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Ujjwal Raman Singh : हर जाति में की सेंधमारी, ग्रामीण वोटरों से सीधा जुड़ाव आया काम

Wed, 05 Jun 2024 01:09 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 05 Jun 2024 01:09 PM IST
सार

इंडिया गठबंधन को मिले मुस्लिम वोटरों के समर्थन के लिए कांग्रेस प्रत्याशी को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी लेकिन ओबीसी, एससी और एसटी वोटरों में प्रत्याशी ने ठीक से सेंधमारी की। हालांकि, भाजपा के गढ़ शहर दक्षिणी विधानसभा में कांग्रेस सेंधमारी नहीं कर सकी।

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Ujjwal Raman Singh: Infiltration of every caste, direct connection with rural voters worked
इलाहाबाद लोकसभा सीट पर जीत के बाद प्रमाण पत्र दिखाते कांग्रेस प्रत्याशी उज्ज्वल रमण सिंह। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

हर जाति में सेंधमारी और ग्रामीण वोटरों से सीधा जुड़ाव इलाहाबाद संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी उज्ज्वल रमण सिंह की जीत का मुख्य आधार बन गया। वहीं, पुराने कांग्रेसियों ने उज्ज्वल के पिता एवं पूर्व सांसद कुंवर रेवती रमण सिंह से अपने संबंधों को भी निभाया जबकि पिता की विरासत को बचाए रखने के लिए चुनाव मैदान में उतरे पूर्व गवर्नर केसरीनाथ त्रिपाठी के पुत्र एवं भाजपा प्रत्याशी नीरज त्रिपाठी राजनीति में अनुभव की कमी से पिछड़ गए।

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इंडिया गठबंधन को मिले मुस्लिम वोटरों के समर्थन के लिए कांग्रेस प्रत्याशी को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी लेकिन ओबीसी, एससी और एसटी वोटरों में प्रत्याशी ने ठीक से सेंधमारी की। हालांकि, भाजपा के गढ़ शहर दक्षिणी विधानसभा में कांग्रेस सेंधमारी नहीं कर सकी। नतीजा कि केवल इसी विधानसभा क्षेत्र में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा जबकि यमुनापार के चारों विधानसभा क्षेत्राें में कांग्रेस उम्मीदवार ने बढ़त बनाए रखी।
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ब्राह्मण बहुल विधानसभा क्षेत्र मेजा में कांग्रेस प्रत्याशी की जीत सीधा संकेत देती है कि वहां प्रत्याशी को ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन मिला है। तकरीबन 25 फीसदी ब्राह्मण पार्टी के साथ गए। इसमें पुराने ब्राह्मण कांग्रेसियों की भूमिका प्रमुख रही जो रेवती रमण के नजदीकी रहे हैं। वहीं, एससी और आदिवासी बहुल विधानसभा क्षेत्र कोरांव में भी कांग्रेस उम्मीदवार की जीत ने यह तय कर दिया है कि प्रत्याशी ने एससी और एसटी वोटरों में भी सेंधमारी की।

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नीरज का राजनीति में कम अनुभव बना हार का कारण

इस बार कुर्मी और ओबीसी वोटर भी बंटे हुए थे। माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में बिंद, कुशवाहा, पटेल, मौर्य वोटरों ने उज्जवल रमण सिंह के समर्थन में मतदान किया। प्रत्याशी को सबसे बड़ी जीत करछना विधानसभा क्षेत्र में मिली और यह क्षेत्र उनका अपना घर है। इस विधानसभा क्षेत्र से उज्जवल रमण सिंह दो बार विधायक रह चुके हैं और उनके पिता रेवती रमण सिंह ने भी इसी विधानसभा क्षेत्र से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। पिता और पुत्र दोनों का ही ग्रामीण वोटरों से गहरा और सीधा जुड़ाव रहा है, जो चुनाव परिणाम में साफ नजर आ रहा है।

वहीं, इस बार इलाहाबाद संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे नीरज त्रिपाठी का राजनीति में अनुभव बहुत कम रहा है। इससे पहले वह कोई चुनाव भी नहीं लड़े थे। उनके पिता केसरीनाथ त्रिपाठी अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन राजनीति में उनके रसूख और शीर्ष नेताओं से रहे अच्छे संबंधों के कारण नीरज को पार्टी का भरपूर समर्थन मिला।

भाजपा प्रत्याशी को भितरघात से भी होना पड़ा दो चार

इसके बावजूद नीरज की उन ग्रामीण इलाकों तक पहुंच सीमित रही, जहां भाजपा का प्रभाव कम है। सूत्र बताते हैं कि उनका जनसंपर्क भाजपा समर्थित इलाकों में ज्यादा रहा। राजनीति में अनुभव की कमी के कारण नीरज को भितरघात से भी जूझना पड़ा। बीते कुछ माह में रेवती रमण सिंह के कुछ करीबी नेता भाजपा में शामिल हुए थे और चुनाव के दौरान उन्होंने अंदर ही अंदर कांग्रेस प्रत्याशी का समर्थन किया। इतना ही नहीं, नीरज को भी गलत फीडबैक दिया।

करछना विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के एक ब्लॉक प्रमुख ने तो कांग्रेस प्रत्याशी को चंदा तक दिया और अपने गांव में उन्हें जिताने का वादा भी किया। बूथ मैनेजमेंट और जातिगत समीकरण साधने में माहिर रेवती रमण सिंह ने अपने पुत्र की जीत के लिए चुनावी बिसात में ऐसे ही कई मोहरे चले, जो इस सीट से भाजपा प्रत्याशी के लिए शह और मात का कारण बने।

घर में भी गठबंधन भी आया काम

इलाहाबाद संसदीय सीट पर इंडिया गठबंधन तो चुनाव लड़ ही रहा था, प्रत्याशी के घर में भी सपा और कांग्रेस का गठबंधन जीत की जमीन तैयार कर रहा था। सपा में रहे उज्ज्वल रमण सिंह तो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे लेकिन उनके पिता कुंवर रेवती रमण सिंह अब भी सपा के शीर्ष नेताओं में शामिल हैं। एक तरफ उज्ज्वल के पीछे कांग्रेस कार्यकर्ता खड़े थे तो दूसरी ओर रेवती रमण सिंह के साथ सपाइयों की फौज ने भी उज्ज्वल की जीत के लिए ताकत झोंक रखी थी। नतीजा कि जिन क्षेत्रों में सपा के परंपरागत वोटर हैं, वहां रेवती रमण सिंह के संबंध काम आए और जहां कांग्रेस मजबूत थी, वहां पुराने कांग्रेसियों का समर्थन मिला।

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