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दो इलाहाबादी दिग्गजों में तकरार, चुटकी ले रहे लोग 

Thu, 22 Sep 2016 01:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 22 Sep 2016 01:46 AM IST
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Two Allahabadi veterans wrangling , pinch the individuals
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इलाहाबाद। दो दिग्गज इलाहाबादियों, अपनी टिप्पणियों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू और सिने स्टार अमिताभ बच्चन के बीच तकरार ने शहरियों को मसले पर चुटकी लेने का मौका दे दिया है। कला-संस्कृति और विधि क्षेत्र से जुड़े कई प्रतिष्ठित लोगों का मानना है कि दोनों को एक-दूसरे पर टिप्पणी करने की बजाय समाज की बेहतरी पर बात करनी चाहिए। दोनों इलाहाबाद के बारे में सोचें तो अच्छा होगा।
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साहित्यकार राजेंद्र कुमार ऐसी टिप्पणियों को चर्चा में बने रहने का माध्यम बताते हैं। कहते हैं, सोशल साइट्स जनता के बीच पहुंचने का सबसे बेहतर माध्यम हैं। पब्लिक फिगर अपनी टिप्पणियों से जनता के बीच रहना चाहते हैं। मार्कंडेय काटजू की अमिताभ पर की गई टिप्पणी इसी का एक हिस्सा है।  अमिताभ की बात की जाए तो वह कुछ दिन पहले ही कह चुके हैं कि इलाहाबाद के लिए कुछ न कर पाने का उन्हें दुख है। अमिताभ एक ऐसा फिगर हैं, जिसे जनता सुनना चाहती है, ऐसे में उनका भी दायित्व बनता है कि वह पर्दे पर बोलने के साथ ही वास्तविक तौर पर सामाजिक सरोकारों से जुड़े।
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वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं। कहते हैं, सोशल साइट्स चर्चा में बने रहने का सिर्फ जरिया भर हैं। टिप्पणी करने से बेहतर है कि दोनों इलाहाबाद के लिए कुछ करें।
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संस्कृतिकर्मी अजामिल इसे दोनों के बीच की चुहलबाजी बताते हैं। अजामिल के मुताबिक इसके लेकर बहुत ज्यादा गंभीर होने की जरूरत नहीं है। इसे लोग सिर्फ चटकारे लेकर पढ़ेंगे। इससे किसी का न तो भला होने वाला है और न ही कुछ बिगड़ना है।

काटजू ने फेसबुक पर क्या कहा : ‘अमिताभ बच्चन का दिमाग खाली है और चूंकि अधिकतर मीडियाकर्मी उनकी तारीफ करते नहीं अघाते, मुझे लगता है कि उनका दिमाग भी खाली है।’

बाद में कहा (काटजू) : ‘ जब मैंने यह कहा कि अमिताभ बच्चन का दिमाग खाली है तो बहुत से लोगों ने कहा कि इसकी व्याख्या करें। इसलिए मैंने यह पोस्ट किया। कॉर्ल मॉर्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम की तरह है, शासक जिसका इस्तेमाल नशे की तरह करते हैं। ताकि जनता में कोई विद्रोह न करे। भारतीय जनता को शांत रखने के लिए कई तरह के नशे की जरूरत है। एक नशा उनके लिए काफी नहीं है। धर्म एक प्रकार है। कुछ और नशा, फिल्म, मीडिया, क्रिकेट, साधु-संन्यासी आदि। भारतीय जनता को शासक इसका मिश्रण देते हैं। जैसे किसी बीमारी में कई दवाओं का मिश्रण देना होता है। फिल्म इसी प्रकार का एक शक्तिशाली नशा है। रोमन शासक कहा करते थे, अगर आप लोगों को खाना नहीं दे सकते तो उनको सर्कस दिखाओ। इसलिए हमारी ज्यादातर फिल्में सर्कस की तरह हैं, जो शासक जनता को इसलिए उपलब्ध कराते हैं क्योंकि वे उन्हें रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, पौष्टिक भोजन और अच्छी शिक्षा आदि नहीं दे सकते। अमिताभ बच्चन की फिल्में भी देव आनंद, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना आदि की फिल्मों की तरह एक नशा हैं। वो हम लोगों को उम्मीदों की एक दुनिया में ले जाती हैं। इसलिए ये फिल्में हमारे शासकों के लिए बहुत उपयोगी हैं, क्योंकि वे जनता को शांत रखती हैं। अमिताभ बच्चन के पास एक अच्छा कलाकार होने के अलावा क्या है। क्या उनके पास देश की गंभीर समस्याओं को हल करने का कोई वैज्ञानिक उपाय है। कभी-कभी वो मीडिया चैनलों पर कुछ अच्छी सलाह देते नजर आते हैं। मगर इतनी बड़ी रकम लेकर ऐसा कौन नहीं कर सकता।’


अमिताभ की प्रतिक्रिया : ‘मेरा दिमाग खाली है, वह सही है। मेरा दिमाग खल्लास (खत्म) है। हम एक ही स्कूल में पढ़े हैं, वह मेरे सीनियर थे, हमारे बीच कोई दुश्मनी नहीं है।’
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