभग इलाहाबाद से आजमगढ़ आ गए थे और अगले दिन यानि एक मार्च 2006 को वापस गए।
इसी तरह एक अन्य गवाह जीशान अहमद ने भी गवाही दी लेकिन क्रास परीक्षण में इस तिथि में हुए विवाह की निकाहनामा कॉपी या विवाह पंजीयन प्रमाण पत्र नहीं प्रस्तुत किया जा सका। कोर्ट ने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पप्पू तिवारी बनाम झारखंड राज्य 2022 लिवरा सुप्रीम कोर्ट 107 में प्रतिपादित किया है कि अन्यत्र उपस्थिति को साबित करने का भार पूर्ण रूप से अभियुक्त पर होता है। अभियुक्त को यह साबित करना होगा कि वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था लेकिन इस मामले में अभियुक्त ऐसा करने में सफल नहीं रहा।
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